u/The_Silent_Siddha

राम नाम 🙏🏻

I just posted simple ram naam mahatmya as a sadhna that requires no rule and one of the top commenters of this sub got so offended . This much offended that warned me to do Abhichara through my photo and DOB.

श्री रामचरितमानस (तुलसीदास जी)

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं हरीहि तजहिं जग धंदा॥

राम नाम जपे जाहिं निरंतर। तिन कहुँ नहिं कछु भय भयअंतर॥

अर्थ: जो निरंतर प्रभु राम के नाम का जप करते हैं, उन्हें संसार में (या किसी भी लोक में) किसी भी प्रकार का कोई डर या भय नहीं रह जाता।

नाम प्रगाढ़ अनेक अनर्था। अमित नाम जपे मिटहिं संवर्ता॥

राम नाम जन जे अनुरागी। तिन्ह कहुँ सिद्ध सब संकट त्यागी॥

उलटा नामु जपत जगु जाना। बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना॥

कौतुकहूं मिटहिं घोर अघाना। राम नाम महिमा श्रुति गाना॥

पद्म पुराण ( पाताल खण्ड )

डाकिनी शाकिनी भूतवैतालाद्याश्च राक्षसाः।

पलायन्ते विदूरेण रामनामानुकीर्तनात्॥

अर्थ: राम नाम का संकीर्तन (या निरंतर जप) करने से डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, वैताल और दुष्ट राक्षस बहुत दूर भाग जाते हैं। वे आसपास भटकने की हिम्मत भी नहीं कर सकते।

न तां वशं न चोद्वेगं न च मरणतामपि।

लभन्ते मानवाः क्लेशं येषां हृदि स्थितो हरिः (रामः)॥

अर्थ: जिनके हृदय में राम नाम की रट लगी है, उन्हें न तो कोई वश में कर सकता है (मोहन/वशीकरण), न कोई उद्वेग (उच्चाटन) दे सकता है, और न ही मारण प्रयोग (अभिचार) उनका कुछ बिगाड़ सकता है।

रामनाम्ना कृतं वर्म यो बिभर्ति कलेवरे।

तस्य न स्यात्कुतो बाधा भूतप्रेतादिभिः क्वचित्॥

​अर्थ: जो मनुष्य अपने शरीर और चेतना पर राम नाम रूपी कवच धारण कर लेता है, उसे भूत, प्रेत, पिशाच या किसी भी तांत्रिक अभिचार से कभी भी, कहीं भी बाधा नहीं पहुंच सकती।

सर्वोपद्रवनाशाय सर्वकल्याणहेतवे।

रामनाम्नो परं नास्ति सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥

​अर्थ: भगवान शिव कहते हैं कि हे पार्वती! मैं पूरी तरह सत्य कह रहा हूँ कि सभी प्रकार के उपद्रवों (चाहे वे कृत्य, अभिचार, या तांत्रिक उपद्रव हों) को नष्ट करने के लिए और सर्व-कल्याण के लिए "राम" नाम से बढ़कर संसार में कोई दूसरा उपाय नहीं है।

ये कुर्वन्ति नराः क्रूराः क्रियाः मारणकर्मणि।

तेषां नाशो भवेच्छीघ्रं रामनामप्रभावतः॥

​अर्थ: जो क्रूर मनुष्य किसी राम-भक्त पर मारण या अभिचार जैसी तांत्रिक क्रियाएं करते हैं, राम नाम के प्रभाव से (उस भक्त का तो कुछ नहीं बिगड़ता) बल्कि उन कुकर्म करने वालों का स्वयं ही बहुत शीघ्र नाश हो जाता है।

वाल्मीकि रामायण (सुन्दरकाण्ड)

न विप्रकारं लभते स महात्मा कृतांजलिः।

रामनामानुरक्तो हि रक्षोभिरपि दुर्जयः॥

अर्थ: जो महात्मा एकाग्र होकर राम नाम में अनुरक्त (लीन) है, उसका कोई अपकार (अहित) नहीं कर सकता। वह राक्षसों और उनकी तामसिक माया के लिए भी अजेय (दुर्जय) हो जाता है।

पातलाभूतलव्योम-चारिणश्छद्मचारिणः।

न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥ (श्लोक १२)

​अर्थ: जो मनुष्य राम नाम द्वारा सुरक्षित है (जिसके चारों ओर राम नाम का कवच है), उसे पाताल, पृथ्वी और आकाश में घूमने वाले अथवा छद्म भेष में घूमने वाले (अदृश्य शक्तियां, तांत्रिक ऊर्जाएं, भूत-प्रेत आदि) देख तक नहीं सकते, नुकसान पहुंचाना तो बहुत दूर की बात है।

स्कन्द पुराण (काशी खण्ड)

अभिचारक्रियाः सर्वाः कृत्याश्चैव सुदारुणाः।

भस्मीभवन्ति ताः शीघ्रं रामनामहुताशने॥

अर्थ: जितनी भी अभिचार क्रियाएं (तंत्र प्रयोग) हैं और जितनी भी दारुण 'कृत्या' (तांत्रिकों द्वारा भेजी जाने वाली संहारक ऊर्जा या देवी) हैं, वे राम नाम रूपी अग्नि (हुताशन) में पड़ते ही तुरंत भस्म हो जाती हैं।

बृहद् विष्णुपुराण

न कुतूहलमात्रादपि यस्य नाम्नि संस्पर्शः।

तस्याभिचारिकाः क्रूराः न प्रभवन्ति कदाचन॥

अर्थ: यदि कौतूहलवश (मजाक में या बिना पूरी श्रद्धा के भी) किसी ने राम नाम का आश्रय ले लिया है, तो क्रूर आभिचारिक प्रयोग (तांत्रिक मारण आदि) उस पर कभी भी अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते। जो श्रद्धापूर्वक चौबीस घंटे जप रहा है, उसकी तो बात ही अलग है।

जय श्री राम 🙏🏻

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u/The_Silent_Siddha — 1 day ago

राम नाम 🙏🏻

I have seen there are very less devotees of bhagwan Ram here and this can be due to less awareness regarding the prabhav of his naam so i have shared this .

योग्यादि साधने क्लेशशं दुस्तरं सर्वथा मुने।

अत सोल्भ्य सन्मार्ग संगच्छेन्नाम संस्मरन्।।

अनायासेन सर्वस्व दुर्लभं मुनि सत्तम।

प्रभावाद्राम–नामस्तु लभते रूपमद्भूतम्।।'

श्रीनारदीय पुराण में कहा गया है कि भला बताइये तो अपनी जीभ, अपना काम, नाम जपना इसमें कौन पहाड़ ढोना है। जीभ हिलाइये, नामोच्चारण किया, हो गया सम्पूर्ण काम और जानते हैं, इस थोड़े से परिश्रम में फल क्या मिला? अनंत! दिन-रात पाप तो बनते ही हैं। कलियुगी जीव जो ठहरे। जान बूझ कर तो पाप नहीं ही करना चाहिये, परन्तु अनजान में भी तो अनेक पाप बन जाते हैं। रात दिन नाम रटते रहिये। अज्ञानजन्य पाप मिटते रहेंगे।

आयासः स्मरणे कोऽस्ति समृत्तो यच्छति शोभनम्।

पाप क्षयरच भवति स्मरतां तदहर्निशम्।।'

श्रीपुराण संग्रह में श्रीसूत जी ने श्रीशौनक जी से कहा है कि सभी मंत्रों में श्रीराम–नाम श्रेष्ठ हैं। श्रीभवानीवल्लभ के तो जीवन ही हैं। चित्त शुद्ध करनेवाले नाम जप ही है। सभी प्राणिमात्र के लिये सुलभ हैं। बिना मेहनत के ही सिद्धि लूटिये। अतः सभी साधनों को छोड़ छाड़कर प्रेम पूर्वक नाम जप में ही पिल पड़ना चाहिये।

सर्वेषां मन्त्र वर्गाणां राम नाम परं स्मृतम्।

गोप्यं श्री पार्वतीशस्य जीवनं चित्त शोधकम्॥

सुलभं सर्व जीवानामायासेन सिद्धिदम्।

सर्वोपायं विहायाशु जप्तव्यं प्रेमतत्परैः॥

और मंत्रों के जप के समय का प्रतिबन्ध है। यथा प्रातः सायं जपो, दोपहर दिन निशीथ काल में मत जपो। श्रीराम नाम जप में समय की छूट है, जब चाहो जपो। अन्य साधन में श्रद्धा विश्वास सद्भावना की अपेक्षा है। श्रीराम नाम का भ्रम से भी उच्चारण, सर्व दुःख नाश करने वाला है। ऐसा 'क्रियायोगसार' नामक आर्ष ग्रन्थ में कहा गया है।

स्मरणे रामनाम्नस्तु न कालनियमः स्मृतः

भ्रमादुच्चार्यमाणोऽपि सर्वदुःखविनाशनः॥"

'श्री हिरण्यगर्भ संहिता' में श्रीअगस्त्यजी ने श्री सुतीक्ष्णजी से कहा है कि परम सुखदायक श्रीरामनाम को परवश होकर भी उच्चारण करने वाले समस्त पापों से रहित होकर, नित्य रामधाम श्री साकेत नगरी को जाते हैं।

कलिं सभाजयन्त्यार्याः गुणज्ञाःसारभागिनः।

यत्र संकीर्तनेनैव सर्व स्वार्थोऽभिलप्यते॥

श्री गरुड़पुराण में भगवान श्री विष्णुदेव स्वयं श्रीमुख से अपने परमप्रिय पार्षद श्री गरुड़ जी से कह रहे हैं कि कलिकाल में सभी पाप नामसंकीर्तन से ही नष्ट होते हैं, अतः श्री रामनाम का कीर्तन करते रहना चाहिए।

'कलौ संकीर्तनादेव सर्वपापं व्यपोहति।

तस्माच्छ्री रामनाम्नस्तु कार्य संकीर्तनं वरम्॥'

ऐसे ही श्री ब्रह्मसंहिता में जगद्गुरु भगवानशंकर का वचन है कि कलियुगी जीवों का हृदय इतना पापग्रसित होता है कि श्री रामनाम के अतिरिक्त अन्य साधन करने का उन्हें अधिकार ही नहीं है। ऐसे पापीजीव परमसमर्थ अमोघफलदायक श्री रामनाम ही का सदा आदर पूर्वक स्मरण करता रहे, तो उसे अनायास मुक्ति मिल जाएगी।

रामेति वर्णद्वयादरेण सदा स्मरन्मुक्तिमुपैतिजन्तुः।

कलौ युगे कल्मषमानसानामन्यत्र धर्मे खलु नाधिकारः॥'

श्री पतञ्जलि संहिता का कथन है कि कलिकाल में श्री राघव जी के नामजप से ही नित्य साकेतधाम की अनायास और सुनिश्चित रूप से प्राप्ति हो जाती है। अतः सभी युगों से श्रेयस्कर कलि प्रशंसित होता है। इसी दृष्टि से कलि समस्त कल्याण का निवास है।

कलौयुगे राघव नामतस्तत्पदं परं यान्त्यनायसतोध्रुवम्।

सर्वैर्युगैः पूजितमुत्तमंयुगं समस्तकल्याणनिकेतनं वरम्॥'

श्री शारदारामायण के मतानुसार श्रीरामनाम का समुज्ज्वल माहात्म्य तो चारों युगों से निस्सन्देह सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु कलिकाल में सब प्रकार से श्री रामनाम ही एकमात्र कल्याण का साधन है।

शास्त्रं शतं वापि तारयन्ति न तं नरम्।

यस्तु स्वमनसा वाचा न करोति जपं परम्॥

राम नाम विहीनस्य जातिशास्त्रस्तं जपस्तपः।

अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं तु वृथा यथा॥"

श्री अध्यात्म रामायण में कहा गया है कि जिसने वेदशास्त्रों का अध्ययन नहीं किया, यज्ञादिक कर्म नहीं किये, यदि श्रीराम निरन्तर रटते रहते हैं, तो समझ लीजिए, उसने सभी वेदोदित कर्त्तव्य कर लिये।

बीजे यथा स्थितोवृक्षः शाखा पल्लव संयुतः।

तथैव सर्ववेदाश्च रकारे व्यवस्थितः॥"

श्री आदि पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण श्री अर्जुन जी से कहते हैं—श्रीरामनाम ही सभी शास्त्रों के उत्तम तात्पर्यार्थ हैं। श्रीरामनाम ही वेद के मंगलमय सारसिद्धान्त हैं।

"नामेव चाहूं शास्त्राणां तात्पर्यार्थमुत्तमम्।

नामेव वेदसाराणां सिद्धांतं सर्वदा शिवम्॥"

श्रीलुभभागवत में कहा गया है कि वेद शास्त्र के विस्तार में अवगाहन करने से क्या लाभ? तीर्थादिक कर्मों से मुमुक्षुओं का क्या प्रयोजन? यदि अपने लिए मुक्ति की अभिलाषा हो तो श्रीरामनाम का निरन्तर रटन करना चाहिए।

राम रामेति रामेति कीर्तयच्छुद्ध चेतसा।

राजसूय सहस्राणां फलं प्राप्नोति मानवः॥'

श्री आदि रामायण में कहा गया है कि एक बार नामोच्चारण से हजारों बार गंगा स्नान, कोटि-कोटि यज्ञान्त (यज्ञ समापन सूचक अन्तिम) स्नान, पान करने वाली पवित्रता आती है।

'गङ्गा स्नान सहस्रेण यज्ञान्तस्नान कोटिभिः।

पान शुद्धिर्भवेज्जातु सा रामेति कीर्तनात्॥'

श्री कालिका पुराण का वचन है कि निर्विकार परमदेव श्रीरामनाम का उच्चारण करने मात्र से अनन्त यज्ञ और तीर्थों के फल निश्चय पूर्वक होते हैं।

रामेत्यभिहिते देवे परात्मनि निरामये।

असंख्य मख तीर्थानां फलं तेषां भवेद्ध्रुवम्॥'

श्री लोमेश संहिता में कहा गया है कि जिनने श्रीरामनाम का कीर्तन कर लिया, उसने फल पाने के अर्थ में सब यज्ञ कर लिये अर्थात् अशेष वेदोक्त यज्ञों के फल उन्हें एकत्र मिल गये।

'कृताश्च सकलाः यज्ञा येन रामेति कीर्तितम्।'

श्री पद्मपुराण में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण श्री अर्जुनभक्तराज से कहते हैं कि दो अक्षर वाले श्री रामनाम का जिसने कीर्तन कर लिया, वे समझिये कि चारों वेद साङ्गोपाङ्ग पढ़ चुके, सभी यज्ञ कर चुके और उसने तीनों लोकों का उद्धार भी कर लिया।

कृताश्च सकलाः यज्ञा येन रामेति कीर्तितम्।'

श्री पद्मपुराण में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण श्री अर्जुनभक्तराज से कहते हैं कि दो अक्षर वाले श्री रामनाम का जिसने कीर्तन कर लिया, वे समझिये कि चारों वेद साङ्गोपाङ्ग पढ़ चुके, सभी यज्ञ कर चुके और उसने तीनों लोकों का उद्धार भी कर लिया।

'चत्वारः पठिता वेदास्सर्वे यज्ञाश्च याजिताः।

त्रिलोकी मोचिता तेन राम इत्यक्षर द्वयम्॥'

श्री विष्णु पुराण में आया है कि इस भूमंडल में जिनको श्रीरामनाम के प्रभाव, महात्म्य का ज्ञान विज्ञान नहीं है, वही नाम रटन छोड़कर यज्ञादिक कर्म तथा ज्ञानादि उपार्जन में नाहक रंचते-पचते रहते हैं।

जा पर कृपा राम की होई।ता पर कृपा करहिं सब कोई॥

जिस मनुष्य पर भगवान श्रीराम की कृपा हो जाती है, उस पर संसार के सभी लोग और देवता भी कृपा करने लगते हैं ।

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।"

भगवान हरि (श्री राम) के नाम के प्रभाव से पापी अजामिल, गज (हाथी) और गणिका (वेश्या) तक मुक्त हो गए। मैं प्रभु के नाम की महिमा कहाँ तक कहूँ, स्वयं श्री राम जी भी नाम के गुणों का पूरा बखान नहीं कर सकते।

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u/The_Silent_Siddha — 1 day ago

SitaRam Upasak

Are there no upasaks or sadhaks of bhagwan ram or Mata sita or any Vaishnava upasak ?

Is this sub only filled with bhairav upasaks ?

I really want to know if there is any vaishnav upasak here ?

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u/The_Silent_Siddha — 1 day ago

कामाख्या क्षेत्र महात्म्य 🙏🏻

As there are many upasaks of Maa Kamakhya here so you guys should know about the significance of tha Kamakhya kshetra and all the devi sadhaks should also visit there.

Reference- Mahabhagwat Devi Puran Chapter 76

Shloka 1

Sanskrit:

श्रीनारद उवाचप्रभो देव जगन्नाथ श्रुत्वा तव मुखाम्बुजात्।गङ्गामाहात्म्यमतुलं पवित्रोऽस्मि न संशयः॥ १॥

English:

Sri Narada said:O Lord, Master of the Universe! Having heard the incomparable glory of the Ganga from your lotus-like mouth, I have undoubtedly become completely purified. (1)

Shloka 2

Sanskrit:

भूयस्ते श्रोतुमिच्छामि माहात्म्यमतिविस्तरात्।कामरूपस्य तीर्थस्य तत् समाचक्ष्व साम्प्रतम्॥ २॥English:

I desire to hear its glory again in great detail. Therefore, please describe to me now the spiritual significance of the sacred Kamarupa Tirtha. (2)

Shloka 3

Sanskrit:

श्रीमहादेव उवाचशृणु सावहितो वक्ष्ये माहात्म्यं मुनिसत्तम।कामरूपस्य तीर्थस्य यत्र साक्षात्स्वयं शिवा॥ ३॥English:

Lord Shiva said:Listen attentively, O best among sages! I shall declare the glory of Kamarupa Tirtha, where Goddess Shiva (Kamakhya) Herself resides in person. (3)

Shloka 4

Sanskrit:

प्रत्यक्षफलदा मर्त्ये स्थानं नास्ति ततोऽधिकम्।यत्र देवाः सगन्धर्वा ब्रह्माद्याश्च सुरोत्तमाः।प्रत्यहं समुपागत्य सेवन्ते भक्तितत्पराः॥ ४॥

English:

It grants immediate results in the mortal world; no place is superior to it. Where gods, celestial musicians (Gandharvas), Brahma, and other supreme deities arrive daily to serve Her with utmost devotion. (4)

Shloka 5

Sanskrit:

योनिरूपा महामाया पूर्णाद्या परमेश्वरी।पृथिव्यां लोकहितार्थाय यत्रास्ते निजलीलया॥ ५॥English:

Where Mahamaya, the supreme Goddess who is completely perfect, resides on Earth in the form of the Yoni (cosmic source), performing Her divine plays for the spiritual welfare of humanity. (5)

Shloka 6

Sanskrit:

यत्राकार्यीत्तपः पूर्वं ब्रह्मा विष्णुस्तथेश्वरः।अभीप्सुर्भगवत्यास्तु कामाक्ष्ये मुनिसत्तम॥ ६॥

English:

O best among sages! In ancient times, Brahma, Vishnu, and Shiva performed severe penances at this holy site of Kamakhya, seeking the divine grace of the Goddess. (6)

Shloka 7

Sanskrit:

यत्र कृत्वा पुरश्चर्यां वसिष्ठो मुनिसत्तमः।सिद्धमन्त्रोऽभवत्पूर्वं सृष्टिकर्तेव चापरः॥ ७॥English:

Where the great sage Vasistha, after performing intensive mantra rituals (Purashcharana), mastered the sacred mantras and became powerful like a second creator of the universe. (7)

Shloka 8

Sanskrit:

अव्याहताज्ञा ये चान्ये सिद्धा देवर्षयस्तथा।ते सर्वे मुनिशार्दूल कामाख्यायाः प्रसादतः॥ ८॥English:

O tiger among sages! All other perfected beings (Siddhas) and divine sages whose commands are absolute achieved their status solely through the grace of Goddess Kamakhya. (8)

Shloka 9

Sanskrit:

सिद्धमन्त्राः समभवंस्तत्र जप्त्वा महामनुम्।खेचरत्वमनुप्रापुस्तथा देवाधिपूज्यताम्॥ ९॥English:

By chanting the great supreme mantra at this place, they successfully perfected it, attained the power to travel through space, and became worthy of worship even by the gods. (9)

Shloka 10 & 11

Sanskrit:

योनिरूपां भगवतीं सुगुमां मुनिसत्तम।दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा सुसम्पूज्य जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥ १० ॥विहरेत्पृथिवीपृष्ठे शूलपाणिरिवापरः।निग्रहानुग्रहे शक्तो देवानामपि नारद ॥ ११ ॥English:

O best of sages! By seeing, touching, and properly worshipping the divine Goddess in the form of the Yoni, a person becomes liberated while still alive (Jivanmukta). O Narada, such a person wanders upon the earth like another Shiva (the wielder of the trident), possessing the power to both punish and bless even the demigods.

Shloka 12 & 13

Sanskrit:

तदाज्ञावशगाः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः।नासाध्यं विद्यते तस्य मुने लोकत्रये तथा ॥ १२ ॥तस्यैव जन्म सफलं यो गत्वा योनिमण्डले।प्रणमेत्परया भक्त्या देवी त्रिपुरभैरवीम् ॥ १३ ॥English:

All the gods, led by Indra, abide by his commands. O sage, nothing remains impossible for him across the three worlds. The birth of that person alone is truly successful, who goes to the sacred Yoni-mandala and bows down with supreme devotion to the Goddess Tripura Bhairavi.

Shloka 14

Sanskrit:

क्षेत्रस्पर्शनमात्रेण ब्रह्महापि नरः क्षणात्।मुच्यते नात्र संदेहः कामाख्यायाः प्रसादतः ॥ १४ ॥English:

By the mere touch of this sacred land, even a person guilty of the gravest sin (like kil#ng a Brahmin) is instantly liberated by the grace of Goddess Kamakhya; there is no doubt about this.

Shloka 15

Sanskrit:

कामाख्यादर्शनं वत्स देवानामपि दुर्लभम्।तद्यः पश्यति कामाख्यां स देवपरिपूजितः ॥ १५ ॥English:

O dear child! beholding Goddess Kamakhya is difficult to attain even for the gods. Whoever beholds Kamakhya becomes thoroughly worshipped by the gods themselves.

Shloka 16

Sanskrit:

जन्मान्तरसहस्रैस्तु संचितं पापपुञ्जकम्।क्षणेन भस्मसात्कुर्यात्कामाख्यायाः दर्शनम् ॥ १६ ॥

English:

The accumulated heap of sins gathered over thousands of previous births is reduced to ashes in an instant by the mere sight of Goddess Kamakhya.

Shloka 17

Sanskrit:

गोपनीयं त्वया वत्स नान्यत्रैतत्प्रकाश्यताम्।कामाख्यासदृशं तीर्थं नास्त्येव धरणीतले ॥ १७ ॥English:

O child, this must be kept secret by you and should not be disclosed elsewhere. There is absolutely no pilgrimage site equal to Kamakhya on the surface of the earth.

Shloka 18

Sanskrit:

अङ्गप्रत्यङ्गपातेन सत्याः पुण्यतमो मुने।देशो भारतखण्डेऽस्मिन्नृणां पापप्रणाशकः ॥ १८ ॥English:

O sage, due to the falling of the limbs and body parts of Sati, this land within Bharatvarsha (India) has become the most sacred, destroying the sins of humanity.

Shloka 19

Sanskrit:

अङ्गेषु भगवत्यास्तु योनिः श्रेष्ठतमा यतः।योनिरूपा हि सा देवी सर्वासु स्त्रीष्ववस्थिता ॥ १९ ॥English:

Among all the limbs of the divine Goddess, the Yoni is the most supreme. For the Goddess resides in the form of the Yoni within all women.

Shloka 20

Sanskrit:

सा योनिः पतिता यत्र तत्र साक्षात्स्वयं सती।तेन नास्ति समं स्थानं पुण्यदं धरणीतले ॥ २० ॥English:

Wherever that Yoni fell, Sati herself is visibly present there in person. Therefore, there is no place on Earth equal to it in bestowing religious merit.

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u/The_Silent_Siddha — 2 days ago