





History of Abhisara (Part-2)
Abhira King Abisares role at the time of Hydaspes Battle and his agreement with Alexander the great.
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Abhira King Abisares role at the time of Hydaspes Battle and his agreement with Alexander the great.
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Abhira King Abisares and his Kingdom (Part -1)
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In this post
Who was King Abisares (Slide 2)
Kingdom of Abisares (Slide 3-4)
Abisares relation with Porus (Slide 5)
After the battle of Hydaspes (Slide 6-7)
Successor of Abisares (Slide 8)
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A detailed post on the agreement between Abisares and Alexander and his role in the Battle of Hydaspes will come in future.
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शूद्रक एक भारतीय नाटककार थे, जिनके कुछ संस्कृत नाटक काफी प्रसिद्ध है, जैसे कि मृच्छकटिक, विनवासवदत्ता, और भान (लघु एकांकी एकालाप) एवं पद्मप्रभृतक। मृच्छकटिक की प्रस्तावना के अनुसार, वह एक राजा थे; कुछ इतिहासकारों का मानना है कि, वह तीसरी शताब्दी के आभीर राजा रहे होंगे।
शूद्रक की पहचान को लेकर इतिहासकारों के बीच विवाद है, हालांकि किसी भी ऐतिहासिक अभिलेख में शूद्रक नाम के राजा का उल्लेख नहीं है। मृच्छकटिक के पहले चार भाग वस्तुतः भास के अधूरे नाटक चारुदत्तम के संगत भागों की नकल हैं। इसे लेकर एक सिद्धांत यह है कि मृच्छकटिक के कवि ने भास के नाटक को उनके सम्मान में पूरा किया, और खुद को भास का शूद्रक यानी "छोटा सेवक" बताया।
भास ने केवल ब्राह्मण कथा लिखा था परंतु मृच्छकटिक में शूद्रक ने गोप - उत्थान भी लिखा जिससे यह स्पष्ट होता है कि वो गोप/अहीर जाति के थे। यह नाटक प्रद्योत राजवंश के काल पर आधारित है, जिसमें आभीर राजा प्रद्योत महासेन के पौत्र आर्यक को तख्तापलट कर राजा बनते हुए दिखाया गया है।
इतिहासकार स्टेन कोनोव के अनुसार शूद्रक तीसरी शताब्दी के किसी आभीर राजा का उपनाम था, संभवतः शिवदत्त (ईश्वरसेन के पिता)।
संदर्भ :-
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Suggested Reading:
महाराजा चेटक लिच्छवी गणराज्य के गण मुखिया एवं वज्जि महासंघ के प्रमुख थे। मगध-वज्जि युद्ध के दौरान उन्होंने वज्जि महासंघ का नेतृत्व किया था।
महाराजा चेटक का जन्म हैहय वंश में हुआ था, जो यादवों की एक शाखा है। उनके पिता का नाम केका एवं माता का नाम यशोमति था। चेटक स्वयं लिच्छवि वंश से नहीं थे, लेकिन वे लिच्छवि गणसंघ की प्रशासनिक परिषद के नौ निर्वाचित राजाओं में से एक थे और इस परिषद के प्रमुख थे। लिच्छवी परिषद के नेता के रूप में, चेटक गणराज्य के निर्वाचित प्रमुख भी थे, जिससे वह लिच्छवियों द्वारा संचालित वज्जि महासंघ के प्रमुख भी थे।
चेटक की विभिन्न रानियों से सात पुत्री थी, जिनमें से शिवादेवी नामक राजकुमारी का विवाह अवंति के आभीर शासक प्रद्योत महासेन से हुआ था। एक अन्य पुत्री चेल्लना का विवाह शांति संधि के तहत मगध के राजा बिम्बिसार से हुआ।
• मगध-वज्जि युद्ध में भूमिका :-
अजातशत्रु और वज्जि महासंघ के बीच युद्ध की प्रगति के विवरण के संबंध में, जैन और बौद्ध साहित्य में व्यापक भिन्नता है। ए.एल. बाशम के अनुसार, युद्ध लंबा था और इसके कम से कम दो चरण थे। जैन लेखकों के अनुसार यह 16 वर्षों से भी अधिक समय तक चलता रहा।
जैन साहित्य में युद्ध की प्रगति के विवरण के संबंध में में लिखा है कि बिम्बिसार ने अपने दो युवा पुत्रों हल्ला और वेहल्ला को, अपना सेचनाका नामक हाथी और 18 लड़ियों का एक बड़ा हार दिया था। जब अजातशत्रु राजा बना, तो उसने हल्ला और वेहल्ला से हाथी और हार वापस करने को कहा। उन्होंने इनकार कर दिया और वैशाली में अपने नाना चेटक के यहां शरण ले ली। अजातशत्रु ने चेटक पर दबाव डाला कि वह हल्ला और वेहल्ला को उसे सौंप दे लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। ऐसी परिस्थिति में मगध और वैशाली के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया। बौद्ध परंपरा के अनुसार गंगा नदी के किनारे एक गाँव के पास एक हीरे की खदान थी। अजातशत्रु और वज्जि के लिच्छवियों के बीच एक समझौता हुआ था कि उन्हें हीरों का बराबर हिस्सा मिलेगा। हालाँकि, सरासर आलस्य के कारण, अजातशत्रु अपना हिस्सा लेने में विफल रहा, और अधिकांश हीरे लिच्छवि ले गए। समय के साथ, आखिरकार, अजातशत्रु परेशान हो गया और इस बारे में कुछ करने का फैसला किया। चूंकि उन्होंने सोचा कि वैशाली के पूरे महासंघ के खिलाफ लड़ना लगभग असंभव हो सकता है, इसलिए उन्होंने शक्तिशाली लिच्छवियों को उखाड़ फेंकने और उन्हें खत्म करने का फैसला किया।
इतिहासकारों का मानना है कि जैन व बौद्ध साहित्यों में बताए गए सभी कारणों से मगध व वज्जि के बीच युद्ध की स्थिति बन गयी। इन साहित्यों के आधार पर इतिहासकार जेपी शर्मा ने लिखा है कि अजातशत्रु, जो बिम्बिसार का एक अन्य पुत्र था, ने बिम्बिसार की हत्या कर दी और मगध की गद्दी हड़प ली थी तब लिच्छवियों ने अजातशत्रु के खिलाफ उसके छोटे सौतेले भाई हल्ला व वेहल्ला द्वारा किए गए विद्रोह का समर्थन किया। ये दोनों राजकुमार चेटक की पुत्री चेल्लाना और बिम्बिसार के पुत्र थे। लिच्छवियों ने अजातशत्रु को हटाकर वेहल्ला को मगध की गद्दी पर बिठाने का प्रयास किया था परंतु विद्रोह की विफलता के बाद, वेहल्ला व हल्ला ने लिच्छवि गणराज्य की राजधानी वैशाली में अपने नाना चेटक के घर शरण ली। अजातशत्रु ने लिच्छवियों-वज्जियों के साथ बार-बार बातचीत करने का प्रयास किया मगर प्रयास विफल होने के बाद, उन्होंने लगभग 484 ईसा पूर्व में वज्जि महासंघ के खिलाफ युद्ध की तैयारी में जुट गए।
युद्ध शुरू होने से पहले चेटक ने लिच्छवि और मल्ल गणराज्य के राजाओं के साथ युद्ध परामर्श किया, जिसके बाद महासंघ के सभी गणराजा लड़ने के लिए तैयार हो गए। वहीं दूसरी ओर वज्जि महाजनपद की शक्ति को देखते हुए अजातशत्रु ने अपने सौतेले भाइयों कालकुमारों (10 कालकुमार, जो राजा बिम्बिसार और 10 काली रानियों काली, सुकाली, महाकाली आदि से पैदा हुए थे) को अपनी सेना में शामिल करने के लिए बुलाया एवं सलाह लेने के लिए अपने प्रधानमंत्री वस्साकार को बुद्ध के पास भेजा। जिसके बाद यह निष्कर्ष निकला कि वज्जियों को केवल कूटनीति के माध्यम से ही हराया जा सकता था। जिसके बाद अजातशत्रु ने वस्साकार को वैशाली में वज्जियों के बीच फूट के बीज बोने के अभियान पर भेज दिया। वस्साकार अपने जासूसों के साथ तीन वर्षों तक वैशाली में रहे। इतिहासकारों के अनुसार इन तीन वर्षों में अजातशत्रु ने युद्ध की तैयारी के साथ साथ दुश्मन के खिलाफ रक्षा और त्वरित हमलों के लिए पट्टानागमा की भारी किलेबंदी की थी। मगध के सैनिकों ने युद्ध के नए, उन्नत रूप विकसित किए और दुश्मन की सेना को दूर से और नजदीक से अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए महाशिलाकंटक और एक रथमूशल जैसे हथियारों का आविष्कार किया। जबकि वज्जि महाजनपद के गणराजा एक-दूसरे को मात दे रहे थे। जब ईर्ष्या के के कारण वज्जियों ने अपनी एकजुटता, सद्भाव खो दी तब वस्साकार ने मगध नरेश को संदेश भेजा।
वस्साकार का संदेश पाकर अजातशत्रु ने युद्ध की घोषणा करते हुए अपने सैनिकों के साथ 10 सौतेले भाइयों को वज्जियों पर आक्रमण के लिए भेजा।
वज्जि सीमा पर शत्रु के अचानक प्रकट होने से लिच्छवि घबरा गये। अंततः सेनाएँ आपस में भिड़ीं, तो चेटक ने शक्तिशाली ढंग से लड़ाई लड़ी और दस दिनों की कड़ी लड़ाई में अजातशत्रु के प्रत्येक सौतेले भाई को मार गिराया। मगध सेना को पराजय की ओर जाते देख युद्ध में स्वयं अजातशत्रु पहुँचे, उन्होंने महाशिलाकंटक एवं रथमूशल नामक हथियारो का प्रयोग किया और लिच्छवियों को पराजित कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। जिसके बाद, चेटक और अन्य वज्जियों ने तुरंत वैशाली शहर के अंदर शरण ली और मुख्य द्वार को बंद कर दिया।
वैशाली के चारों ओर की दीवारें इतनी मजबूत थीं कि अजातशत्रु उन्हें तोड़ने में असमर्थ था और घेराबंदी लंबे समय तक चला। जैन धर्मग्रंथों के आधार पर इतिहासकारों ने लिखा है कि कुलवल्य नामक एक साधु ने अजातशत्रु द्वारा भेजी गई एक सुंदर वेश्या के जाल में फंसकर अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी और वेश्या के उकसावे पर वज्जियों को धोखा देकर वैशाली के दरवाजे खोल दिए तथा पूर्व नियोजित योजना के अनुसार अजातशत्रु को संकेत दे दिया। यह अंतिम आक्रमण था, जिसके बाद वैशाली पर अजातशत्रु ने विजय प्राप्त की।
युद्ध में वज्जियों के हार के बाद महाराजा चेटक ने सल्लेखना नामक जैन अनुष्ठान करके अपने प्राण त्याग दिए। एक अन्य स्रोत में वर्णित है कि उन्होंने एक लोहे की मूर्ति को अपने गले में बांधकर एक कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली।
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Must Read:
श्री गोपराजा गुप्त साम्राज्य के अधीन एक कुलीन अहीर सामंत तथा सेना प्रमुख थे। वे युद्धकला एवं राजनीति दोनों में माहिर थे। उनकी कुशलता देख गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बालादित्य उन्हें साम्राज्य के सबसे कठिन कार्यों का भार सौंपते थे। श्री गोपराजा मालवा के उपारिका/गवर्नर राजा भानुगुप्त के अच्छे मित्र थे, जिनके साथ वे एरण (सागर जिला, मध्यप्रदेश) गए थे।
श्री गोपराजा के पिता का नाम राजा माधव था एवं उनकी माता सरभ राजा की बेटी थी।
सम्राट बालादित्य के शासन के दौरान मगध साम्राज्य की सीमाओं पर कई आक्रमण होते थे। कभी पश्चिम के राज्यों की सेना तो कभी हूणों के सरदार मगध साम्राज्य की सीमा पर घुसपैठ करते थे, जिसके कारण मगध के कई सामंत व सेना प्रमुखों को मगध छोड़ सीमा पर तैनात किया जाता था ताकि वे युद्ध में सीमा पर तैनात सैनिकों का साथ दे सकें। सीमा पर तैनात श्री गोपराजा ने पश्चिम के छोटे राज्यों जंगली कबीलों और हूणों से अनेकों युद्ध लड़े और विजई हुए।
एरन शिलालेख के अनुसार भानुगुप्त और उनके सहयोगी गोपराजा ने सन 510 में गुप्त साम्राज्य के शत्रुओं के साथ एक युद्ध लड़ा था। इन शत्रुओं की पहचान इतिहासकारों ने हूणों के सरदार तोरामान या मैत्रक राज्य की सेना से की है। इस युद्ध में मगध की सेना को भारी नुकसान पहुंचा और श्री गोपराजा वीरगति को प्राप्त हुए।
एरण युद्ध के पश्चात श्री गोपराजा की धर्मपत्नी ने सती प्रथा के अनुसार अपने स्वर्गीय पति की चिता में बैठ अपने प्राण त्याग दिए। यह शिलालेख भारत में सती प्रथा के होने का सबसे प्राचीन पुरातात्त्विक प्रमाण है। इस शिलालेख को 'एरण का सती शिलालेख' भी कहा जाता है।
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Further Reading:
अवंति महाजनपद के आभीर :
प्रद्योत वंश भारत का एक प्राचीन राजवंश था, जिसने उज्जैन को राजधानी बना अवंति महाजनपद पर शासन किया था जो भारूकच्छ से कौशाम्बी तक के क्षेत्र में फैला हुआ था। कुछ पुराणों के अनुसार इस वंश के 5 शासकों ने 138 वर्षों तक शासन किया था।
प्रद्योत राजाओं ने इस वंश को प्रद्योत नाम प्रद्योत महासेन से मिली है जो इस राजवंश के पहले शासक थे।
उत्पत्ति :
प्रद्योत वंश को लेकर इतिहासकारों का एक ही मत है, वो ये मानते है कि प्रद्योत वंश के शासक अभीर जाति से थे।
● इतिहासकार डी. आर भंडारकर ने भी अपने पुस्तक इंडियन कल्चर में इस बात की पुष्टि की है।
● इसकी पुष्टि शूद्रक ने मृच्छकटिकम् में भी किया है।
इतिहास :
शुरुआती इतिहास की बात करें तो इस वंश का पहले शासक प्रद्योत महासेन थे, जो पुलिका के पुत्र थे। पुलिका ने ही अवंति के राजा को मारकर अपने पुत्र को उज्जैन के सिंहासन पर बिठाया था।
उस काल में प्रद्योत महासेन को उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली शासक में से एक माना जाता था। मगध के राजा बिम्बिसार इनके समकालीन थे, जिनके साथ प्रद्योत का अच्छा संबंध था हालांकि अजातशत्रु के राजा बनते ही मगध व अवंति के बीच का संघर्ष शुरू हुआ जो मगध के हर्यंका वंश के खत्म होने के बाद भी शिसुनाग वंश के साथ चला।
प्रद्योत महासेन ने वज्जिका राज्य की राजकुमारी शिवा से विवाह किया था जो राजा चेटक की पुत्री थी। प्रद्योत ने 23 वर्षों तक शासन किया, इनके दो पुत्र थे गोपाल एवं पालक।
प्रद्योत के बाद उनके पुत्र छोटे पुत्र पालक राजा बने, जो अपने पिता की तरह ही एक शक्तिशाली शासक थे, इन्होंने अपने शासनकाल में कौशाम्बी के राजा उदयिन को मारकर उसके राज्य को अवंति साम्राज्य में मिला लिया था। जिसके बाद अवंति की सीमा मगध राज्य तक पहुँच चुकी थी। इन्होंने कुल 25 वर्षों तक शासन किया।
पालक के बाद 2 अन्य राजाओं का वर्णन है जो उनके बाद राज्य को संभाला। पहला उनका पुत्र विशाखायुपा था जो माहिष्मती के कुछ बाहरी हिस्सों पर शासन किया और दूसरा गोपाल के पुत्र आर्यक थे जिन्होंने पालक के मृत्यु के तुरंत बाद अवंती साम्राज्य के सिंहासन पर विद्रोह कर कब्जा कर लिया था।
विशाखायूप और आर्यक समकालीन थे। संभवतः उस दौरान अवंति दो भागों में बंटा हुआ था और सबसे बड़े हिस्से पर गोपाल पुत्र आर्यक का शासन था।
अगले राजा नंदिवर्धन हुए, जो इस वंश के आखिरी शासक थे।
मगध राजा शिशुनाग के हाथों इनकी हार हुई और इस तरह से अवंति व मगध के बीच 100 वर्षों से भी अधिक समय से चलती आ रही संघर्ष प्रद्योत राजवंश के हार के साथ खत्म हुई।
राजाओं की सूची :
प्रद्योत महासेन
पालक
विशाखायुपा
आर्यक
नंदिवर्धन
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Sources :
Malwa Through Ages
The Journal of Bihar Research society
Indian Culture : Journal of Indian Research Institute, Volume 1, Issue 2
Mrcchakatika, the little clay cart: A drama in ten acts attributed to King Sudrak, Volume 23
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Map Credit - u/vasusenabvll
Post By - u/yaduvanshi_samrajya
शूद्रक भारत के सबसे प्रसिद्ध एवं प्राचीन आभीर नाटककारों में से एक थे ।
Credit: u/abhira.kosha
Prerequisite(s):
गुप्त राजवंश लगभग 240-550 ईस्वी के बीच प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राजवंश था। जिसने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। इतिहासकारों द्वारा गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है। गुप्त शासकों ने अपनी राजधानी मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र को बनाई थी।
उत्पत्ति :
गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है -
गोप शब्द अहीरों के लिए प्राचीन समय से प्रयोग होते आया है। (मौजूदा समय में भी बिहार राज्य में 'गोप पदवी' का इस्तेमाल अहीरों द्वारा ही किया जाता है।) जनसाधारण की बोली में यही गोप शब्द गोप्ता में परिवर्तित हो गया। गोप के अन्य परिवर्तित शब्द गोपव, गोपति, गुप्त, गुप्ती, गोपत्री आदि है।
बिहार में, अभी भी कुछ यादव गुप्त को पदवी या उपनाम के रूप में नहीं बल्कि अपने शाखा/गोत्र के रूप में लिखते हैं। गोप, गुप्त, घोष, गोमी आदि जैसे कई पदवी है, जो आभीरों व उनकी संस्कृति से व्युत्पन्न हुए थे।
धार्मिक ग्रंथों में गुप्त वंश की जाति -
भागवत पुराण में गुप्त राजवंश को आभीर कहा गया है।
उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों का मत -
चौधरी बाबू राम ने अपनी पुस्तक में मगध साम्राज्य के गुप्त शासकों को बिहार के 'गोप जाति' का बताया है।
जेएन सिंह यादव ने गुप्त वंश को आभीरों से संबंधित लिखा है, उनके अनुसार गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है।
नेपाल और दक्कन में हुई खुदाई में मिले शिलालेखों से पता चला है कि गुप्त प्रत्यय आभीर राजाओं के बीच आम था एवं इतिहासकार डी.आर रेग्मी गुप्त राजवंश को आभीरों से जोड़ते है।
इतिहासकार केपी जायसवाल भी गुप्त राजवंश को आभीरों से संबंधित लिखे है।
गुप्त राजवंश का नेपाल के आभीर-गुप्त वंश से संबंध -
इतिहासकार डी.आर रेग्मी और केपी जायसवाल लिखते है कि 'गुप्त' प्रत्यय नेपाल के आभीर शासकों के बीच आम था। इन्हें नेपाल में अहीर या गोप या गोपाल या ग्वाला कहा जाता है, ये सभी शब्द एक दूसरे के लिए अदल-बदल कर इस्तेमाल किया जाता है, अर्थात पर्याय है।
डॉ केपी जैसवाल का विद्वत्तापूर्ण मत है कि नेपाल का 'आभीर-गुप्त वंश' मगध के 'गुप्त राजवंश' का एक शाखा है। इसी विषय में डी. आर. रेग्मी आगे लिखते है कि इतिहासकारों ने गुप्तों के अहीरों के रूप में जाति भेद के द्वारा स्थिति को और स्पष्ट किया है, जो न केवल दो राजवंशों के बीच पहचान का समर्थन करता है बल्कि साम्राज्यवादी गुप्तों की जाति की प्रकृति की भी पुष्टि करता है।
जायसवाल व रेग्मी के विद्वत्तापूर्ण मत से इतना तो साफ है कि ये दोनों इतिहासकार गुप्त राजवंश का आभीर जाति के होने की भी पुष्टि कर रहे है। इस मत की पुष्टि के लिए और भी कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं, जिसे अन्य पोस्ट में विस्तार से बताया जाएगा।
Prerequisite(s):
Art and Architecture
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Special Thanks to - u/lxanderyadav
Prerequisite(s):
Origin of the Gupta Dynasty
पार्ट-1 में हमने गुप्त शब्द की व्युत्पत्ति, मगध के गुप्त वंश की जाति के संबंध में इतिहासकारों की राय तथा आभीर राजाओं द्वारा गुप्त प्रत्यय के प्रयोग के बारे में बताया है।
इस पोस्ट में पुरातात्विक साक्ष्य जैसे कि जयगुप्त के सिक्के और उनपर अंकित इम्पीरियल गरुड़, वरसिम्हा/विरसेन के सिक्के और उनपर अंकित क्रमादित्य, जिष्णुगुप्त के शिलालेख में वर्णित सोमवंश और गुप्त राजाओं के सिक्कों पर अंकित चंद्र मानक आदि के विश्लेषण से इतिहासकारों को जो जानकारी प्राप्त हुई है उस विषय में विस्तार से बताया गया है। जिससे न केवल मगध के गुप्त वंश एवं नेपाल के अहीर-गुप्त वंश व अन्य अहीर राजाओं के बीच के संबंध स्पष्ट होते है बल्कि गुप्त राजाओं की जाति की भी पुष्टि होती है।
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पार्ट-3 में गुप्त वंश से जुड़े अन्य तथ्य, पुरातत्विक साक्ष्य और साहित्यिक स्रोत पोस्ट किए जाएंगे जो उनके गोप/अहीर होने की पुष्टि करते है।
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Prerequisite(s):
Origin and History
आभीर-गुप्त वंश नेपाल का एक प्राचीन राजवंश था, जिसने काठमांडू घाटी सहित तराई क्षेत्र पर शासन किया था। इस वंश के श्री रविगुप्त, श्री भौमगुप्त, श्री जिष्णुगुप्त, श्री विष्णुगुप्त ने नेपाल के सह-शासक के रूप में शासन किया।
उत्पत्ति :-
नेपाल के गुप्त शासक अहीर जाती के थे, जिसकी पुष्टि विभिन्न शिलालेखों एवं वंशावलियों से होती है। थानकोट शिलालेख में जिष्णुगुप्त ने स्वयं को सोमवंश-भूषण बताया है, जिससे अहीर-गुप्तों का चंद्रवंश से संबंध का पता चलता है।
• मगध के गुप्तों से संबंध -
घाटी के गुप्त शासक और मगध के गुप्त शासक दोनों ही अहीर/गोप जाती के थे और संभवतः एक दूसरे से संबंधित भी थे जिसकी पुष्टि दोनो राजवंशों की सामान्य संस्कृति, मुद्रा प्रणाली, गरुड़ चिन्ह इत्यादि से होती है।
इतिहास :-
शिलालेखों से पता चलता है कि आभीर-गुप्त पहले लिच्छवी दरबार में पदाधिकारी थे लेकिन जल्द ही कुछ गुप्त शक्तिशाली व्यक्तियों के रूप में उभरे, जिन्होंने न केवल लिच्छवियों के साथ शासन साझा किया बल्कि कुछ समय के लिए उन्हें को पूरी तरह से उखाड़ फेंका और अकेले शासन किया।
शिलालेखों एवं वंशावलियों से आभीर-गुप्त वंश के कई सदस्यों के नाम का पता चलता है जैसे कि भीमगुप्त, मानगुप्त, महेंद्रमति, रविगुप्त, आभीरी गोमिनी, भौमगुप्त, जिष्णुगुप्त, विष्णुगुप्त, जयगुप्त द्वितीय, श्रीधरगुप्त।
इस वंश के प्रथम शासक रविगुप्त थे, जिन्होंने नेपाल के वास्तविक शासक के रूप में लिच्छवी राजा बसंतदेव के साथ शासन साझा किया था। इससे पहले वह लिच्छवि दरबार में सर्वदंडनायक और महाप्रतिहार के पद पर थे। इनके बाद भौमगुप्त हुए, जो 567 ई. से 590 ई. तक नेपाल के सह-शासक थे। वह तीन लिच्छवी राजा, गणदेव, गंगादेव और शिवदेव के शासनकाल के दौरान प्रधान मंत्री थे। इसके अलावा उन्होंने सर्वदंडनायक और महाप्रतिहार का पद भी संभाला था। जिष्णुगुप्त को इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। प्रारंभ में वह लिच्छवी राजा के साथ सह-शासक थे लेकिन बाद में कुछ वर्षों तक एकमात्र शासक के रूप में शासन किये। उन्होंने अपने नाम से सिक्के भी जारी किये थे। इनके पुत्र विष्णुगुप्त अहीर-गुप्त वंश के अंतिम शासक थे। विष्णुगुप्त के संक्षिप्त शासनकाल के दौरान नरेंद्रदेव ने तिब्बती राजा की मदद से नेपाल में आभीर शासन को खत्म कर दिया।
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