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प्रद्योत राजवंश

अवंति महाजनपद के आभीर :

प्रद्योत वंश भारत का एक प्राचीन राजवंश था, जिसने उज्जैन को राजधानी बना अवंति महाजनपद पर शासन किया था जो भारूकच्छ से कौशाम्बी तक के क्षेत्र में फैला हुआ था। कुछ पुराणों के अनुसार इस वंश के 5 शासकों ने 138 वर्षों तक शासन किया था।

प्रद्योत राजाओं ने इस वंश को प्रद्योत नाम प्रद्योत महासेन से मिली है जो इस राजवंश के पहले शासक थे।

उत्पत्ति :

प्रद्योत वंश को लेकर इतिहासकारों का एक ही मत है, वो ये मानते है कि प्रद्योत वंश के शासक अभीर जाति से थे।

● इतिहासकार डी. आर भंडारकर ने भी अपने पुस्तक इंडियन कल्चर में इस बात की पुष्टि की है।

● इसकी पुष्टि शूद्रक ने मृच्छकटिकम् में भी किया है।

इतिहास :

शुरुआती इतिहास की बात करें तो इस वंश का पहले शासक प्रद्योत महासेन थे, जो पुलिका के पुत्र थे। पुलिका ने ही अवंति के राजा को मारकर अपने पुत्र को उज्जैन के सिंहासन पर बिठाया था।

उस काल में प्रद्योत महासेन को उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली शासक में से एक माना जाता था। मगध के राजा बिम्बिसार इनके समकालीन थे, जिनके साथ प्रद्योत का अच्छा संबंध था हालांकि अजातशत्रु के राजा बनते ही मगध व अवंति के बीच का संघर्ष शुरू हुआ जो मगध के हर्यंका वंश के खत्म होने के बाद भी शिसुनाग वंश के साथ चला।

प्रद्योत महासेन ने वज्जिका राज्य की राजकुमारी शिवा से विवाह किया था जो राजा चेटक की पुत्री थी। प्रद्योत ने 23 वर्षों तक शासन किया, इनके दो पुत्र थे गोपाल एवं पालक।

प्रद्योत के बाद उनके पुत्र छोटे पुत्र पालक राजा बने, जो अपने पिता की तरह ही एक शक्तिशाली शासक थे, इन्होंने अपने शासनकाल में कौशाम्बी के राजा उदयिन को मारकर उसके राज्य को अवंति साम्राज्य में मिला लिया था। जिसके बाद अवंति की सीमा मगध राज्य तक पहुँच चुकी थी। इन्होंने कुल 25 वर्षों तक शासन किया।

पालक के बाद 2 अन्य राजाओं का वर्णन है जो उनके बाद राज्य को संभाला। पहला उनका पुत्र विशाखायुपा था जो माहिष्मती के कुछ बाहरी हिस्सों पर शासन किया और दूसरा गोपाल के पुत्र आर्यक थे जिन्होंने पालक के मृत्यु के तुरंत बाद अवंती साम्राज्य के सिंहासन पर विद्रोह कर कब्जा कर लिया था।

विशाखायूप और आर्यक समकालीन थे। संभवतः उस दौरान अवंति दो भागों में बंटा हुआ था और सबसे बड़े हिस्से पर गोपाल पुत्र आर्यक का शासन था।

अगले राजा नंदिवर्धन हुए, जो इस वंश के आखिरी शासक थे।

मगध राजा शिशुनाग के हाथों इनकी हार हुई और इस तरह से अवंति व मगध के बीच 100 वर्षों से भी अधिक समय से चलती आ रही संघर्ष प्रद्योत राजवंश के हार के साथ खत्म हुई।

राजाओं की सूची :

  1. प्रद्योत महासेन

  2. पालक

  3. विशाखायुपा

  4. आर्यक

  5. नंदिवर्धन

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Sources :

  1. Malwa Through Ages

  2. The Journal of Bihar Research society

  3. Indian Culture : Journal of Indian Research Institute, Volume 1, Issue 2

  4. Mrcchakatika, the little clay cart: A drama in ten acts attributed to King Sudrak, Volume 23

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Map Credit - u/vasusenabvll
Post By - u/yaduvanshi_samrajya

u/Kramadityah — 5 days ago
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गुप्त राजवंश (पार्ट -1)

गुप्त राजवंश लगभग 240-550 ईस्वी के बीच प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राजवंश था। जिसने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। इतिहासकारों द्वारा गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है। गुप्त शासकों ने अपनी राजधानी मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र को बनाई थी।

उत्पत्ति :
गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है -
गोप शब्द अहीरों के लिए प्राचीन समय से प्रयोग होते आया है। (मौजूदा समय में भी बिहार राज्य में 'गोप पदवी' का इस्तेमाल अहीरों द्वारा ही किया जाता है।) जनसाधारण की बोली में यही गोप शब्द गोप्ता में परिवर्तित हो गया। गोप के अन्य परिवर्तित शब्द गोपव, गोपति, गुप्त, गुप्ती, गोपत्री आदि है।

बिहार में, अभी भी कुछ यादव गुप्त को पदवी या उपनाम के रूप में नहीं बल्कि अपने शाखा/गोत्र के रूप में लिखते हैं। गोप, गुप्त, घोष, गोमी आदि जैसे कई पदवी है, जो आभीरों व उनकी संस्कृति से व्युत्पन्न हुए थे।

धार्मिक ग्रंथों में गुप्त वंश की जाति -
भागवत पुराण में गुप्त राजवंश को आभीर कहा गया है।

उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों का मत -
चौधरी बाबू राम ने अपनी पुस्तक में मगध साम्राज्य के गुप्त शासकों को बिहार के 'गोप जाति' का बताया है।

जेएन सिंह यादव ने गुप्त वंश को आभीरों से संबंधित लिखा है, उनके अनुसार गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है।

नेपाल और दक्कन में हुई खुदाई में मिले शिलालेखों से पता चला है कि गुप्त प्रत्यय आभीर राजाओं के बीच आम था एवं इतिहासकार डी.आर रेग्मी गुप्त राजवंश को आभीरों से जोड़ते है।

इतिहासकार केपी जायसवाल भी गुप्त राजवंश को आभीरों से संबंधित लिखे है।

गुप्त राजवंश का नेपाल के आभीर-गुप्त वंश से संबंध -
इतिहासकार डी.आर रेग्मी और केपी जायसवाल लिखते है कि 'गुप्त' प्रत्यय नेपाल के आभीर शासकों के बीच आम था। इन्हें नेपाल में अहीर या गोप या गोपाल या ग्वाला कहा जाता है, ये सभी शब्द एक दूसरे के लिए अदल-बदल कर इस्तेमाल किया जाता है, अर्थात पर्याय है।

डॉ केपी जैसवाल का विद्वत्तापूर्ण मत है कि नेपाल का 'आभीर-गुप्त वंश' मगध के 'गुप्त राजवंश' का एक शाखा है। इसी विषय में डी. आर. रेग्मी आगे लिखते है कि इतिहासकारों ने गुप्तों के अहीरों के रूप में जाति भेद के द्वारा स्थिति को और स्पष्ट किया है, जो न केवल दो राजवंशों के बीच पहचान का समर्थन करता है बल्कि साम्राज्यवादी गुप्तों की जाति की प्रकृति की भी पुष्टि करता है।

जायसवाल व रेग्मी के विद्वत्तापूर्ण मत से इतना तो साफ है कि ये दोनों इतिहासकार गुप्त राजवंश का आभीर जाति के होने की भी पुष्टि कर रहे है। इस मत की पुष्टि के लिए और भी कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं, जिसे अन्य पोस्ट में विस्तार से बताया जाएगा।

Prerequisite(s):

1. https://www.reddit.com/r/Aabheer/s/HsYJteVqE0

  1. https://www.reddit.com/r/Aabheer/s/0Q7kTLljQp
u/Kramadityah — 7 days ago
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गुप्त राजवंश (पार्ट-2)

Origin of the Gupta Dynasty

पार्ट-1 में हमने गुप्त शब्द की व्युत्पत्ति, मगध के गुप्त वंश की जाति के संबंध में इतिहासकारों की राय तथा आभीर राजाओं द्वारा गुप्त प्रत्यय के प्रयोग के बारे में बताया है।

इस पोस्ट में पुरातात्विक साक्ष्य जैसे कि जयगुप्त के सिक्के और उनपर अंकित इम्पीरियल गरुड़, वरसिम्हा/विरसेन के सिक्के और उनपर अंकित क्रमादित्य, जिष्णुगुप्त के शिलालेख में वर्णित सोमवंश और गुप्त राजाओं के सिक्कों पर अंकित चंद्र मानक आदि के विश्लेषण से इतिहासकारों को जो जानकारी प्राप्त हुई है उस विषय में विस्तार से बताया गया है। जिससे न केवल मगध के गुप्त वंश एवं नेपाल के अहीर-गुप्त वंश व अन्य अहीर राजाओं के बीच के संबंध स्पष्ट होते है बल्कि गुप्त राजाओं की जाति की भी पुष्टि होती है।
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पार्ट-3 में गुप्त वंश से जुड़े अन्य तथ्य, पुरातत्विक साक्ष्य और साहित्यिक स्रोत पोस्ट किए जाएंगे जो उनके गोप/अहीर होने की पुष्टि करते है।
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u/Kramadityah — 7 days ago
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आभीर-गुप्त राजवंश (पार्ट-1)

Origin and History

आभीर-गुप्त वंश नेपाल का एक प्राचीन राजवंश था, जिसने काठमांडू घाटी सहित तराई क्षेत्र पर शासन किया था। इस वंश के श्री रविगुप्त, श्री भौमगुप्त, श्री जिष्णुगुप्त, श्री विष्णुगुप्त ने नेपाल के सह-शासक के रूप में शासन किया।

उत्पत्ति :-
नेपाल के गुप्त शासक अहीर जाती के थे, जिसकी पुष्टि विभिन्न शिलालेखों एवं वंशावलियों से होती है। थानकोट शिलालेख में जिष्णुगुप्त ने स्वयं को सोमवंश-भूषण बताया है, जिससे अहीर-गुप्तों का चंद्रवंश से संबंध का पता चलता है।

• मगध के गुप्तों से संबंध -
घाटी के गुप्त शासक और मगध के गुप्त शासक दोनों ही अहीर/गोप जाती के थे और संभवतः एक दूसरे से संबंधित भी थे जिसकी पुष्टि दोनो राजवंशों की सामान्य संस्कृति, मुद्रा प्रणाली, गरुड़ चिन्ह इत्यादि से होती है।

इतिहास :-
शिलालेखों से पता चलता है कि आभीर-गुप्त पहले लिच्छवी दरबार में पदाधिकारी थे लेकिन जल्द ही कुछ गुप्त शक्तिशाली व्यक्तियों के रूप में उभरे, जिन्होंने न केवल लिच्छवियों के साथ शासन साझा किया बल्कि कुछ समय के लिए उन्हें को पूरी तरह से उखाड़ फेंका और अकेले शासन किया।

शिलालेखों एवं वंशावलियों से आभीर-गुप्त वंश के कई सदस्यों के नाम का पता चलता है जैसे कि भीमगुप्त, मानगुप्त, महेंद्रमति, रविगुप्त, आभीरी गोमिनी, भौमगुप्त, जिष्णुगुप्त, विष्णुगुप्त, जयगुप्त द्वितीय, श्रीधरगुप्त।

इस वंश के प्रथम शासक रविगुप्त थे, जिन्होंने नेपाल के वास्तविक शासक के रूप में लिच्छवी राजा बसंतदेव के साथ शासन साझा किया था। इससे पहले वह लिच्छवि दरबार में सर्वदंडनायक और महाप्रतिहार के पद पर थे। इनके बाद भौमगुप्त हुए, जो 567 ई. से 590 ई. तक नेपाल के सह-शासक थे। वह तीन लिच्छवी राजा, गणदेव, गंगादेव और शिवदेव के शासनकाल के दौरान प्रधान मंत्री थे। इसके अलावा उन्होंने सर्वदंडनायक और महाप्रतिहार का पद भी संभाला था। जिष्णुगुप्त को इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। प्रारंभ में वह लिच्छवी राजा के साथ सह-शासक थे लेकिन बाद में कुछ वर्षों तक एकमात्र शासक के रूप में शासन किये। उन्होंने अपने नाम से सिक्के भी जारी किये थे। इनके पुत्र विष्णुगुप्त अहीर-गुप्त वंश के अंतिम शासक थे। विष्णुगुप्त के संक्षिप्त शासनकाल के दौरान नरेंद्रदेव ने तिब्बती राजा की मदद से नेपाल में आभीर शासन को खत्म कर दिया।
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Post By - @yaduvanshi_samrajya

u/Kramadityah — 10 days ago