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This is my first post on Reddit... Also my first poem... Be honest & let me know what needs improvement.

मेरा सपना है ---- एक घर!

पहले नहीं था - क्योंकि नासमझ थी,

मासूम थी, शायद आसान थी...

कठिन लड़कियों के घर नहीं होते - ऐसा समाज ने सिखाया है

कि जिन लड़कियों के विचार होते हैं

जिनके सशक्त किरदार होते हैं

जो कुछ तेज़ बोलती हैं, खुलकर हंसती हैं

हर तंज़ पे जवाब, हर सवाल पे उखड़ती हैं

जो कर बैठती हैं भूल समझने की आवास को ही अपनी आवाज़

वो इन चमकीले मकानों की भीड़ में भी

रह जाती हैं ----- बेघर, बेलिबास.....

ऐसा नहीं है कि घर नहीं

हैं कई, मगर अपना एक नहीं

भला पिता का घर किसका नहीं होता

मगर बेशर्त तो यहाँ पे भी अपनापन नहीं होता

एक दिन बक्से में समेट, हर आँसू हर किलकारी को

जाना ही पड़ता है छोड़ इस चार दीवारी को

सफ़र अब थोड़ा अलग होगा, नई शैली, नया भरम होगा

"तुम्हारा ही घर है ये", ऐसा तुम्हें बताया जाएगा

अपना कहकर पराया कैसे होते हैं, ये जताया जाएगा

सीख जाती हैं लड़कियाँ अक्सर इसी कशमकश में जीना,

जो होती हैं विद्रोही, रह जाती हैं वो फिर किसी छाया के बिना

कुछ कर मेहनत, हिम्मत निकल जाती हैं परदेस

लेकर ख्वाब अपने एक घरौंदे की

मगर बहुत जल्द समझ आ जाता है उन्हें भी

कि आसमान से ज़्यादा एक घोंसला होता है ज़रूरत परिंदे की

थक कर जब टूट जाते हैं हौसले, इरादे, और आक्रोश

तो होता है छत के नीचे होते हुए बेघर होने का अफसोस...

तो अब ये सपना है मेरा

कि मेरा एक घर होगा

जहाँ न मायका का संस्कार होगा

ना ससुराल जैसा तिरस्कार होगा

नहीं होंगी खिड़कियाँ, जिससे समाज झांके

ना कोई देहरी होगी जिसे मेरी खुली सोच लांघे

जहाँ किसी के शर्त की एक लकड़ी नहीं होगी

"अरे तुम लड़की हो" जैसी दीमक किसी दरवाज़े ने पकड़ी न होगी

होगा मेरा भी एक घर और तुम आना उस मकान पे

सुनना मेरी कहानी, करना कुछ गौर मेरे इम्तेहान पे

बताऊंगी तुम्हें बड़े ही गर्व से, कि कैसे यहाँ जमी धूल की कण कण पे मेरा हक़ है

है हर दीवार पे ऐतबार मुझे, यहाँ अंधेरे पे भी मुझे ना कोई शक़ है

बैठूंगी मैं खुद के साथ हर शाम अकेली किसी कमरे में

निहारूंगी ढलता सूरज, बिना किसी जल्दबाज़ी या झिझक के

पहनूंगी, हंसूंगी, करूंगी बेवक्त आराम बिना किसी हिचक के

उड़ा लेना मज़ाक जो लगे तुम्हें ये बचकानी मेरी हरकतें

मगर देखना, होगा मेरा ये सपनों का घर एक दिन बेशर्तें....

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