I created my first HINDI POEM so please give a feedback even if it's really bad
हमारे घर का वो सफ़ेद पर्दा
जो अब नया नहीं लगता।
उसके पीछे
पुराने डब्बे पड़े हैं,
जो शायद कभी काम आएंगे।
एक लोहे का बक्सा भी है,
जो अपनी जगह बनाए बैठा है,
कुछ पुराने पेन और सूखे ब्रश भी पड़े हैं,
जिनमें से ज्यादातर अब चलते नहीं।
लिखते लिखते मेरी नज़र भी उन पर गई,
पर मैंने भी उन्हें वहीं रहने दिया।
कुछ पुरानी मैगज़ीन एक बक्से में रखी हैं,
जो कभी हर महीने आती थीं।
अब उनका वहाँ होना
किसी को अजीब भी नहीं लगता।
वो अब नई तो नहीं रहीं,
पर गईं भी नहीं।
इन सबके बीच
पता नहीं,
पर्दा उन चीज़ों को ढक रहा है,
या वो चीज़ें पर्दे को ज़रूरी बना रही हैं।
और मैं अभी भी
उसके सामने बैठा हूँ।
पंखे की हवा से
वो पर्दा हल्का सा हिल रहा है
और पीछे रखी चीज़ें,
बीच-बीच में झाँक रही हैं।