
तारा
अक्सर एक तारा चांद के साथ चलता है!
जुगनू की फिदरत वाला वो,
सितारों की बाहें छोड़ निकलता है,
जब क़रीब चांद के होता है तो,
बेशुमार हो बेवख्त धड़कता है...
तोड़ कर मर्यादा आसमानों की,
जब वो वक्त से पहले दरीचा
खोल निकलता है,
अक्सर एक तारा चांद के साथ चलता है!
जिसके प्रेम का आंचल ओढ़,
चांद भी मेहफूज निकलता है,
कैसा बन गया है वो बैरागी,
जो अपने ही बस्ती से बैर करता है,
है अपनी मुनव्वर का पर्दानशी वो,
और खुद को चांदनी का चर्बा बताता है,
*मुनव्वर–रौशनी *चर्बा– नक़ल
अक्सर एक तारा चांद के साथ चलता है!
सजावट को सितारे, श्रृंगार को ओस की
बूंदे लगाता है,
वो फसलों की गोद में इश्क बिछाता है,
इस्तक़बाल में बना देता है वो,
जमीं पर निगाहों को पायदान, *इस्तक़बाल:– स्वागत
और जिस क़दर वो दरबान बना रहता है,
मानो रूखसार पर कोई तिल बिठा रखता है..
*रूखसार:–गाल
अक्सर एक तारा चांद के साथ चलता है!