

चित्रलेखा — भगवतीचरण वर्मा
इस किताब ने परिस्थितियों की सही परिभाषा दी है। आमतौर पर हम परिस्थितियों को एक नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं और उनसे बचने या अपने कर्मों की जिम्मेदारी से बचने के लिए परिस्थितियों को ही दोषी ठहरा देते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि परिस्थितियाँ स्वयं न तो अच्छी होती हैं, न बुरी।
श्वेतांक द्वारा यह प्रश्न पूछना, “पाप क्या होता है?”, यहीं से इस प्रश्न को जानने और समझने का सिलसिला शुरू हुआ।
उनका अर्थ और प्रभाव हमारे दृष्टिकोण, निर्णय और कर्मों से निर्धारित होता है। जिस प्रकार जिन परिस्थितियों में रत्नांबर गुरु जी के शिष्य श्वेतांक और विशालदेव को रहने को मिला, उसमें ढलकर वे वैसे ही बन गए और उसी प्रकार उनके पाप और पुण्य निर्धारित हुए।
प्रेम और वासना में क्या भेद है?
वासना एक हड़बड़ी है, जल्दबाज़ी है, इच्छा है, क्षणिक है। हर क्षण अपना अलग रूप दिखाती है। प्रेम स्थिरता है, गंभीरता है, आत्मिक है। असर उसका क्षणिक न होकर स्थायी है।परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, बस प्रेम नहीं।
तो क्या प्रेम एक मनुष्य से करना संभव है?
क्या परिस्थितियाँ प्रेम में पड़ने या वासना में पड़ने के लिए बाध्य करती हैं? मेरे मत से, हाँ।
परिस्थितियाँ और आपके कर्म एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, लेकिन अपने कर्मों के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
कुछ सही-गलत समय के चक्र के साथ परस्पर बदलते रहते हैं, लेकिन वह भी परिस्थितियाँ ही करवाती हैं।
जिस प्रकार कुमारगिरि, जो एक संत होते हुए भी काम-वासना से अनभिज्ञ थे, परिस्थितियों के चक्र में फँसकर उसका अनुभव करने के लिए बाध्य हुए और फिर उस पर विजय भी प्राप्त की। वहीं बीजगुप्त, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भोग-विलास में व्यतीत किया था, उन्होंने सभी संपत्ति और भोग का त्याग करके चित्रलेखा के साथ एक भिक्षुक का जीवन जीने का निर्णय लिया।
हाँ, मैं मानता हूँ कि मनुष्य में हमेशा कमियाँ होती हैं। वह पूर्ण नहीं होता। उसका पूरा जीवन बेहतर बनने में व्यतीत होता है।
चित्रलेखा का चरित्र जटिल था। उसने अपने जीवनकाल में प्रेम की कई व्याख्याएँ दीं। चूँकि वह एक विधवा स्त्री थी और नर्तकी के रूप में विषय-वासनाओं में लीन रही, इसलिए उसके जीवन और उसके प्रेम को केवल एक दृष्टिकोण से समझना कठिन था। इसके बावजूद, वह अपने हर कर्म के पीछे तर्क रखती थी और एक ज्ञानी एवं विचारशील स्त्री थी।
फिर मेरे कुछ सवाल हैं—
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने तर्क और दृष्टिकोण के भीतर स्वयं को सही मानता है, तो क्या केवल तर्क-वितर्क के आधार पर सही और गलत के बीच कोई वस्तुनिष्ठ भेद स्थापित किया जा सकता है? यदि नहीं, तो फिर सही और गलत की कसौटी क्या है?
फिर तर्क-वितर्क भी परिस्थितियों के अनुसार बदलते हैं?
क्या सच में वासनाओं का त्याग आत्मा का त्याग है, या सुख का त्याग है? क्या सांसारिक जीवन को त्यागना अकर्मण्यता की निशानी है? और अगर है, तो क्या अकर्मण्य होना भी नकारात्मक है? आखिर कर्म तो हर स्थिति में होता ही है—कर्म का चक्र कभी रुकता नहीं?
मेरे मतानुसार, जिस प्रकार प्रेम स्थिरता का प्रतीक है और वासना चंचलता का। चूँकि मन चंचल है, इसलिए अस्थिर मन के लिए सुख भी क्षणिक ही होगा। स्थिर मन यह समझ सकेगा कि यह सुख-दुःख का चक्र है, इसलिए न तो वह सुख में अति प्रसन्न होगा और न ही दुःख में अति दुखी।
मनुष्य परिस्थितियों के सर्वथा अधीन है और रहेगा। इसलिए उसे अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए यह स्वीकार करना चाहिए कि हर चीज़ उसके काबू में नहीं हो सकती। अपने कर्तव्य और कर्म करते रहना, चाहतों और इच्छाओं के अधीन हुए बिना, और जीवन जहाँ ले जाए, उसके प्रवाह में स्वयं को ढालते रहना, यही जीवन है।
निरंतर बेहतर होने की चाह ही तो जीवन है।