

Join for peaceful protest by IIT Bombay student in Rewa MP for Justice of 35 years of House and land Issue by Mishra family .
Bara 396 Paikhar Post Mankahari District Rewa Madhyapradesh
Regards ,
Justice is awaited ..


Bara 396 Paikhar Post Mankahari District Rewa Madhyapradesh
Regards ,
Justice is awaited ..
Bara 396 Paipkhar Post Mankahari District Rewa !
Justice is awaited. . Bara 396 Paipkhar Rewa Madhyapradesh
रामगोपाल मिश्रा (70+ वर्ष)
(जिनके नाम पर परिवार के घर के नीचे की बसिहत (आबादी) भूमि दर्ज है)
हिस्सा: 28 एकड़ में से लगभग 14 एकड़
बनाम
सुखराम प्रसाद मिश्रा (80+ वर्ष)
(पिछले लगभग 35 वर्षों से मार्ग एवं बसिहत संबंधी विवाद से प्रभावित)
हिस्सा: 14 एकड़ में से लगभग 4.5 एकड़
(शेष भूमि अन्य दो भाइयों के हिस्से में)
पिता – स्वर्गीय शंभू प्रसाद मिश्रा
हमारे घर को चारों तरफ से बंद कर दिया गया है। जगह-जगह पेड़, काँटेदार झाड़ियाँ और अन्य अवरोध रख दिए गए हैं, जिससे आने-जाने का रास्ता पूरी तरह प्रभावित हो गया है।
बारिश के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। कीचड़, पानी भरने और रास्ता अवरुद्ध होने के कारण महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और पूरे परिवार को रोज़ाना भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
हम संबंधित प्रशासन से निवेदन करते हैं कि इस समस्या का शीघ्र स्थलीय निरीक्षण कराकर उचित समाधान सुनिश्चित किया जाए।
Collector Rewa
CM Madhya Pradesh
Narendra Modi
Rajendra Shukla
# 35 वर्षों से न्यायालय में चल रहे दावे
रामगोपाल मिश्रा (70+ वर्ष, छोटे भाई) द्वारा न्यायालय में किए गए प्रमुख दावे:
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि खसरा क्रमांक 297 पर स्थित मकान उन्हीं का है तथा वे ही उक्त संपत्ति के वास्तविक स्वामी एवं कब्जाधारी हैं।
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि सुखराम प्रसाद मिश्रा (80+ वर्ष, बड़े भाई) का स्वयं का मकान किसी अन्य स्थान पर स्थित था, जो जर्जर (रहने योग्य नहीं) हो चुका था।
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि सुखराम प्रसाद मिश्रा ने उनसे अनुरोध किया कि उनका मकान कभी भी गिर सकता है, इसलिए नया मकान बनने तक उन्हें अस्थायी रूप से रहने के लिए स्थान दिया जाए।
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि मानवीय आधार पर उन्होंने सुखराम प्रसाद मिश्रा को खसरा क्रमांक 297 स्थित मकान में अस्थायी रूप से रहने की अनुमति दी।
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि बाद में सुखराम प्रसाद मिश्रा ने खसरा क्रमांक 3xx एवं 3xx पर अपना नया मकान बना लिया, लेकिन इसके बावजूद खसरा क्रमांक 297 स्थित मकान खाली नहीं किया।
रामगोपाल मिश्रा ने दावा किया कि मकान खाली करने के बजाय सुखराम प्रसाद मिश्रा ने बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के राजस्व अभिलेखों के कॉलम क्रमांक XII में अपना नाम दर्ज करा लिया।
एक प्रश्न
क्या एक छोटा भाई अपने 80+ वर्ष के बड़े भाई के विरुद्ध न्यायालय में इतने गंभीर दावे कर सकता है?
यदि ये दावे सत्य हैं, तो उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने चाहिए।
यदि ये दावे असत्य हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि एक सगे बड़े भाई के विरुद्ध ऐसे दावे क्यों और कैसे किए गए?
कहा जाता है कि "कानून अंधा होता है", लेकिन न्याय साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर होता है।
हमारा विश्वास है कि सत्य चाहे देर से सामने आए, परंतु पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर न्याय अवश्य होना चाहिए।
35 वर्षों का संघर्ष: घर, सम्मान और न्याय की प्रतीक्षा — परिवार A, B, C और D की कहानी
आइए रीवा जिले के एक काल्पनिक XYZ परिवार की कहानी पर विचार करें।
एक पिता के चार पुत्र थे — A, B, C और D।
परिवार के पास लगभग 28 एकड़ पैतृक भूमि थी। परिवार C के अनुसार, लगभग 14 एकड़ बसाहट (बसीहत) भूमि पर भाई D का नियंत्रण स्थापित हो गया। शेष भूमि A, B और C के बीच बांटी गई, लेकिन परिवार C का दावा है कि यह बंटवारा न तो समान था और न ही इसका कोई स्पष्ट एवं प्रमाणित दस्तावेज मौजूद है।
परिवार C के अनुसार आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि मूल बंटवारा किस आधार पर और किस प्रकार किया गया था। समय के साथ भाई D का नाम उन भूमि अभिलेखों में भी बना रहा, जहां A, B और C के मकान और संपत्तियां स्थित थीं।
समय बीतने के साथ A और B, D के साथ खड़े हो गए। परिवार C का मानना है कि A और B को यह भय था कि यदि वे D से अलग हो गए तो उन्हें और अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। विडंबना यह है कि परिवार C के अनुसार D और उसके परिवार ने अतीत में A और B को भी परेशान किया था।
इसके बावजूद A और B, D के साथ बने रहे और धीरे-धीरे परिवार C अकेला पड़ गया।
परिवार C का कहना है कि विवाद केवल भूमि का नहीं था, बल्कि महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण और पारिवारिक मूल्यों का भी था। उनका आरोप है कि परिवार D के कुछ सदस्यों का महिलाओं के प्रति व्यवहार और मानसिकता अनुचित थी, जिसे वे स्वीकार नहीं कर सके।
समय के साथ विवाद और गहराता गया।
परिवार C का आरोप है कि भाई D ने उस मकान पर भी अपना दावा करना शुरू कर दिया, जिसे परिवार C ने स्वयं बनवाया और वर्षों तक संभाला। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि परिवार C के अनुसार D ने उसी मकान में उन्हें किरायेदार की तरह मानना शुरू कर दिया।
ग्रामीण परिवेश में परिवार C इसे अत्यंत पीड़ादायक और विडंबनापूर्ण मानता है।
यही विवाद आगे चलकर बसीहत भूमि के मुकदमे का हिस्सा बना, जो लगभग 30 से 35 वर्षों से न्यायालय में लंबित है।
इन दशकों के दौरान परिवार C लगातार उत्पीड़न झेलने का दावा करता है।
उनके अनुसार:
• रास्ते बंद किए गए।
• आवागमन में बाधाएं उत्पन्न की गईं।
• घर तक पहुंचने के मार्ग अवरुद्ध किए गए।
• परिवार के सदस्यों को लगातार अपमानित और प्रताड़ित किया गया।
• महिलाओं और पुरुषों दोनों को डराने-धमकाने का प्रयास किया गया।
स्थिति इसलिए भी कठिन थी क्योंकि भाई C का केवल एक पुत्र था, जबकि भाई D के तीन पुत्र थे।
परिवार C का कहना है कि यह सब उस दौर में हुआ जब न मोबाइल कैमरे थे, न CCTV और न ही डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध थे। उनका आरोप है कि कई बार मारपीट और विवाद के बाद उल्टा उनके ही खिलाफ पुलिस में शिकायतें दर्ज करा दी जाती थीं।
परिवार C का कहना है कि ऐसे माहौल में जीवन व्यतीत करना अत्यंत कठिन था।
उनका यह भी आरोप है कि परिवार D के कुछ सदस्य उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने और अपमानित करने के लिए विभिन्न प्रकार के कृत्य करते थे। परिवार C के अनुसार, D के पुत्रों द्वारा उनके आंगन में गंदगी फेंकी जाती थी और परिवार की महिलाओं को परेशान करने का प्रयास किया जाता था।
परिवार C का मानना है कि यह सब उन्हें उनकी जमीन और घर छोड़ने के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा था।
सबसे गंभीर घटनाओं में से एक वह थी जब परिवार D ने परिवार C के विरुद्ध अपहरण का मामला दर्ज कराया।
परिवार C के अनुसार, इस दौरान A और B भी D के समर्थन में खड़े थे।
परिवार C का कहना है कि इस मामले में विशेष पुलिस जांच हुई और लगभग 42 दिनों की जांच के बाद अपहरण के आरोप असत्य पाए गए। मामला अंततः परिवार C के पक्ष में समाप्त हुआ।
परिवार C का कहना है कि सामाजिक अपमान, मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान के बावजूद उन्होंने आगे कोई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं की।
लेकिन विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ।
परिवार C के अनुसार, अपहरण प्रकरण समाप्त होने के बाद उस मामले के एक गवाह पर हमला करने का प्रयास किया गया।
परिवार C के अनुसार, इसके बाद कानूनी कार्रवाई हुई।
वर्ष 1999
परिवार D के एक पुत्र पर गांव के एक व्यक्ति के साथ मारपीट करने का आरोप सिद्ध हुआ।
परिवार C के अनुसार उसे धारा 323 IPC के अंतर्गत:
• 3 माह का कारावास
• ₹1000 का अर्थदंड
दिया गया।
वर्ष 2011
परिवार C के अनुसार, अपहरण प्रकरण से जुड़े एक गवाह पर हमला करने के मामले में उसी व्यक्ति को:
• धारा 342 IPC के अंतर्गत 3 माह का कारावास एवं ₹1000 अर्थदंड
• धारा 324 IPC के अंतर्गत 6 माह का कारावास एवं ₹1000 अर्थदंड
दिया गया।
परिवार C का मानना है कि 1999 से 2011 के बीच की घटनाएं भय, दबाव और आपराधिक प्रवृत्ति के एक क्रम को दर्शाती हैं।
उनका कहना है कि इन घटनाओं और मुकदमों के बावजूद उत्पीड़न समाप्त नहीं हुआ।
परिवार C के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित उनके परिवार की महिलाएं रहीं।
वर्ष 2016-2017 में एक और गंभीर विवाद सामने आया।
परिवार C के अनुसार, परिवार D के एक पुत्र पर धारा 376 IPC के अंतर्गत मामला दर्ज हुआ और उसे कुछ समय के लिए जेल भी जाना पड़ा, जिसके बाद वह कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से बाहर आया।
परिवार C इस घटना को भी अपने आरोपों के समर्थन में एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानता है।
इस बीच, परिवार C का आरोप है कि 14 एकड़ बसीहत भूमि के कुछ हिस्सों को समय-समय पर बेचा गया और उन पैसों का उपयोग मकान निर्माण तथा आर्थिक स्थिति मजबूत करने में किया गया।
उधर बसीहत भूमि का मुकदमा लगातार चलता रहा।
साल बीतते गए।
बच्चे बड़े हो गए।
बुजुर्ग बूढ़े हो गए।
समय, धन, ऊर्जा और मानसिक शांति न्यायिक लड़ाई में खर्च होती रही।
परिवार C का मानना है कि उन्होंने अपने घर, सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए अपना जीवन खपा दिया।
आज भी, लगभग 35 वर्षों बाद, विवाद समाप्त नहीं हुआ है।
परिवार C का आरोप है कि आज भी:
• रास्ते रोकने का प्रयास किया जाता है।
• दैनिक जीवन में बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं।
• अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है।
• परिवार को डराने-धमकाने की कोशिश की जाती है।
• कानूनी दावों को छोड़ने का दबाव बनाया जाता है।
इसके बावजूद परिवार C न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
उन्हें विश्वास है कि यदि सत्य, कानून और ईश्वर का अस्तित्व है, तो एक दिन न्याय अवश्य मिलेगा।
यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीण परिवारों की कहानी है जो वर्षों से भूमि विवाद, सामाजिक दबाव और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
आज मोबाइल फोन, CCTV कैमरे, डिजिटल रिकॉर्ड और सोशल मीडिया का युग है।
ऐसे में प्रश्न यह है:
क्या हर घटना का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए?
क्या सबूतों को सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए?
क्या मीडिया को ऐसे दशकों पुराने विवादों को सामने लाना चाहिए?
क्या समाज को उन परिवारों की आवाज़ सुननी चाहिए जो पीढ़ियों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
परिवार C का मानना है कि पारदर्शिता, दस्तावेजीकरण और जनजागरूकता ही भविष्य में ऐसे संघर्षों को कम कर सकती है।
तब तक वे प्रतीक्षा कर रहे हैं।
न्याय की।
सम्मान की।
और उस दिन की, जब दशकों पुराना यह विवाद अंततः कानून के अनुसार अपने निष्कर्ष तक पहुंचेगा।