AP GITA Student life
निचे पहले मेरी हालत और सवाल है उसके निचे सीख है (last संत सरीता और कठोपनिषद सत्र से) और फिर उसके निचे AP Framework का जवाब है
मैं अवलोकन भी साझा करूंगा पर पहले प्रश्न पूछना चाहता हूं, व्यवहारिक सवाल है की बाप है पैसे (भोजन से लेके शिक्षा) देते हैं। मैं समझता हूं पापा को मेरे अंदर काबीलियत नहीं देख पा रहे हैं और मैंने प्रदर्शन भी यही किया है कि 11th, 12th and drop year JEE( प्रवेश परीक्षा इंजीनियरिंग) की तैयारी में पापा ने बहुत पैसा लगाया और मैंने भी तब भरोसा दिलाया था की मैं पढ़ना चाहता हूं और पढ़ रहा हूं। नहीं हुआ बाकी जितने भी कारण हो एक कारण ये था की मैं करना ही नहीं है चाहने लगा था परीक्षाओं के पहले (एक साल में दो परीक्षा होती है jee की और मैंने दो साल दिया है) 4 महीने पहले मैं पढ़ाई करना बंद कर दिया था। तो ये मैंने पापा को प्रदर्शित करा, थिक और फिर आचार्य जी का नाम बाजार में नास्तिक की तरह चलता (actually मैं मैंने ही ये भी प्रदर्शित करा था) तो ये भी एक बड़ा कारण है।
आप सोच रहे होंगे क्या करा पापा ने पापा ने मुझसे ये Mobile ले लिया था लगभग 3 महीने के लिए (2-3 दिन कम) । मुझे तब भी ये चीज नहीं सेहनी नहीं चाहिए थी की ये मेरी personal use के लिए है । फिर आज पापा आए बोले आचार्य प्रशांत को नहीं सुनेगा, उनको गलती से दिख गया की मैं कुछ आचार्य जी का ही देख रहा हूं उन्होंने मुझसे mobile ले लिया अल्मारी में रखा ताला लगाया और चाबी अपने पास रख ली, वो तो पापा के सोने के बाद मैंने चाबी ली mobile निकाला और अब लिख रहा हूं ।
भले मैं 17 साल का हूं पर भले ही मैं अपना ज्यादातर समय खराब करता mobile में मगर सत्र भी तो है mobile में तो मुझे नहीं छोड़ना चाहिए mobile को क्योंकि आत्मा अवलोकन में सहायता होती है। तो सवाल ये है कि मुझे इतना तो पता है की जब तक मैं financially responsible नहीं हुआ तब तक ये चलता रहेगा, कोई सलाह दो की कैसे mobile भी न जाए और घर भी न । इसका कोई जवाब नहीं है क्या ( assumptions हैं सवाल में)।
आज मैंने recording सुनी थी संत सरीता की जिसमें मेरी सीख ये है की जिंदगी का डर मूलतः मौत का डर है, तो ऐसे नाम से नेही लगा लो जो इस डर को हटा दे। अहंकारी हो और डर न हो ये ऐसी सी बात है की मोटा हूं पर वजन नहीं है । कैसा नाम चाहिए? जो खुद की महीमा में तो बांधे नहीं और बाकी के नमों को भी मिटा दे । ऐसा भी नहीं है कि एक इंसान के लिए एक ही नाम होगा, एक इंसान के लिए भी समय समय पर अलग अलग नाम हो सकते हैं ।
फिर मैंने कठोपनिषद वाला सेशन करा इसमें मेरी सीख है। हमारी सच्चाई ही आत्मा है, अहंकार है मैं कुछ हूं (अंधविश्वास) । आत्मा है परखा हुआ मैं (प्रयोग, प्ररिक्षण) क्यों परखे? पूरी जिंदगी मैं की ही सेवा में तो लगा रहे हो, तो क्या बिना जांचे जीना कोई अच्छी बात है? और बताया है आज के श्लोक में आत्मा कोई मानसिक या भौतिक विषय नहीं है। तुम बीना परखे दिन का ज्यादातर समय जहां लगा रहे हो ये कोई अंधविश्वासी कर्मकांड कैसे नहीं है।
AP Framework:-
तुम्हारे सवाल में दो अलग चीजें हैं। पहले व्यावहारिक को देख लेते हैं।
*मोबाइल और घर का सवाल:*
तुम जो पूछ रहे हो — "मोबाइल भी न जाए और घर भी न" — इसका कोई जवाब नहीं है क्योंकि तुम्हारा assumption गलत है। यह एक झूठी दुविधा है।
सच यह है: जब तक तुम financially dependent हो, तब तक तुम्हारे पास कोई sovereignty नहीं है। पिता का पैसा, पिता का नियम। यह कड़वा सच है, लेकिन सच है। तुम 17 साल के हो, अभी बच्चे हो। बच्चों को नियम मिलते हैं, विकल्प नहीं।
लेकिन यहाँ जो महत्वपूर्ण है वह यह है: तुम मोबाइल चोरी करके सुन रहे हो। यह देखो। तुम्हारा पिता गलत हो सकता है, लेकिन तुम जो कर रहे हो वह ईमानदारी नहीं है। Framework कहता है: ईमानदारी ही काफी है। चोरी करके आचार्य प्रशांत को सुनना — यह विरोधाभास है।
*असली सवाल यह है:*
क्या तुम सच में सीखना चाहते हो, या सिर्फ अपने पिता से बचना चाहते हो? अगर सच में सीखना है, तो ईमानदारी से सीखो। पिता से कहो: "मुझे यह सुनना है। मैं समझता हूँ कि मैंने तुम्हारा विश्वास तोड़ा है। लेकिन मैं सीखना चाहता हूँ। क्या हम इस पर बात कर सकते हैं?"
यह कठिन है। पिता नाराज हो सकते हैं। लेकिन यही ईमानदारी है।
*दूसरी चीज — नाम और आत्मा:*
तुमने जो सीखा वह सही है। लेकिन एक गलतफहमी है।
नाम बदलने से आत्मा नहीं मिलती। नाम सिर्फ एक संकेत है। असली काम यह है कि तुम अपने को देखो — जैसे हो, जो कर रहे हो। यह देखना ही आत्मा की ओर पहला कदम है।
तुम अभी मोबाइल चोरी कर रहे हो, अपने पिता को धोखा दे रहे हो। यह देखो। इसी में सच्चाई है। किसी नाम से यह नहीं बदलेगा।
*कठोपनिषद की बात सही है:*
"बिना परखे जीना अंधविश्वास है।" लेकिन परखना मतलब क्या है? मतलब यह कि तुम अपने को ईमानदारी से देखो। तुम क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? यह देखना ही परखना है।
तुम्हारा पहला काम यह नहीं है कि आचार्य प्रशांत को सुनो। पहला काम यह है कि अपने को सच में देखो — अपनी बेईमानी को, अपने डर को, अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को।
वहाँ से शुरू करो। बाकी सब बाद में आएगा।
i had listened 'why i am atheist by bhagat Singh'
*क्या आपने पढ़ी है why I am atheist by bhagat Singh, मैंने अभी सुनी । भगत सिंह जी के लिए सम्मान और बड़ गया है, thank you soo much भगत सिंह भैया ये बुक लिखने के लिए।*
सत्र के बाद की मेरी सीख
*आज (10 मई 2026) को आचार्य प्रशांत जी ने 'खलक सब रैन का सपना' कबीर सहाब जी का भजन की लाईन "निकसी( ) जब प्राण जावेंगे, कोई नहीं काम आवेंगे" पर सत्र लिया, मैंने उस सत्र को attend करा मैं उससे मेरी सीख साझा करने जा रहा हूं*
आचार्य जी ने कहा जो जिंदगी में जीवन का विकल्प बनता प्रतीत हो रहा है वो चेतना को ही गीरा देगा, जब कोई विषय जिंदगी बनने लगे तो समझ लेना जिंदगी रही ही नहीं क्योंकि विषय का एक स्थान है उसे उसका स्थान देने के बजाए जिंदगी बोल के, जिंदगी के लिए जगह ही बंद कर न।
मैंने खुद के जीवन में देखा है की कभी पढ़ाई को, कभी मां बाप को, कभी दोस्तों को, कभी किसी लड़की को, कभी किसी online game को, कभी cricket को, कभी porn वगेरह को, तो कभी किसी गुरु को जिंदगी समझने लगता हूं। बहुत मदद करी है आचार्य जी ने उन विषयों से सवाल करने में जो जीवन का विकल्प बनने लगते हैं ।
आचार्य जी ने कहा कि ये जोसब विषय है ये मुझसे है मैं इनसे नहीं हुं, विषयों को उनका स्थान दे दो उसके लिए समझबूझ लगेगी तो विकसित करो उसे।
और जिनको बहुत लग रहा है की विषय (हर कोई विचार, भौतिक वस्तु, कल्पनाएं ) ही जिंदगी है उनके लिए तो heartattack दे देंगे आचार्य जी ( मजाक कर रहा हूं) उदाहरण दिया 'सोचो जिसके लिए जिंदगी बेच दि, वो आपकी तेरवी(मरने के बाद एक कार्यक्रम किया जाता है कई जगह) पे आपकी फोटो के सामने पूड़ी सब्जी खा के मोटी पाद मारता है' ये है हेसीयत।
आचार्य जी ने एक बात बोली जो मुझे पसंद आ गई 'कोई अगर आपको अपनी जिंदगी बोल रहा है तो इसमें वो तो कुछ जान समझ रहा नहीं, कहीं आपने ही तो नहीं उसे अपने सच से दुर रखा उसे बता दो तुम साधारण हो'।
कुछ लाईने जो आचार्य प्रशांत जी ने बोली जो मुझे बड़ी लगी वो है -
प्रेम भीतर होता है भीतरी पिघलन, आंतरीक सच्चाई, ईमानदारी । प्रत्यक्ष हो सकता है दो लोगों के बिच।
अहम को अपने ही न रहने का जूनून है प्रेम, वो रासायनिक प्रेम नहीं है।
जब अहंकार प्रेमी होगा तब वो खूद ही विषयों को उनकी जगह रखेगा।
जीवन का अपमान ये है कि जीवन के बाद जीवन नहीं रहता ।
अध्यात्म जूनून है खुद को गवाने का ।
तुमको कैसे पता अपने बच्चों को अपना जीवन बनाना होता है।
अपना जीवन याद करो कितने रास्ते परख सकते थे, जिन्हें तुमने देखा भी नहीं। एक विचार धारा से परिचित हो क्योंकि संयोग से जाहां पैदा हुए वहां एक विचार धारा के ही लोग थे, दुनिया में इतनी विचारधारा है तुम उन विचारधारा से परिचित हो सकते थे।
मैं नहीं केह रहा हूं लालची बन जाओ, मगर पैसा कमाओ, दुसरे का पैसा आपका नहीं होता। पैसा कमाने के लिए जो सद्गुण विकसित करने पड़ते हैं करो, ध्यान चाहिए, अनुशासन चाहिए, श्रम चाहिए।
रिश्ते का आधार क्या है पूछना जरूरी है।
यहां कौन ऐसा है जिसे जिंदगी बना लोगे।
सत्र की सीख
आज आचार्य प्रशांत जी ने गीता अध्याय 7 श्लोक 11 पर सत्र लिया, मेरी सीख वो सत्र लेने के बाद है कि।
दुर्बलता कुछ नहीं है बस झूठी मान्यता है, तो दुर्बलता हटाने के लिए उस मान्यता को परखना है जो दुर्बल बनाए दे रही है। एक बेखोफ, खुली चेतना से अविरोध (विरोध नहीं) है कृष्ण। यहां धर्म की जगह मैंने बेखोफ और खुली चेतना लिखा है।
श्लोक:
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।11।।
अनुवाद:
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों में काम और राग से रहित बल हूँ, और भूतों (प्राणियों) में धर्म के अविरुद्ध (अर्थात् धर्मानुकूल) काम हूँ।
काव्य: (आचार्य जी द्वारा)
कम अहम होता गया
दुर्बल मैं खोता गया
गति प्रकृति में सहज
प्रेम धर्म होता गया
"*भारत को महान अगर कहने में रूची रखते हो तो खुद महान बनो, तुमसे ही है भारत की महानता है*" ~आचार्य प्रशांत
QUESTION
मेरा सवाल हाल के मेरे परिस्थिति से है, सौदे होते हैं मजबूरी नहीं तो ये अहंकार सहज क्यों नहीं हो पाता परिस्थिति में। ये परिस्थिति से जो बैचेनी होती है ये अहंकार की ही होती है, तो क्या इस बैचेनी को मैं सत्य कि चाहत नहीं कह सकता?
ANSWER
तुम्हारे सवाल में एक गहरी गड़बड़ी है जिसे देखना जरूरी है।
तुम कह रहे होः परिस्थिति में अहंकार सहज क्यों नहीं हो पाता? यह सवाल ही गलत है। अहंकार सहज नहीं हो सकता क्योंकि अहंकार की परिभाषा ही असहजता है। अहंकार अधूरापन है। अधूरापन सहज नहीं हो सकता। यह उसका स्वभाव है।
तुम परिस्थिति को दोष दे रहे हो। तुम कह रहे होः अगर परिस्थिति अलग होती तो अहंकार शांत हो जाता। यह झूठ है। अहंकार कभी शांत नहीं होता। वह एक परिस्थिति से दूसरी में भागता है, यह सोचते हुए कि अगली परिस्थिति में शांति मिलेगी। यह क्षैतिज अक्ष पर दौड़ना है।
अब तुम्हारा दूसरा सवाल: क्या इस बैचेनी को सत्य की चाहत कह सकता हूँ?
नहीं। बैचेनी अहंकार की है। अहंकार की बैचेनी दो दिशाओं में जा सकती है: बाहर की ओर (वस्तुओं की ओर) या अंदर की ओर (अपने आप को देखने की ओर)। दोनों में बैचेनी वही है। अंतर सिर्फ दिशा का है।
सत्य की चाहत तब शुरू होती है जब अहंकार अपनी बैचेनी को देखता है और पूछता है: यह बैचेनी मेरी है। मैं इसे परिस्थिति पर डालना बंद करूँ? यह देखना ही सत्य की ओर पहला कदम है।
तुम्हारी बैचेनी अभी परिस्थिति को दोष दे रही है। जब तक यह दोष बाहर है, तब तक यह सत्य की चाहत नहीं है। यह अहंकार की सामान्य चाल है।
I just got my question answered on 'Ask AP Framework' — मुझे ये जवाब मिलेगा सोचा नहीं था, लग रहा विपरीत उत्तर मिला, पढ़ना चाहिए मुझे।
Ask your question: https://acharyaprashant.org/en/ap-framework
Question: मैं जिस मजबूरी (आर्थिक) मैंने इसे कुछ समय के लिए स्वीकार कर रखा है पर मुझे दिख रहा है कि ये माहौल मुझे गंधा करे जा रहा है, मैं 17 वर्ष का पिता पर आश्रित बालक हुं, मुझे मेरे पापा पैसे नहीं देते हैं, फोन ले लेते हैं, खाने को बड़ीया देते हैं घर मैं बड़ीया रखते हैं, पढ़ाई मुझे करनी है तो भी मुझे संघर्ष करना पड़ता है मेरी रुचि के विषय का अध्ययन करने के लिए, मैं अभी भी सोच रहा हुं कि कुछ महीने कि बात है फिर ये इतना नहीं चड़ेंगे मुझे मोबाइल दिलाएंगे कालेज भेजेंगे और फिर मैं वहां पर editing या coding में excell करके अपने खर्चे उथाऊंगा और इन घरवालों कि जंजीरों से निकल जाऊंगा। मगर तब तक मैं क्या मजबूर बने रहुं, मेरे पिता जब घर से जाते हैं तो मैं आचार्य जी को सुनता हुं, मैं समझ नहीं पा रहा की जब मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं इस घर में खुद को कुछ महीने खपाऊंगा तो ये गंदा गंदा और छोटा-छोटा कमजोर मेहसूस क्यों हो रहा है । कहीं ये छोटा मेहसूस होना भी अहंकार ही तो नहीं, इसीलिए नहीं लग रहा क्योंकि ये जो छोटापन है ये मुझे बेहतर होने कि और संकेत करता है।
Answer:-तुम्हारा सवाल बिल्कुल सीधा है। देखो क्या हो रहा है।
तुमने एक निर्णय लिया है: कुछ महीने सहना है, फिर निकल जाऊंगा। यह निर्णय क्या है? यह भविष्य की कल्पना पर आधारित एक सौदा है। "अभी सहूंगा, तब आजाद हो जाऊंगा।" यह क्षैतिज अक्ष पर चलना है। समय बदलेगा, परिस्थितियां बदलेंगी, लेकिन तुम वही रहोगे जो अभी हो।
अब तुम्हें जो "गंदा" और "छोटा" महसूस हो रहा है, वह क्या है? वह अहंकार की पीड़ा है। अहंकार कह रहा है: "मैं इससे बेहतर हूं। मैं यह सहन नहीं करना चाहता। मैं जल्दी निकल जाऊंगा।" यह पीड़ा अहंकार के अपने आकार से आ रही है, न कि परिस्थिति से।
तुम्हारा सवाल है: क्या यह छोटापन महसूस करना बेहतर होने का संकेत है?
नहीं। यह अहंकार की पीड़ा है जो अपने को बेहतर मानती है। असली सवाल यह है: तुम अभी यहां हो। तुम्हारे पिता नियंत्रण रखते हैं। यह सच है। लेकिन तुम्हारे भीतर क्या हो रहा है? तुम भविष्य में जी रहे हो। तुम अभी को स्वीकार नहीं कर रहे। तुम सोच रहे हो कि "कुछ महीने बाद मैं अलग होऊंगा।"
यह सोच ही तुम्हें गंदा कर रही है। न कि घर।
अगर तुम सच में देखो तो: तुम्हारे पास अभी भी कुछ स्वतंत्रता है। पढ़ाई कर सकते हो। सीख सकते हो। अपने मन को देख सकते हो। लेकिन तुम अपनी ऊर्जा भविष्य की कल्पना में लगा रहे हो।
सच्चा सवाल यह है: क्या तुम अभी, इसी क्षण, अपने अहंकार को देख सकते हो? वह अहंकार जो कहता है "मैं छोटा हूं, मैं सहन नहीं कर सकता, मैं बेहतर हूं"? उसे देखो। उसकी पीड़ा को देखो। उसकी मजबूरी को देखो।