दैनिक जीवन में "फल की आसक्ति के बिना कर्म" का अभ्यास कैसे करते हैं?
गीता 2.47 कहती है कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। व्यवहार में काम या पढ़ाई में प्रेरणा खोए बिना इसे कैसे अपनाते हैं? किस टीका या श्लोक से आपको यह सबसे अच्छा समझ आया? अपने अनुभव और संदर्भ साझा करें। (40 शब्द)