आईना
अंदर मैंने नक़ाब ओढ़ रखा है,
मुखौटा है असफलता का।
अंदर मैंने ख़्वाब पाल रखा है,
नाम लेकर अच्छाई का,
मुखौटा पहने किसी मेहनती का।
लगा जैसे अंदर मेरे कोई और पनप रहा है,
चेहरा लेके एक इंसान का।
अंदर वो शायद मैं ही हूँ,
नक़ाब ओढ़े भलाई का।
शायद मैं समझ नहीं पाया,
वो ज़िक्र जो ख़ुद से किया, ख़ुद का।
नक़ाब चढ़ाकर फ़रिश्ते का,
कर रहा काम नरक का।
शायद ये मैं ही हूँ,
नाम लेके किसी दानव का,
पहन के चेहरा एक इंसान का।