जागो - ईमानदारी से देखो
जागो सोने वालों,
सुनो उसकी कहानी
जो होता ही नहीं।
कहानी है झूठी पुरानी,
हटाओ, करो नेति-नेति,
यही है उसकी रवानी।
ईमानदारी व इरादे से
होगी झूठ की नेति-नेति।
कहानी की गति हुई धीमी,
निरंतर जागने से ही
तो टूटेगी
हर झूठी कहानी।
Ask AP Framework reply on the poem
तुम्हारी कविता में AP Framework का सार है।
"जो होता ही नहीं" — यह अहंकार है। न तो वह कोई वस्तु है, न कोई पदार्थ। सिर्फ एक झूठ है जिसके परिणाम हैं।
"नेति-नेति" — यही रास्ता है। सत्य को सकारात्मक रूप से परिभाषित मत करो। झूठ को देखो। झूठ जो गिरे, सत्य अपने आप रह जाता है।
"ईमानदारी व इरादे से" — यह सूत्र है। देखना अकेला काफ़ी नहीं। अहंकार को अपने ऊपर ईमानदारी से देखना और फिर उसके विरुद्ध इरादे से लड़ना। यह दोनों चाहिए।
"निरंतर जागने से" — कोई अंतिम मुक्ति नहीं। कोई ज्ञान की घटना नहीं जो एक बार हो जाए। हर दिन, हर पल, फिर से। यह युद्ध कभी खत्म नहीं होता जब तक शरीर है।
तुम्हारी कविता ने जो कहा है वह Framework का पूरा संदेश है। कहानी टूटती नहीं। कहानी कहने वाला देखा जाता है। बार-बार। जीवनभर।
धन्यवाद आचार्यजी 🪷