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🙏🏼🕉️ गणेश विसर्जन रहस्य 🕉️🙏🏼
तुमने देखा, हिंदू इस संबंध में बड़े कुशल हैं। गणेश जी बना लिए मिट्टी के, पूजा इत्यादि कर ली—जा कर समुद्र में समा आए। दुनिया का कोई धर्म इतना हिम्मतवर नहीं है। अगर मंदिर में मुर्ति रख ली तो फिर सिराने की बात ही नहीं उठती। फिर वे कहते हैं अब इसकी पूजा जारी रहेगी। हिंदुओं की हिम्मत देखते हो! पहले बना लेते हैं, मिट्टी के गणेश जी बना लिए। मिट्टी के बना कर उन्होंने भगवान का आरोपण कर लिया। नाच—कूद, गीत, प्रार्थना—पूजा सब हौ गई। फिर अब वह कहते हैं, अब चलो महाराज, अब हमें दूसरे काम भी करने हैं! अब आप समुद्र में विश्राम करो, फिर अगले साल उठा लेंगे।
यह हिम्मत देखते हो? इसका अर्थ क्या होता है? इसका बड़ा सांकेतिक अर्थ है. अनुष्ठान का उपयोग कर लो और समुद्र में सिरा दो। विधि का उपयोग कर लो, फिर विधि से बंधे मत रह जाओ। जहां हर चीज आती है, जाती है, वहा भगवान को भी बना लो, मिटा दो। जो भगवान तुम्हारे साथ करता है वही तुम भगवान के साथ करो—यही सज्जन का धर्म है। वह तुम्हें बनाता, मिटा देता। उसकी कला तुम भी सीखो। तुम उसे बना लो, उसे विसर्जित कर दो।
जब बनाते हिंदू तो कितने भाव से! दूसरे धर्मों के लोगों को बड़ी हैरानी होती है। कितने भाव से बनाते, कैसा रंगते, मूर्ति को कितना सुंदर बनाते, कितना खर्च करते! महीनों मेहनत करते हैं। जब मूर्ति बन जाती, तो कितने भाव से पूजा करते, फूल— अर्चन, भजन, कीर्तन! मगर अदभुत लोग हैं! फिर आ गया उनकी विसर्जन का दिन। फिर वे चले बैंड—बाजा बजाते, तो भी नाचते जाते हैं। जन्म भी नृत्य है, मृत्यु भी नृत्य होना चाहिए। चले परमात्मा को सिरा देने! जन्म कर लिया था, मृत्यु का वक्त आ गया।
इस जगत में जो भी चीज बनती है वह मिटती है। और इस जगत में हर चीज का उपयोग कर लेना है और किसी चीज से बंधे नहीं रह जाना है—परमात्मा से भी बंधे नहीं रह जाना है। मैं नहीं कहता कि हिंदुओं को ठीक—ठीक बोध है कि वे क्या कर रहे हैं। लेकिन जिन्होंने शुरू की होगी यात्रा उनको जरूर बोध रहा होगा। लोग भूल गये होंगे। अब उन्हें कुछ भी पता न हो कि वे क्या कर रहे हैं। मूर्च्छा में कर रहे होंगे। पुरानी परंपरा है कि बनाया, विसर्जन कर रहे होंगे; लेकिन उसका सार तो समझो। सार इतना ही है कि विधि उपयोग कर ली। फिर विधि से बंधे नहीं रह जाना है। अनुष्ठान पूरा हो गया, विसर्जन कर दिया।
– ओशो
अष्टावक्र महागीता (भाग: ०२)
प्रवचन - २२
एकटि नमस्कारे प्रभु एकटि नमस्कारे!
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ओशो के पिता स्वामी देवतीर्थ भारती (दद्दाजी) के महापरिनिर्वाण दिवस पर हार्दिक श्रद्धांजलि! 🪔🙏🏼🪔
🪔 वे हम सबके लिए आशा का दीप बन गए! 🪔
निश्चित ही मेरे पिता सरल व्यक्ति थे। लगभग आधी सदी मैं उनके साथ रहा। सिर्फ एक बार मुझे चांटा मारा उन्होंने। बहुत मुश्किल है ऐसा पिता खोजना। उन्होंने सिर्फ एक बार मुझे चांटा मारा; वह भी कुछ खास चांटा नहीं था, एक चपत। फिर कभी नहीं मुझे मारा, क्योंकि वे बात समझ गए। और उन्हें बड़ा पछतावा हुआ, मुझसे क्षमा मांगी। कौन पिता अपने बच्चे से क्षमा मांगता है! वे समझ गए कि मैं उन घोड़ों में से नहीं हूं जिनको पीटना पड़ता है; कोड़े की छाया काफी है।..
सरल थे, बहुत सरल थे। और सरलता चीजों को समग्रता से ले लेती है। एक ही छोटी सी घटना ने, वह चांटा मारने ने एक बात उन्हें साफ कर दी कि मेरे साथ साधारण बच्चों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। मुझे डांटना-डपटना भी हो तो सोच लेना पड़ेगा। मुझसे यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा करो वैसा करो। तो फिर वे अगर मुझसे कभी कुछ कहते भी तो कहते, ऐसा मेरा सुझाव है, कर सको तो करना, नहीं कर सको तो मत करना। मैं कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूं। फिर उन्होंने मुझे कोई आज्ञा नहीं दी।
मेरे उनके बीच जो संबंध बनता चला गया, वह साधारण पिता और बेटे का संबंध नहीं रहा। वह बहुत जल्दी खत्म हो गया--साधारण बेटे और पिता का संबंध। शरीर का संबंध बहुत जल्दी समाप्त हो गया, आत्मा का संबंध निर्मित होता चला गया।
सरल थे बहुत। लोग उनसे कहते थे कि इतने लोग संन्यास ले लिए--मेरी मां ने भी संन्यास ले लिया--आप क्यों संन्यास नहीं लेते? वे कहते, मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। जिस दिन यह सहज भाव उठेगा उसी क्षण ले लूंगा। और सुबह छह बजे एक दिन लक्ष्मी भागी हुई आई। वे यहीं ठहरे थे, लक्ष्मी के कमरे में ही रुके थे, पीछे जो कमरा है मुझसे उसमें ही रुके हुए थे। छह बजे लक्ष्मी भागी आई, उसने कहा कि वे कहते हैं--संन्यास, इसी क्षण, अभी! क्योंकि वे तीन बजे से रोज ध्यान करने बैठ जाते थे। और उस दिन अंतर्भाव उठा। तो सुबह ठीक छह बजे संन्यास लिया। बहुत मैंने उन्हें रोका कि मेरे पैर मत छुएं। कुछ भी हो, मैं आखिर बेटा हूं। पर उन्होंने कहा, वह बात ही मत उठाओ। जब मैं संन्यस्त हो गया तो मैं शिष्य हो गया। अब बेटे और बाप की बात खत्म हो गई।
फिर उन्होंने मुझे पैर नहीं छूने दिए उस दिन के बाद। वे मेरे पैर छूते थे। शायद ही किसी पिता ने इतनी हिम्मत की हो--इतनी सरलता, इतनी सहजता! फिर वे मुझसे पूछ कर जीते थे छोटी-छोटी बात में भी--ऐसा करूं या न करूं? और जो मैंने उनसे कह दिया वैसा ही उन्होंने किया, उससे अन्यथा नहीं। और इसीलिए यह अपूर्व घटना घट सकी, अन्यथा जन्मों-जन्म लग जाते हैं। मैंने अगर उनको कहा कि ध्यान करना है, ऐसा करना है, तो बस फिर उन्होंने दुबारा नहीं पूछा। फिर वैसा ही करते रहे। फिर यह भी मुझसे नहीं पूछा कि अभी तक कुछ हुआ नहीं, कब होगा कब नहीं होगा, ऐसा ही करता रहूं जिंदगी भर? दस साल तक उन्होंने ध्यान किया लेकिन एक बार मुझसे यह नहीं कहा कि अभी तक कुछ हुआ क्यों नहीं! ऐसी उनकी श्रद्धा और आस्था थी। एक बार मुझे नहीं कहा कि इसमें कुछ अड़चन हो रही है, कुछ और विधि तो नहीं है, इसमें कुछ सुधार तो नहीं करने हैं, कुछ अन्यथा प्रकार का ध्यान तो नहीं करना है! इसको कहते हैं, छोड़ देना--समर्पण! इसलिए एक महत घटना घट सकी।
मैं चिंतित था कि कहीं वे बिना बुद्धत्व को प्राप्त हुए विदा न हो जाएं। क्योंकि उन जैसा व्यक्ति अगर बिना बुद्धत्व को प्राप्त किए विदा हो जाए तो फिर तुम्हारे संबंध में मुझे बहुत आशा कम हो जाती। लेकिन वे तुम सबके लिए आशा का दीप बन गए।
– ओशो
उपरोक्त प्रवचांश:
मन ही पूजा मन ही धूप
प्रवचन - ०२
जीवन एक रहस्य है
🫂 ओशो मैत्री समर्पण (OMS) 🫂
🙏🏼🦚 पूर्णावतार कृष्ण 🦚🙏🏼
कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं।
इसके कुछ कारण हैं।
सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है। जिंदगी से उदास, हारा हुआ, भागा हुआ। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं। हंसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास, आंसुओं से भरा हुआ था। हंसता हुआ धर्म मर गया है और पुराना ईश्वर, जिसे हम अब तक ईश्वर समझते थे, जो हमारी धारणा थी ईश्वर की, वह भी मर गई है।
जीसस के संबंध में कहा जाता है कि वह कभी हंसे नहीं। शायद जीसस का यह उदास व्यक्तित्व और सूली पर लटका हुआ उनका शरीर ही हम दुखी-चित्त लोगों को बहुत आकर्षण का कारण बन गया। महावीर या बुद्ध बहुत गहरे अर्थों में इस जीवन के विरोधी हैं। कोई और जीवन है परलोक में, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती हैं। समस्त धर्मों ने दो हिस्से कर रखे हैं जीवन के--एक वह जो स्वीकार योग्य है और एक वह जो इनकार के योग्य है।
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए, इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है। और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है।
– ओशो
कृष्ण स्मृति
प्रवचन - ०१
हंसते व जीवंत धर्म के प्रतीक कृष्ण
🦚 श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं! 🦚
🫂 ओशो मैत्री समर्पण (OMS) 🫂
🦚 श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं! 🙏🏼
🫂 ओशो मैत्री समर्पण (OMS) 🫂
🦚 कृष्ण का व्यक्तित्व विधायक है! 🦚
सारी गीता में कृष्ण परम अहंकारी मालूम पड़ते हैं। लेकिन आपने सुबह के प्रवचन में कहा कि निर-अहंकारी होने से ही कृष्ण कह सके कि सब छोड़ कर मेरी शरण में आ, मैं ही सब कुछ हूं, आदि। लेकिन बुद्ध और महावीर ऐसा नहीं कहते हैं। क्या इनकी निर-अहंकारिता भिन्न-भिन्न है? उनका मौलिक अंतर क्या है?
निर-अहंकारिता दो ढंग से उपलब्ध हो सकती है। एक तो इस ढंग से उपलब्ध हो सकती है कि कोई अपने को मिटाता चला जाए, अपने को समाप्त करता चला जाए, अपने को काटता चला जाए और ऐसी घड़ी आ जाए कि फिर काटने को कुछ न बचे। तो निर-अहंकारिता उपलब्ध होती है। लेकिन यह निर-अहंकारिता निगेटिव है, नकारात्मक है। और इसमें एक अहंकार बहुत गहरे में शेष रह ही जाएगा कि मैंने अपने अहंकार को काट दिया है।
एक और ढंग से भी निर-अहंकारिता उपलब्ध होती है कि कोई अपने को फैलाता चला जाए और इतना बड़ा करता चला जाए कि उसके अलावा फिर कुछ शेष ही न रह जाए, वही शेष रह जाए, सब उसमें समा जाए। तब भी निर-अहंकारिता, तब भी ईगोलेसनेस उपलब्ध होती है। लेकिन तब पीछे कहने को इतना भी नहीं रह जाता कि मैं निर-अहंकारी हो गया हूं।
जो लोग अहंकार को काट कर चलेंगे, वे लोग अंततः आत्मा को उपलब्ध होंगे। आत्मा का अर्थ होगा, उनका अंतिम अहंकार शेष रह जाएगा कि मैं हूं। मैं की और सारी चीजें नष्ट हो जाएंगी, शुद्ध "मैं" ही शेष रह जाएगा। लेकिन जो व्यक्ति अहंकार को काट कर चलेगा, वह कभी परमात्मा को उपलब्ध नहीं होगा। जो व्यक्ति अहंकार को भी विस्तीर्ण करता चला जाएगा, इतना विस्तीर्ण कि सब उसमें समा जाए, उस दिन आत्मा का बोध नहीं रह जाएगा, परमात्मा का ही बोध रह जाएगा।
कृष्ण का जो व्यक्तित्व है, वह पाजिटिव है। वह विधायक है, वह निषेधात्मक नहीं है। वे जीवन में किसी भी चीज का निषेध नहीं करते। वे अहंकार का निषेध भी करते नहीं। वे तो कहते हैं, अहंकार को इतना बड़ा कर लो कि सभी उसमें समा जाए। तू बचे ही न, तो फिर स्वयं को मैं कहने का कोई उपाय न रह जाए। हम अपने को "मैं" तभी तक कह सकते हैं जब तक "तू" बाहर अलग खड़ा है। तू के विरोध में ही मैं की आवाज है। तू गिर जाए, तू न बचे, तो मैं भी बचेगा नहीं। मैं इतना बड़ा हो जाए... इसलिए उपनिषद के ऋषि कह सकेः अहं ब्रह्मास्मि। वह यह कह सके, मैं ही ब्रह्म हूं। इसका यह मतलब नहीं है कि तू ब्रह्म नहीं है। इसका मतलब यह है कि तू तो है ही नहीं, मैं ही हूं। वह जो हवाओं में लहरा रहा है वह भी मैं हूं और जो वृक्षों में लहर खा रहा है वह भी मैं ही हूं। वह जो जन्मा है वह भी मैं ही हूं, जो मरेगा वह भी मैं ही हूं। वह जो पृथ्वी है वह भी मैं ही हूं, जो आकाश है वह भी मैं ही हूं। मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं है। इसलिए अब मैं के बचने की भी कोई जगह नहीं बची। मैं किससे कहूं कि मैं हूं? किसके विरोध में कहूं कि मैं हूं? तो कृष्ण का पूरा का पूरा व्यक्तित्व विराट के साथ फैलाव का है, विस्तार का है। इसलिए कृष्ण कह सकते हैं, मैं ब्रह्म हूं। इसमें कोई अहंकार नहीं है। यह भाषा में ही मैं का प्रयोग है, मैं जैसा कोई पीछे बचा नहीं है।
– ओशो
कृष्ण स्मृति
प्रवचन - ०३
अनुपार्जित सहज शून्यता के प्रतीक कृष्ण
Calling OshO Lovers, Friends & Neo Sannyasins in Akola 🙏🏻
🌿 OshO MEET UP — AKOLA 🌿
A warm invitation to all OshO Lovers, Friends & Neo Sannyasins 🙏🏻
We are coming together for a small, informal meet-up with the intention of starting new OshO-related activities in Akola city.
Let’s meet, connect, share our experiences and ideas, and take the first step towards a beautiful new beginning. 🌸
📅 Date: 06/09/2026 (Sunday)
📍 Venue: Ashok Vatika, Akola
🕓 Time: 4:00 PM
✨ Let’s meet. Let’s connect. Let’s share. Let’s begin together. ✨
All OshO Lovers, Friends & Neo Sannyasins are warmly invited. 🙏🏼
— OshO Maitri Samarpan (OMS)
Contact: 8830239288
ध्यान की बात🎙️ऑनलाइन संवाद 🗣️इस रविवार ज़रूर जुड़े 🙏🏻
इस रविवार रात 9:30 PM ऑनलाइन जुड़े Google Meet के माध्यम से! 🧑🏻💻
ध्यान और ओशो कैसे पर्यायवाची है और कैसे हमारे पूरे जीवन को पूर्णतः रूपांतरित कर सकते है..आइए इस पर थोड़ी ऑनलाइन बात कर ले। अब तक हमने ‘मन की बात’ 🗣️ बहुत सुन ली अब ‘ध्यान की बात’ 🎙️ भी सुनी जाए।
इस रविवार के सत्र के मुख्य बिंदु:
• OMS द्वारा आयोजित ‘90 दिवसीय ऑनलाइन ओशो अनापानसती ध्यान’ का अभिप्राय(फीडबैक) सत्र 🎤
• OMS द्वारा आयोजित आगामी ‘8 दिवसीय ऑनलाइन ओशो ध्यान साधना शिविर’ की भूमिका और समझ 🧘🏻♀️
• OMS Online Meditation वर्षगांठ बहुआयामी महोत्सव का हार्दिक आमंत्रण और उसका स्वरुप 🎉
• हार्दिक संवाद, अभिव्यक्ति तथा अहोभाव सत्संग ❤️
इस रविवार - 30/08/2026 🗓️
समय - 9:30 PM से 10 PM (IST) ⏰
होस्ट: स्वामी बोध प्रमादो (ध्यान मित्र)
यह संवाद सत्र केवल OMS OshO Online WhatsApp Channel के सदस्यों के लिए है।
संवाद सत्र ध्यान की बात 🎙️ तथा ऑनलाइन ओशो ध्यान विधियों से जुड़ने के लिए संपर्क करे: +918830239288 या दी हुई व्हाट्सएप लिंक पर क्लिक करे। 👇🏼
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Good Night all beloved friends..may River of Love always flow with the grace of Master of Masters..🙏🏻💟🙏🏻
🫂 ओशो मैत्री समर्पण (OMS) 🫂 ✨ ऑनलाइन बहुआयामी महोत्सव ✨ OMS Online Meditation की वर्षगाँठ पर 🎉
📅 तारीख: 8 सितंबर 2026
⏰ समय: संध्या 6 से 8 PM तक
💻 Google Meet से जुड़े ऑनलाइन निःशुल्क बड़ी सहजता से
ऑनलाइन महोत्सव की लिंक OMS OshO Online के व्हाट्सएप चैनल पर निःशुल्क भेजी जाएंगी। 🤗
आप चाहें तो यह निमंत्रण पोस्ट अपने मित्रों, अन्य ओशो ग्रुप्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी भेज सकते हैं। सभी प्यारे ओशो प्रेमी मित्रो एवं नव संन्यासियों का हृदय से स्वागत है! ❤️
ऑनलाइन महोत्सव में निःशुल्क सम्मिलित होने के लिए दी हुई व्हाट्सएप लिंक पर क्लिक करे। अधिक जानकारी के लिए साथ में पोस्ट फ्लायर देखे या व्हाट्सएप करे: +918830239288
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आइए…🫶🏼
इस सुंदर मिलन में सहभागी बनें। ध्यान, उत्सव, संन्यास, सत्संग और कृतज्ञता के इन विविध आयामों को एक साथ जीएँ। 🙏🏼😌🙏🏼
Finally ‘Nahi Source Bin Thaav’ gets Thaav | OshO Source Center 🤗
I’m happy to share the newly redesigned Osho Resource Center website.
The Resource Center is an ongoing effort to preserve, document and make accessible original archival material connected with Osho’s life and work — photographs, manuscripts, letters, early publications, books and other material that has survived over the years.
The new website presents a glimpse of this archive, along with some of the stories and context that give these materials their meaning.
Much of this work happens quietly — locating material, documenting its history, digitising it and preserving the originals so that they remain available for the future.
I would be very happy if you could visit the new website. Your comments and feedback would be most welcome.
Message from Swami Anuragi. 📩
नागपंचमी की सभी ओशो प्रेमी, मित्रो तथा नव संन्यासियों को शुभकामनाएं! 🐍
🫂 ओशो मैत्री समर्पण (OMS) 🫂