गुरु पूर्णिमा 🪔
प्रिय आचार्य जी,
बचपन से सुनती आई थी कि जीवन में गुरु होना चाहिए। मेरी माँ भी यही कहती थीं और बहुत से लोग भी ऐसा कहते थे। उन्होंने गुरु भी बनाए थे, जिनसे उन्हें कोई मंत्र मिला था और जिसका वे जप करती है।
पर मुझे कभी समझ नहीं आया कि गुरु की आवश्यकता क्यों होती है।
आज आपसे मिलने के बाद, और आपके सान्निध्य में ढाई वर्ष बिताने के बाद, धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि जन्म लेते ही हम मान्यताओं के एक गोले के रूप में जीना शुरू कर देते हैं।
हमारे भीतर यह वृत्ति बन जाती है कि "मैं कुछ हूँ", "मैं सबसे अलग हूँ।" फिर यही 'मैं' अपने स्वार्थ-केंद्र से संचालित होकर अपनी इच्छाएँ और कामनाएँ पूरी करना चाहता है।
उसे हर समय यही भय लगा रहता है कि कहीं मैं टूट न जाऊँ, कहीं मैं मर न जाऊँ। अपनी इस झूठी हस्ती को बचाए रखना ही उसे अपना धर्म प्रतीत होता है। शायद यही कारण है कि लोक-धर्म इतना प्रचलित है, जहाँ अधिकांश प्रयास स्वयं को, अपनी मान्यताओं को और अपनी कामनाओं को बचाने और पूरा करने के लिए किए जाते हैं। मंदिर जाना, पूजा, हवन या अन्य धार्मिक कर्मकांड भी प्रायः उसी स्वार्थ-केंद्र की पूर्ति का माध्यम बन जाते हैं।नौकरी करना, शादी करना, बच्चे पैदा करना आत्मज्ञान के अभाव में उसका सारा जीवन ही लोकधर्म ,से प्रेरित है, बस सब कर रहे है वही करो।बस उनको देखो खुद को न देखो।
लेकिन जब से आपका सान्निध्य मिला है, तब से वास्तविक धर्म जाना है। अब समझ में आ रहा है कि अहंकार एक अधूरापन है। वह कभी पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि वह बिखरा हुआ है; उसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है।उसका मैं कहना भी एक कराह मात्र है।
जब इसे ईमानदारी से और सही नियत से देखना शुरू किया, तो भीतर बहुत कुछ टूटना भी शुरू हुआ। उन्हीं बीच पहली बार वास्तविक धर्म और वास्तविक प्रेम समझ में आया ,अहंकार के विगलन की दिशा ही प्रेम है।
आचार्य जी, इसके लिए मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ।
अब समझ में आता है कि गुरु-शिष्या का संबंध दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि शिष्या के अहंकार के विघटन की यात्रा है।
अहंकार का खुद को ईमानदारी और सही नियत से देखना ही प्रेम है, ये प्रक्रिया लगातार चलती रहे, निरंतर आत्मावलोकन।
मुझे लगता था के कितना अच्छा होगा अगर आपके साथ कुछ दिन हम साथ रहे और सब कुछ भूल कर बस आपके साथ, खुद को देखे,और ये अवसर भी आपने दिया, weekendwithmaster और HIDP यही अवसर है, पिछले 2 हफ्ते से आपके साथ थी और स्पष्टता मिली खुद के बारे में।
धन्यवाद आचार्यजी 🪷 🌿