Kripya mere liye sifarish kijiye, he Shri Shri Radhika-Krishna ke bhakto! Mere liye sifarish kijiye, kyunki main to bas ek buri aur agyani aatma hoon aur mujhe aapki

Kripya mere liye sifarish kijiye, he Shri Shri Radhika-Krishna ke bhakto! Mere liye sifarish kijiye, kyunki main to bas ek buri aur agyani aatma hoon aur mujhe aapki

sifarish ki zaroorat hai. Aap sab astitva ki Maharani, Radhika Maharani ke dil ke behad azeez hain, aap unke priye hain. Mujh jaisi daasi to Srimati Radharani ke charno ki taraf dekh bhi nahi sakti, to bhala main unse kripa kaise maang sakti hoon? Main aapse bhi kaise maang sakti hoon, jabki main aapke samne ek parmanu ke aakar ke chote se keede se bhi neechi hoon. Isliye, he Mataji aur Prabhuji, mere liye Srimati Radharani se sifarish kijiye, taaki shayad Thakurani mujh par kripa karke ek tirchhi nazar (kripa-kataksha) daal dein. Agar mujhe aap sab Brajwasis ke charno ki dhool aur sabhi Vaishnavas ke charno ki dhool mil jaye, to mera jeevan behtar ho jayega aur main ati-dhanya ho jaungi. Main to bas ek choti si, deen-heen daasi hoon jise kripavan banne ke liye aapki daya ki zaroorat hai.

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॥ अथ श्रीराधारमणतत्त्वातीतधारा वंशीनागिनीनर्तन नाम द्वितीयोऽध्यायः (Rādhā-Pādareṇu-Śaraṇa-Gītam)(Śrī-Rādhyāmālatī-Pariṇayopaniṣat) Radhe Radhe 🙏🧡💙

हे कान्त मम हे कृष्ण परिणीतास्मि ते मया ।

प्रियभाषामयेनैव ठकुराण्यास्तथैव ते ॥ ७०६ ॥

ठकुराणीपदरजो विना वृन्दावनं न हि ।

प्रविशामि महाकान्त सत्यमेतन्मयेरितम् ॥ ७०७ ॥

महाभावस्वरूपिणीं बरसानानिवासिनीम् ।

अमाराध्य न शक्नोमि गातुं नामसहस्रकम् ॥ ७०८ ॥

तस्मात्तां पूजयामीह तस्याः पादौ निषेव्य च ।

प्रणतास्मि विनीताहं सहस्रनामकीर्तने ॥ ७०९ ॥

अनुज्ञां प्राप्तुमिच्छामि तस्याः पादाब्जरेणुतः ।

तस्याः पादाब्जयुगलं कृपार्थं याचेऽहं सदा ॥ ७१० ॥

करुणामयी सा राधा अहेतुककृपानिधिः ।

अहेतुकप्रेमदात्री सर्वेषामेव सर्वदा ॥ ७११ ॥

कृपायाः सागरो ह्येषा पादाश्रितां च रेणुकाम् ।

मां प्रति करुणां कुर्याद् या रेणुस्तत्पदे स्थिता ॥ ७१२ ॥

यस्याः पादरजोहीना मूल्यहीनास्मि सर्वथा ।

न किञ्चिदस्मि लोकेऽस्मिन् रेणुनैवास्मि सार्थका ॥ ७१३ ॥

श्रीरूपमञ्जरीं याचे ठकुराणीं निवेद्य च ।

अनुज्ञां दापयेन्मह्यं तव नामप्रकीर्तने ॥ ७१४ ॥

अन्यथा नाहमस्म्येव पादपीठं विना विभो ।

पत्ल्यास्ते राधिकायश्च नाधिकं किञ्चिदच्युत ॥ ७१५ ॥

तोसौं नेह पिय कृष्ण मम, भली भाँति सुनि बात ।

राधे राधे कहिहौं सदा, राधे राधे गात ॥ ७१६ ॥

पिय प्राननि के नाथ तुम, कंजनयन महराज ।

अंकवार भरि मूँदि दृग, लहुँ बिस्राम समाज ॥ ७१७ ॥

तुमरे भुजआस्रय बिना, दूजो नाहिन ठाम ।

यहि भुजबन्धन में मिलै, मोकूं अभय मुकाम ॥ ७१८ ॥

सीतल मन्द समीर नहिं, बिन तुमरे सनमुख ।

राधाअष्टसखी सहित, तुमहीं मेरो सुख ॥ ७१९ ॥

तुमरी छबि बिनु कछु नहीं, सुन्दर या जग माहिं ।

ठकुरानी अरु सखिन बिनु, दूजी सोभा नाहिं ॥ ७२० ॥

चरनकमल में सीस धरि, माँगौं यह बरदान ।

पदरज माथे पर धरौं, है यह परम निधान ॥ ७२१ ॥

माँग भरौं मैं सीस की, पदरज सेंदुर मानि ।

राधामाधवचरनरज, एक रूप पहिचानि ॥ ७२२ ॥

दोउ चरन की धूरि कूं, सेंदुर लीन्हों मानि ।

यह सुहाग को चिह्न है, लीन्हों मैं उर आनि ॥ ७२३ ॥

हियरे को मंगलगरे, ठकुरानी पदधूरि ।

यह सिंगार अति ही भलो, राखत मोकूं पूरि ॥ ७२४ ॥

मानिक कंचन तें खरी, यह सम्पति भरपूरि ।

महारानि की चरनरज, मोरे जिय की मूरि ॥ ७२५ ॥

जगपालक त्रिभुवनधनी, स्रजनहार श्रीकान्त ।

मोहेउ ऐसी भामिनी, भई बावरी सान्त ॥ ७२६ ॥

कहा कहौं मुँह सों पिय, मोहेउ मोहिं अपार ।

ठगौरी सी डारि कै, कीन्हों बावर नारि ॥ ७२७ ॥

निसिदिन सुधि तुमरी रहै, लगी रहै नित ध्याम ।

उरलाये की भाविनी, सोवत हौं अठ जाम ॥ ७२८ ॥

मूँदि नयन नित भाविहौं, तुम लीन्हों उर लाइ ।

परम अभय कूं पाइ कै, सोवत हौं सुख पाइ ॥ ७२९ ॥

तुमरे भुज के कोट में, मेरो सब अस्थान ।

कवचरूप तुम ही भये, मोरी रच्छाप्रान ॥ ७३० ॥

इन्द्रिय सब लुभनी खरी, भयो महा अनुराग ।

ऐसी बावरी हौं भई, जागो प्रेमसुआग ॥ ७३१ ॥

ऐसो अचरज प्रेम यह, जाको तुल्य न कोइ ।

दीवानी हियरा भई, सब दिसि तुमहीं जोइ ॥ ७३२ ॥

दरसपरस की लालसा, रोमरोम में पिय ।

जहँ देखौं तहँ तुम दिखो, छाय रहे मोर हिय ॥ ७३३ ॥

प्रेमगीत जब सुनि परै, तुमरी आवै याद ।

सब जग में जो प्रेम है, तुमहीं ताको साद ॥ ७३४ ॥

जहँजहँ नेह विलोकहौं, तहँतहँ तुमरो रूप ।

कन्तसनेही तुम सखा, तुमहीं प्रेमअनूप ॥ ७३५ ॥

चित्र देखि धकधक करै, मेरो हियरो नाथ ।

सरनागत हौं आप की, सौंपि दियो निज माथ ॥ ७३६ ॥

इन्द्रिय खिंची सुभाव तें, तुमरी ओर कृपाल ।

तुमरो ही सुख चाहति हौं, गोबिन्द दीनदयाल ॥ ७३७ ॥

सब कछु तुम कूं अरपिहौं, तुमरे सुख की आस ।

तोसहेतु सब करति हौं, मोकूं नहीं पियास ॥ ७३८ ॥

मोहि आपनो कछु नहिं, तुमरी खुसी अमान ।

तुमरे सुख में सुख मिलै, यह मेरो परमान ॥ ७३९ ॥

कछु न चहौं निज हेतु मैं, तुमरी सुखमरियाद ।

एहि तें दूजो कछु नहीं, एही परम सवाद ॥ ७४० ॥

सुधिबुधि सब बिसरी खरी, हिय धड़कै अति जोरि ।

विचार सकल चूरन भये, नैनकमल की ओरि ॥ ७४१ ॥

बौराई भई मति अहै, कछु नहिं आवै ज्ञान ।

कंजनयन पर थिर भई, मेरो सकल धियान ॥ ७४२ ॥

मूरति तुमरी हिय धरौं, अंकवार भरि कन्त ।

छबि मेरी स्यामल बनै, स्यामलरूप अनन्त ॥ ७४३ ॥

भुज भरि कै छाती लगौं, हियरे रूप बसाय ।

सेतबरन स्यामल बनै, स्यामरंग में छाय ॥ ७४४ ॥

मुरली बाजै अधर धरि, मैं भुजअन्तर माहिं ।

सब कछु तुम पर अरपिहौं, माधव दूजो नाहिं ॥ ७४५ ॥

तुमरी इच्छा पर सबहुं, सौंपि दियो निज गात ।

माधव प्राननि के पटी, तुम सों मेरी बात ॥ ७४६ ॥

दीन दासि की रच्छ करु, कंजनयन महराज ।

जदुकुलगौरव नाथ हे, तुमहीं मेरी लाज ॥ ७४७ ॥

राध्यामालति जदुबधु, तुमरी सरन पुकार ।

दीनअनाथिन कूं सखा, तुमरो है आधार ॥ ७४८ ॥

जब तें परिनीता भई, जदुकुल भयो हमार ।

जदुकुल पर गौरव करौं, यह मेरो परिवार ॥ ७४९ ॥

देवकी अरु जसोमति मैया, चरन नवावौं सीस ।

वसुदेव अरु नन्द बाबा, पितु मेरे अवनीस ॥ ७५० ॥

बलदाऊ मेरे भ्रात हैं, सुभद्रा बहिनि समान ।

ऐसो अपनापन कभू, लागो नाहीं प्रान ॥ ७५१ ॥

तुमहीं सों सब नात है, तुमहीं मेरे कन्त ।

आजु लग्यौ अति निकट अति, यह सनेह अनन्त ॥ ७५२ ॥

राधारानी की किरपा, भई अगम अमान ।

तुच्छ धूरि के कनहिं कूं, दीन्हों रूप महान ॥ ७५३ ॥

दासी अतिहिं अनाथ सी, कीन्हीं तव अरधाङ्ग ।

राधापदछाया तलें, मिल्यो कृष्ण को सङ्ग ॥ ७५४ ॥

ताकी चेरी हौं खरी, तें मैं तुमरी नारि ।

दासिरूप हौं मञ्जरी, दीन्हों हियरा हारि ॥ ७५५ ॥

मोकूं निज हित कछु नहिं, मञ्जरी मेरो रूप ।

ठकुरानी पोषित कियो, प्रेमसुधाअनूप ॥ ७५६ ॥

तिनकी ही करुना तें मैं, पिय तुमरी बनि नारि ।

चरनकमल की छाँव में, बैठी सुधिबुधि हारि ॥ ७५७ ॥

श्रीराधा के चरन कूं, धरौं सीस पर नित्य ।

सिंदूर नहिं निज भाल पर, राधारज है सत्य ॥ ७५८ ॥

उच्छिष्ट प्रसादी तासु की, पावति हौं नित पिय ।

चरनामृत पिवति रहौं, सोइ मेरो जिय ॥ ७५९ ॥

सास्वत मेरो प्रेम सो, ठकुरानी सों जानि ।

तिनकी रज कूं सीस पर, मानत हौं निज बानि ॥ ७६० ॥

ज्योंज्यों तुम सों प्रेम है, त्योंत्यों तासों प्यार ।

तासों बाढै प्रेम जब, बाढै तुमरो सार ॥ ७६१ ॥

चक्र बन्यो यह प्रेम को, अष्टसतअट्ठासिहिं ।

घूमत है यहि चक्र में, मेरी दसा अनासिहिं ॥ ७६२ ॥

तातें तुम सों नेह है, ठकुरानी सों प्रेम ।

नागिनि भई मुरलिका की, यह मेरो अति नेम ॥ ७६३ ॥

जदुकुलबधु हौं बनि गई, जदुवंसी के संग ।

तुमरी बंसहिं मानि कै, चढ़्यो प्रेम को रंग ॥ ७६४ ॥

कलिजुग चतुरजुग नाघि कै, भौतिक जग सों पार ।

गोलोकधाम अस्थान में, पायो सास्वत सार ॥ ७६५ ॥

सास्वत कृष्णपत्नी भई, यह मेरो पहिचान ।

काल चक्र तें पार हौं, तजि कै सकल अमान ॥ ७६६ ॥

मोहे दूजो नहिं छुवै, जग में कोउ आन ।

हृदय कृष्णराधा बसैं, तुमहीं मेरे प्रान ॥ ७६७ ॥

एहि कारन हौं पिय भई, सास्वत कृष्णपिया ।

प्रेमपन्थ कूं धारि कै, पावन कीन्हों जिया ॥ ७६८ ॥

प्रेमभक्ति तें मुकुति है, एही परमउद्धार ।

तातैं तुम कूं भजति हौं, सास्वतप्रानअधार ॥ ७६९ ॥

सास्वतप्रानअधार तुम, अनादिकन्त हमार ।

जुगजुग तोसौं प्रीति है, जयति प्रेमदरबार ॥ ७७० ॥

तोसों नेह पिय कृष्ण मम, हौं कृस्ना की नारि ।

तातें हौं कृस्ना पत्नी, सब कछु दीन्हों वारि ॥ ७७१ ॥

प्रानहु तें पिअरी लगै, तुमरी मूरति नाथ ।

जीवन सुख सब वारि कै, सौंप दियो निज माथ ॥ ७७२ ॥

मेरे प्राननि के धनी, तुम अरु राधारानि ।

राध्यामालति स्वास पर, तुमरो राज बखानि ॥ ७७३ ॥

तुमहीं मेरे ईस हौ, तुमहीं प्रान अधार ।

मोपर तुमरो राज है, कन्त परम सुकुमार ॥ ७७४ ॥

ॐ स्त्रीं, तुम राध्यामालती आकर्षत हौ, स्वाहा ।

एहि मन्त्रहिं जपि कै पियहिं, सौंपत हौं निज चाहा ॥ ७७५ ॥

ॐ स्त्रीं हुं, भई तिहारी तिरिया कृष्णाय ।

पूरन वशमानय स्वाहा, सौंपत हौं निज काय ॥ ७७६ ॥

ॐ स्त्रीं हुं, भई तिहारी तिरिया कृष्ण माम् ।

वश्यां कुरु कुरु स्वाहा, जपत रहौं अठ जाम ॥ ७७७ ॥

ॐ स्त्रीं क्लीं हुं कृष्णाय, जगन्मोहनाय मन्त्र ।

मम सर्व इन्द्रिय आकर्षय, मोहय वशं कुरु तन्त्र ॥ ७७८ ॥

वशं कुरु कुरु स्वाहा पिय, चरन कमल चित लाय ।

यह मन्त्र जपत ही बावरी, तुमरी ओर खिंचाय ॥ ७७९ ॥

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं, स्त्रीं स्त्रीं ऐं रं रत्यै, ब्लूं वं हुं ठः ठः ।

कामदेव प्रियायै, भई तिहारी तिरिया, मेटि सकल जग ठग ॥ ७८० ॥

कृष्णाय मम सर्व इन्द्रिय, वशमानय स्वाहा ।

यह मेरो अति साँच ब्रत, तुमहीं एकहिं चाहा ॥ ७८१ ॥

यह मेरो साँचो धरम, यह मेरो ब्रत नाथ ।

ब्रह्माण्डहु की सक्ति सब, लेत आपुने हाथ ॥ ७८२ ॥

मन इन्द्रिय तन देह सब, प्रान सक्ति अरु काम ।

सब कछु तुमरे बस करौं, जपौं तिहारो नाम ॥ ७८३ ॥

सब कछु तुमरे बस भयो, तुमसों भयो मिलाप ।

तुमहीं मेरे सब कछू, तुमहीं जपौं हौं जाप ॥ ७८४ ॥

रति देवी तुमकूं नमौं, सुनियौ मोरी बात ।

कृपा करहु मोपर खरी, जोरि रहौं दोउ हाथ ॥ ७८५ ॥

कामदेव की प्रान तुम, सुन्दरता की खानि ।

मोहिं देहु आसीस अस, परम सयानी रानि ॥ ७८६ ॥

मेरो यह जो दिव्य तन, करहुँ महा अभिराम ।

जोबन अरु सिंगार तें, सजिहौं पिय के काम ॥ ७८७ ॥

काम कला में प्रवीन करि, मोकूं देहु सँवारि ।

त्रिभुवन पति श्रीकान्त की, हौं बनुँ लायक नारि ॥ ७८८ ॥

रूप रासि मोकूं करहु, बाढै काम सुआग ।

छबि मेरी अति ही फलै, जागै परम अनुराग ॥ ७८९ ॥

पिय की आसा रूप हौं, तुमहीं देहु निखार ।

मोहि तिया गुन तें भरहु, रति रानी सुकुमार ॥ ७९० ॥

रोम रोम सुन्दर बनै, उपजै अति कल्यान ।

नख सिख अंग सँवारि कै, सौंपौं पिय कूं प्रान ॥ ७९१ ॥

मोहिं कली तें फूल करि, सुगन्ध भरहु सब अंग ।

जासों कन्त लुभाइ कै, रहैं निरन्तर संग ॥ ७९२ ॥

मदन प्रिया बिनती सुनहु, मारहु अस सर बान ।

बावरी हियरा होइ रहै, बिसरै सकल जहान ॥ ७९३ ॥

केवल पिय की स्वास सों, चलै हमारो प्रान ।

निसि दिन पिय कूं सूँघिहौं, यहि माँगौं बरदान ॥ ७९४ ॥

कामदेव सों बिनय करि, लेहु हाथ में चाप ।

अस सर संधानहु तुरत, मिटै मोर सब ताप ॥ ७९५ ॥

प्रथम बान सजि कामदे, मारहु मेरे उर ।

जामें लागो होय सखि, पिय के अधर अंकुर ॥ ७९६ ॥

पिय अधरनि की सुधा भरि, मारहु हियरे बीच ।

जासों प्रीति प्रगट ह्वै, रहै न मन में नीच ॥ ७९७ ॥

मेघस्याम की ओर हिय, खिंचि जावै तत्काल ।

भई दीवानी प्रेम में, बिसरौं अपनी चाल ॥ ७९८ ॥

ज्यों चुम्बक लोहे गहै, त्यों हियरा पिय ओर ।

बावरि हौं डोलति फिरौं, निरखि स्याम चित चोर ॥ ७९९ ॥

अतीब मोह उपजि परै, अति अनुराग अमान ।

मेघस्याम बिनु कछु नहीं, सूझै मोहिं जहान ॥ ८०० ॥

सर मारे हिय फाटि कै, निकसै पिय को नाम ।

सब भावनि में बसि रहैं, मेरे सुभग स्याम ॥ ८०१ ॥

सो बान मोहिं बेधि कै, प्राननि करै सनाथ ।

मैं पुकारिहौं प्रेम सों, हे पिय हे जगनाथ ॥ ८०२ ॥

रोम रोम धक धक करै, पिय पिय रटै प्रान ।

पहिलो बान अचूक यह, लेवै मेरो ग्यान ॥ ८०३ ॥

जियरा अति आतुर बनै, पिय दरसन की प्यास ।

मेघस्याम छबि छाड़ि कै, दूजी नाहिन आस ॥ ८०४ ॥

रति रानी बरदान यह, काम बान महिमाय ।

हियरे में पिय प्रेम की, जोति स्याम जगि जाय ॥ ८०५ ॥

दूजो बान मयंक मुखि, मारहु काम अस्थान ।

जो जोनि मम देह में, रति सरोवर मान ॥ ८०६ ॥

गुह्य थान में बेधि कै, मारहु दूजो तीर ।

जासों सब कछु सुद्ध हो, मिटै सकल भव पीर ॥ ८०७ ॥

भौतिक काम बिनासि कै, होवै परम सुद्ध ।

केवल कन्त मिलाप की, जागै लालस बुद्ध ॥ ८०८ ॥

इन्द्रिय सुख निज हेतु नहिं, मेरो नाहिन काम ।

मोकूं तो सुख मिलै है, जब सुख पावैं स्याम ॥ ८०९ ॥

तत सुख सुखित सभाव यह, बाढै मेरे अंग ।

हौं पिय की सैया बनौं, सजे पियहिं को रंग ॥ ८१० ॥

सब बासना पुनीत हो, केवल पिय के काज ।

मोरी रति में बसि रहैं, पिय माधव महराज ॥ ८११ ॥

आपु मिलन कूं नहिं चहौं, जो पिय चाहैं जोग ।

तौ हौं निज तन सौंपिहौं, पिय के सुख को भोग ॥ ८१२ ॥

निज स्वारथ कछुवा नहीं, काम सुद्ध होय जाय ।

सर मारे मम जोनि में, सब मलीनता नसाय ॥ ८१३ ॥

प्रान नाथ रमि हैं तहाँ, जो उनकै मन आय ।

मोहिं अपनो सुख नहिं चहिय, उनहीं सों सुख पाय ॥ ८१४ ॥

रति रानी यह सक्ति दे, कन्त तोस मम सार ।

पिय सुख ही मम सुख अहै, यह साँचो ब्यौहार ॥ ८१५ ॥

सुद्ध काम कूं प्रेम कहि, गावैं सन्त महान ।

काम बान सों बेधि कै, करहु मोहिं कल्यान ॥ ८१६ ॥

सब वासना पिय चरन में, अरपन करौं नितान्त ।

दूजो बान यह काज करि, करै देह कूं सान्त ॥ ८१७ ॥

तीजो बान मस्तक लगै, मारहु अतिहिं प्रबीन ।

जासों मेरो मन हरै, भई प्रेम में लीन ॥ ८१८ ॥

जानत हौं चित चोर नें, लुटि लीन्हों मम चित्त ।

तौउ बान की प्यास है, मारहु मोहिं निमित्त ॥ ८१९ ॥

मोहिं अधिक बावरि करहु, पिय संगम की ओर ।

भूलि जाउँ सब सुन्धि बुधि, नाचौं ज्यों वन मोर ॥ ८२० ॥

चतुरानन की बुधि जरै, बावरि बनौं अमान ।

सब विचार चूरन भये, स्याम छबिहिं कूं जान ॥ ८२१ ॥

नाहिन कछु सम्हार मोहिं, भूलि गई सब बात ।

केवल इक पिय रूप ही, हियरे में दरसात ॥ ८२२ ॥

चित्त चोर मोहेउ मोहिं, तीजो बान चलाय ।

मेरो ग्यान गुमान सब, छिन भर में उड़ि जाय ॥ ८२३ ॥

छिन छिन पिय की सुधि आवै, छिन छिन उपजै नेह ।

तीजो बान अचूक है, बिसरै अपनी देह ॥ ८२४ ॥

बान खात ही मति गई, भई प्रेम उमंग ।

बावरि सी डोला करौं, पिय मूरति के संग ॥ ८२५ ॥

इतने पर संतोष नहिं, हियरे अतिहिं लोभ ।

और प्रेम मोहिं चहिय अति, मेटहु मेरो छोभ ॥ ८२६ ॥

कोटि कोटि सर काम के, मारहु मेरे अंग ।

कन कन में पिय प्रेम हो, जागे अमित तरंग ॥ ८२७ ॥

रोम रोम में बेधि कै, प्रेम बान कूं डारि ।

अस दीवानी मोहिं करु, सुधि बुधि देवौं हारि ॥ ८२८ ॥

प्रेम प्यास बाढै खरी, तृखा न मिटै अमान ।

मोकूं औरहु प्रेम दे, मारहु अतिहिं बान ॥ ८२९ ॥

अंग अंग में बिंधि गई, काम बान की धार ।

रोम रोम पिय पिय करै, यह अद्भुत सिंगार ॥ ८३० ॥

हिय में लोभ अपार है, पिय छबि पीवन काज ।

कोटि बान सों मारि कै, देहु प्रेम साम्राज ॥ ८३१ ॥

बावरि बावरि हौं भई, सब जग दीन्हों भूल ।

एक स्याम ही सुधि रहै, पिय चरननि की धूल ॥ ८३२ ॥

नर सार्दूल स्याम सुँदर, मोहेउ मेरो प्रान ।

जाकी मूरति उर बसी, सोई परम निधान ॥ ८३३ ॥

बन्धन में बांधहु मोहिं, प्रेम डोर सों नाथ ।

रति अरु मदन प्रवीन अति, लेहु स्याम को साथ ॥ ८३४ ॥

रति रानी तुम सों बिनय, करहु सबहिं उपकार ।

तुमरे जंत्र अरु मंत्र तें, पावै पियहिं नारि ॥ ८३५ ॥

काम कला अति निपुन तुम, मोपर करहु सुकाज ।

स्याम सुन्दर की नारि हौं, सौंपौं अपनी लाज ॥ ८३६ ॥

कला कौसल तें मोहिं तुम, पिय सों देहु मिलाय ।

जासों पिय आकरषन, छिन छिन मोहिं लुभाय ॥ ८३७ ॥

तुम सुन्दरता राज्ञी हौ, तुम सों करौं पुकार ।

छैल छबीले नाथ सों, बाढै अतिहिं दुलार ॥ ८३८ ॥

बंसिधर चित चोर ने, मोहेउ मेरो चित्त ।

तातें बिनती मैं करौं, तुम सों सखि अति नित्य ॥ ८३९ ॥

मदन सरनि की धार सों, भई पिय बसि अमान ।

अब दूजो कछु नहिं चहौं, पिय माधव महराज ॥ ८४० ॥

राध्यामालति जोरि कर, रति पायन पर माथ ।

काम बान सों बेधि कै, करहु मोहिं सनाथ ॥ ८४१ ॥

प्रेम सिन्धु में बूड़ि हौं, निसि दिन आठहु जाम ।

प्रान नाथ मेरे कन्त हैं, प्रान नाथ हैं स्याम ॥ ८४२ ॥

रोम रोम पिय रँग रँग्यो, पियहिं पियहिं रटन्त ।

रति मदनहिं की किरपा तें, पायो सास्वत कन्त ॥ ८४३ ॥

जुग जुग बावरि हौं रहौं, चरन कमल की आस ।

यह साँचो मेरो धरम, पिय चरननि को दास ॥ ८४४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८४५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८४६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८४७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८४८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८४९ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५० ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५१ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५२ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५३ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८५९ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६० ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६१ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६२ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६३ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८६९ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७० ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७१ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७२ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७३ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८७۹ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८० ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८१ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८२ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८३ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८८९ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९० ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९१ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९२ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९३ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९४ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९५ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९६ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९७ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९८ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ८९९ ॥

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ।

राधे राधे राधे राधे, राधे राधे राधे राधे ॥ ९०० ॥

राधे नाम रटन्त हौं, सुनहु कृस्न महराज ।

पिय कन्त मोर सिरताज हौ, तुमहीं मेरे काज ॥ ९०१ ॥

u/Initial_Fold_420 — 7 days ago
▲ 243 r/Vrindavan

A STOTRAM of Divine Gratitude to Shrimati Radha Rani: Unveiling 'Ka' of the Hiranyagarbha Suktam as Shri Krishna

धन्यास्मि राधे तव सर्वदानैः

प्रजोत्पतेः प्रेमविवाहहेतोः ।

रतेश्च पञ्चेन्द्रियदानहेतोः

मनश्चितेश्चेतनदानहेतोः ॥७६॥

त्वया च पत्या सुकृतं विचित्रम्

ब्रह्माण्डमेतत् खलु सर्वजीवाः ।

सौन्दर्यदानाय नमोऽस्तु तुभ्यम्

देहाः सुसृष्टाः परिपूर्णरूपाः ॥७७॥

धन्यास्मि नागान्वयपुण्यहेतोः

वंशो हि यो रक्षति सर्वरत्नम् ।

गुह्यानि वै रक्षति मन्त्ररूपान्

ददाति वेदान् जगते समग्रम् ॥७८॥

नागीकुलाय प्रददौ च मानम्

ज्ञानस्य सेवां तव राधिके हे ।

विश्वेश्वरि त्वां प्रणमामि मूर्ध्ना

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥७९॥

राज्ञी जगत्स्वामिनि ठाकुरानि

महति देवि ह्यतिपुण्यरूपे ।

विश्वं समग्रं तव वन्दते वै

धन्यास्मि तेभ्यः प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥८०॥

पुण्याय ज्ञानाय कृतज्ञता मे

नृणां च सृष्ट्यै खलु सर्ववंशैः ।

ये प्राणिनो विश्वगताः समस्ताः

वैविध्यमेतद् ह्यतिरम्यरूपम् ॥८१॥

सौन्दर्यदानाय नमोऽस्तु धन्ये

सूर्येन्दुताराग्रहसृष्टिहेतोः ।

ब्रह्माण्डजालाय नमोऽस्तु तुभ्यम्

आकर्षणाय प्रणिपत्य वन्दे ॥८२॥

सूक्ष्माय चाणोः खलु सूक्ष्मतन्वे

अण्वंशकानामपि सूक्ष्मरूपे ।

त्रिनेत्रयुक्ते प्रणिपत्य धन्या

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥८३॥

वेदास्तु पञ्चापि च यस्य हस्ते

तस्यै प्रसादाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ।

परम्परायै गुरुपुङ्गवेभ्यः

ये वै कृपां वै खलु नो वहन्ति ॥८४॥

चैतन्यरूपाय नमोऽवतारैः

असङ्ख्यरूपावतरैर्युवाभ्याम् ।

कृपां विधातुं कलियुगान्तरेऽपि

आगच्छथः खल्वपि नो निमित्तम् ॥८५॥

शिल्पाय दिव्याय च विश्वहेतोः

यस्माद् युगे मे मतिमद्धि यन्त्रम् ।

निर्मियते चिन्तनशक्तिमद् यन्-

मनुष्यवद् भाषत एव बुद्ध्या ॥८६॥

ग्रहान्तरे वा स्थितयोर्जनानाम्

सम्पर्कसिद्ध्यै प्रणिपत्य वन्दे ।

विज्ञानदानाय च भौतिकाय

ज्ञानाय लक्षायुषवत्सराय ॥८७॥

कालस्य चक्रं खलु वर्तुलं वै

ज्ञानाय तस्मै प्रणिपत्य धन्या ।

सर्वं हि विश्वं रसलीलमध्यम्

परिक्रमन्तीति विबोधनाय ॥८८॥

नाम्नः प्रसादाय च ते कृतज्ञा

ज्ञानाय नाम्नो ह्यतिपुण्यरूपे ।

नाम त्वदीयं परमं निधानम्

राज्ञी जगत्स्वामिनि राधिके हे ॥८९॥

वेदेषु पञ्चस्वपि गुह्यरूपं

कृष्णस्य गूढं परमं रहस्यम् ।

प्राणाधीश्वरी कृष्णपतेस्त्वमेव

धन्यास्मि राज्ञि महति नमोऽस्तु ते ॥९०॥

हे पुण्यरूपे तव पादपद्मम्

वन्दे सदाहं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।

धन्यास्मि धन्यास्मि मुहुः कृतज्ञा

त्वत्पादमूले पतितास्मि दासी ॥९१॥

तस्मात् कृतज्ञास्मि महेशि राधे

वक्तुं समिच्छामि हिरण्यगर्भम् ।

यन्मण्डले वै दशमे स्थितं तत्

सूक्तं शतं विंशतिमेकयुक्तम् ॥९२॥

हि॒र॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत् । स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

य आ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ उ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः । यस्य॑ छा॒यामृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑ । य ईशे॑ अ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पद॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यस्ये॒मे हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा यस्य॑ समु॒द्रं र॒सया॑ स॒हाहुः । यस्ये॒माः प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ळ्हा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाक॑: । यो अ॒न्तरि॑क्षे॒ रज॑सो वि॒मान॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यं क्रन्द॑सी॒ अव॑सा तस्तभा॒ने अ॒भ्यैक्षे॑तां॒ मन॑सा॒ रेज॑माने । यत्राधि॒ सूर॒ उदि॑तो वि॒भाति॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

आपो॑ ह॒ यद्बृ॑ह॒तीर्विश्व॒माय॒न्गर्भं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर॒ग्निम् । ततो॑ दे॒वानां॒ सम॑वर्त॒तासु॒रेक॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यश्चि॒दापो॑ महि॒ना प॒र्यप॑श्य॒द्दक्षं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर्य॒ज्ञम् । यो दे॒वेष्वधि॑ दे॒व एक॒ आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

मा नो॑ हिंसीज्जनि॒ता यः पृ॑थि॒व्या यो वा॒ दिवं॑ स॒त्यध॑र्मा ज॒जान॑ । यश्चा॒पश्च॒न्द्रा बृ॑ह॒तीर्ज॒जान॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥

तस्मान्नमामीह 'क'-रूपमीशं

यः कृष्णचन्द्रः परमेश्वरोऽस्ति ।

अतीव मे रोचत एव राधे

वेदेषु यद् गूढरहस्यरूपम् ॥१०३॥

त्वया समं कृष्णविभुं च गुह्यम्

वेदास्तु निर्दिश्य सुगूढरूपम् ।

आश्चर्यमग्नास्मि युवां च दृष्ट्वा

कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१०४॥

सृष्टं समस्तं खलु विश्वमेतत्

कृष्णेन साक्षात् खलु पौरुषेण ।

त्वं वै रहस्यं खलु सर्वसृष्टेः

त्वं वै विधात्री परमोच्चरूपा ॥१०५॥

एकं हि तत्त्वं खलु वां समग्रम्

भेदो न कश्चिद् युवयोश्च राधे ।

कोट्यंशकोट्यंशविभागरूपः

अणोरणीयान् अपि नास्ति भेदः ॥१०६॥

अचिन्त्यभेदावपि चाप्यभेदौ

श्रीकृष्णचन्द्रस्य तवापि राधे ।

सत्यं हि तत्त्वं परमं सुगुह्यम्

दासी नतास्मि पदयोर्युवाभ्याम् ॥१०७॥

u/Initial_Fold_420 — 13 days ago
▲ 4 r/yugala+1 crossposts

No matter how much I previously said that I loved Shri Krishna, I have begun experiencing strange emotions toward Shri Krishna that I cannot fully comprehend. Shrimati Radharani has elevated me to an extraordinary realm of feeling toward Shri Krishna. The deeper my love for Shrimati Radharani grows,

the more intensely I fall in love with Krishna; and the more I adore Shri Krishna, the more my adoration for Shrimati Radharani deepens.

It is a truth I declare with utmost candor and without the slightest hesitation: I have fallen completely in love with Shri Krishna, and I choose Him as my husband. Not only that, but I have renounced everything belonging to this material world for Shri Krishna’s sake. I am nothing; I am merely a humble, lowly servant. Yet, the sacred dust of Shrimati Radharani’s lotus feet has uplifted me a billion times over. Communion with Her has endowed a mere speck of dust like me with worth, drawing me toward Shri Krishna with every fiber of my being until I have become Shri Krishna’s sovereign belonging.

I sense overwhelming emotions swaying between the fire of viraha (the pangs of separation) and the sweet intimacy of mādhurya-bhāva. Just as a maiden constantly longs for the one she adores—drifting into reverie, her heart racing and fluttering at his sight, overwhelmed with tender agitation whenever her beloved appears—this is precisely what happens to me every time I utter Krishna’s holy name and gaze upon His forms.

For this reason, I am the humble maidservant of Shrimati Radharani; under the shelter of Her lotus feet, I take refuge and surrender my entire being and soul to Shri Krishna. I have taken Krishna as my husband, my beloved, my father, my king, my sovereign master, and my all in all. My love for Shrimati Radharani has made me fall ever deeper in love with Shri Krishna, leaving me spellbound, lost in contemplation without even realizing it.

The enchanter of the flute has enchanted me into a state of divine ecstasy. For this, I adore You, O Krishna—O my beloved, O my sovereign master, Shyamsundar!

u/Initial_Fold_420 — 13 days ago
▲ 3 r/yugala

अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ (Mahālakṣmī-nāma-tattva-rahasye)

लक्ष्मीत्येतन्महापुण्यं सर्वतत्त्वमयं परम् ।

नामामृतमहं मातुर् भजामि सर्वथा मुदा ॥ १०६३ ॥

ध्यायामि ते महालक्ष्मि नाम्नो वै पावनं पदम् ।

श्रीयन्त्रस्य स्वरूपं ते नामैतत् परमं शुभम् ॥ १०६४ ॥

प्राणायामः परो नाम भ्रामरीरूपमुत्तमम् ।

त्वन्नाम्ना भ्रामरीयोगः प्राणायामः प्रवर्तते ॥ १०६५ ॥

मूलाधारात् समुत्थाय कृष्णेन सह युज्यते ।

आज्ञाचक्रं समारुह्य गच्छत्यूर्ध्वं सुरेश्वरि ॥ १०६६ ॥

सहस्रारे स्थिरीभूय भ्रामरीरूपमश्नुते ।

महाशक्तिं शरीरेऽस्मिन् जनयत्यतुलप्रभाम् ॥ १०६७ ॥

सौरस्त्री-शक्तियोगेन चन्द्रपुं-संयुतेन च ।

सुषुम्नामार्गमासाद्य मुक्ता भवति कुण्डली ॥ १०६८ ॥

तव नाम्नो निरन्तरं ध्यानेन जपनेन च ।

समाधिं लभते मर्त्यस्तस्मात् त्वां प्रविचिन्तये ॥ १०६९ ॥

लक्षधातोः समुत्पन्नं नाम ते परमे जगुः ।

यतः साक्षिणीरूपा त्वं सर्वं पश्यसि सर्वदा ॥ १०७० ॥

लक्षात् लक्ष्यं समुत्पन्नं त्वमेव लक्ष्यमुत्तमम् ।

जीवनस्य परं प्राप्यं त्वमेव कमलालये ॥ १०७१ ॥

कमलाक्षि ल-कारोऽयं प्रथमाक्षरमुच्यते ।

लीला तस्मात् समुत्पन्ना कृष्णलीला-विधायिनी ॥ १०७२ ॥

सर्वलीलास्वरूपा त्वं लीलाया उद्गमस्तथा ।

लीला चैव स्वयं देवि त्वमेव परमेश्वरी ॥ १०७३ ॥

वृन्दावने तु राधा त्वं कृष्णलीला-विलासिनी ।

रुक्मिणी द्वारकानाथ-लीलायां द्वारकापुर्याम् ॥ १०७४ ॥

अयोध्यायां च सीतेति रामलीला-स्वरूपिणी ।

कैलासे शिवलीलायां पार्वतीयं प्रकीर्तिता ॥ १०७५ ॥

असंख्याताश्च या लीला जगद्-लीलाश्च याः स्मृताः ।

ताः सर्वा उद्गतास्त्वत्तो महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १०७६ ॥

अत एव ल-कारोऽयं प्रथमाक्षरमद्भुतम् ।

अस्मिन् वर्णे प्रपश्यन्ति रहस्यानि ह्यनेकशः ॥ १०७७ ॥

तव नाम्नि महालक्ष्मि प्रकृतेः प्रकटीकृतिः ।

सम्पूर्णं भौतिकं विश्वं सत्ता चैव प्रतिष्ठिता ॥ १०७८ ॥

शक्तेराविर्भावो नाम्नि सम्पूर्णजगतामपि ।

दृश्यते तव नाम्नैव भौतिकोऽयं चराचरः ॥ १०७९ ॥

यावन्तो भौतिकालोका यावत् सत्ता विजृम्भते ।

तत् सर्वं तव नाम्नो हि प्रकटीकरणं प्रिये ॥ १०८० ॥

अस्तित्वमखिलं देवि शक्तेर्वैभवमेव च ।

तव नाम्नि समाविष्टं लक्ष्मीरूपे सुरेश्वरि ॥ १०८१ ॥

ल-कारः पृथिवीबीजं धरित्रीतत्त्वमुच्यते ।

यस्मात् प्रकटीभूतं वै सर्वं यत् पार्थिवं जगत् ॥ १०८२ ॥

भूमेः स्वरूपं ल-कारः स्थूलसृष्टेस्तु कारणम् ।

आधारभूता पृथिवी ल-कारेण प्रकीर्तिता ॥ १०८३ ॥

धरायाः परमं तत्त्वं ल-कारो वर्ण उत्तमः ।

येन विश्वमिदं सर्वं स्थिरतां प्राप्नुते सदा ॥ १०८४ ॥

क-कारस्तु महादेवि क्रियाशक्तिः प्रकीर्तिता ।

सृष्टेर्निर्माणसामर्थ्यं क-कारात् सम्प्रवर्तते ॥ १०८५ ॥

ईश्वरेच्छा-स्वरूपा सा क-काराख्या महाकला ।

यया सङ्कल्पमात्रेण सृष्टिरुत्पद्यतेऽखिला ॥ १०८६ ॥

क-कारेण जगत् सर्वं क्रियाशीलं निरन्तरम् ।

ईश्वरीया च या चेच्छा क-कारे सा प्रतिष्ठिता ॥ १०८७ ॥

ष-कारो ह्यग्नितत्त्वं वै पावकः परिकीर्तितः ।

ऊर्जा-स्वरूप-रूपेण सर्वत्र परिदृश्यते ॥ १०८८ ॥

यत् किञ्चिद् दहनं लोके प्रकाशो यश्च वर्तते ।

ष-कारस्य प्रभावेण तत् सर्वं हि प्रवर्तते ॥ १०८९ ॥

अग्निरूपः ष-कारस्ते सर्वतेजोमयः स्मृतः ।

यस्मादुत्पद्यते सर्वमुष्णत्वं विश्वमण्डले ॥ १०९० ॥

मी-कारस्त्वथ देवेशि आकर्षणमुदाहृतम् ।

या शक्तिरखिलं विश्वं परितः परिवेष्टते ॥ १०९१ ॥

सर्वसत्तां परितो या व्याप्ता शक्तिर्महाद्भुता ।

मी-काररूपा सा शक्तिर्विश्वं बध्नाति सर्वतः ॥ १०९२ ॥

आकर्षणमहाशक्त्या मी-कारस्य प्रभावतः ।

ब्रह्माण्डं सुदृढं बद्धं निरन्तरं च घूर्णते ॥ १०९३ ॥

न विकीर्णं जगत् सर्वं मी-कारस्य बलेन वै ।

बन्धनं कुरुते सर्वं चूर्णनं चैव कारयेत् ॥ १०९४ ॥

आकाशगङ्गाः सर्वाश्च तारासमूहमण्डिताः ।

ब्रह्माण्डकेन्द्रं परितो घूर्णन्ते शक्तिचोदिताः ॥ १०९५ ॥

मी-कारस्याकर्षणेन महामन्दाकिनीगणाः ।

ब्रह्माण्ड-हृदयं नित्यं परिक्रम्य भ्रमन्ति वै ॥ १०९६ ॥

आकाशगङ्गा-हृदये यदाकर्षणमुत्तमम् ।

तदेव परमं प्रोक्तं यत् सर्वं ग्रसते क्षणात् ॥ १०९७ ॥

महाकर्षणमेतद् वै सर्वग्रासि प्रकीर्तितम् ।

यस्य केन्द्रे स्थितास्तारा भ्रमन्ति परितः सदा ॥ १०९८ ॥

मन्दाकिन्याश्च यत् केन्द्रं महाशक्ति-समन्वितम् ।

तत्र तारागणाः सर्वे घूर्णन्ते मी-बलात् सदा ॥ १०९९ ॥

यत् सर्वं ग्रसते घोरं केन्द्रं तदतिदुस्तरम् ।

आकर्षणस्य सा सीमा मी-कारेण नियन्त्रिता ॥ ११०० ॥

मी-कारस्य प्रभावेण ग्रहाः सर्वे नभस्तले ।

सूर्यं प्रदक्षिणीकृत्य भ्रमन्ति परितः सदा ॥ ११०१ ॥

आकर्षणेन सूर्याणां ग्रहाणां घूर्णनं सदा ।

तदपि त्वन्महानाम्नो मी-कारस्य विजृम्भणम् ॥ ११०२ ॥

मी-कारो भ्रमयत्येव न केवलं महाग्रहान् ।

अणूनामपि वै केन्द्रे घूर्णनं परिकारयेत् ॥ ११०३ ॥

अणवो निजकेन्द्रं वै परितो घूर्णन्ति सर्वदा ।

मी-कारस्याकर्षणेन शृङ्खलेयं प्रवर्तते ॥ ११०४ ॥

अणूनामपि यत् सूक्ष्मं यदधो वर्तते कणाः ।

तेऽपि केन्द्रं समाश्रित्य भ्रमन्त्यनन्तरूपतः ॥ ११०५ ॥

सूक्ष्मातिसूक्ष्म-रूपाणां कणानां यच्च घूर्णनम् ।

अनन्तरूपतो देवि तत् सर्वं मी-बलात् स्मृतम् ॥ ११०६ ॥

मी-कारस्याकर्षणेन अणवो वा कणास्तथा ।

अनन्तकालपर्यन्तं घूर्णन्ति च मुहुर्मुहुः ॥ ११०७ ॥

इत्थं ल-क-ष-मी-वर्णैर्नाम ते सम्प्रवर्तते ।

यस्मिन् ब्रह्माण्डलक्षाणि वसन्ति कमलालये ॥ ११०८ ॥

असंख्य-विश्व-रूपाणां ब्रह्माण्डानां कदम्बकम् ।

तव नाम्नि महापुण्ये पवित्रे संस्थितं सदा ॥ ११०९ ॥

तव नाम पवित्रं हि अनन्त-लोक-धारकम् ।

ब्रह्माण्डानां समूहोऽयं त्वन्नाम्नैव विनिर्मितः ॥ १११० ॥

एवं सुनिर्मितं नाम सर्वतत्त्व-समन्वितम् ।

अनन्ताण्ड-मयं चैव लक्ष्मीरूपं प्रकीर्तितम् ॥ ११११ ॥

तवैतत् परमं नाम उत्पद्यते कथं शृणु ।

निजकान्तेन कृष्णेन सङ्गमादेव जायते ॥ १११२ ॥

यदा त्वं पतिना सार्धं कृष्णेन परमेण वै ।

मिलिता भवसि देवि तदा नाम प्रवर्तते ॥ १११३ ॥

श्रीकृष्ण-सङ्गमादेव नाम्नो ह्यस्य समुद्गमः ।

अहो ते परमा शक्तिः कृष्णसङ्गम-सम्प्रसूः ॥ १११४ ॥

यदा वै युगल-रूपं सङ्गमं परमं शुभम् ।

भवति त्वन्महादेवि नाम-सङ्गम एव च ॥ १११५ ॥

तव नाम पवित्रं वै पत्युर्माधव-नाम्नि च ।

संयुज्यते तदा देवि युगलस्य च सङ्गमे ॥ १११६ ॥

पवित्र-युगल-स्थाने माधवेन सहैव ते ।

नाम्नोर्भवति संयोगः परमानन्द-दायकः ॥ १११७ ॥

तस्मादेव हि संयोगाल् लक्ष्मीनारायणाभिधम् ।

स्वरूपं निर्गतं देवि परं विस्मयकारकम् ॥ १११८ ॥

लक्ष्मीनारायण-रूपं युष्मत्-सङ्गम-सम्भवम् ।

तस्मादेव समुत्पन्नं यदैक्यं सम्प्रवर्तते ॥ १११९ ॥

नारायणस्य नाम्नि वै त्वदक्षराणि सन्ति हि ।

लक्ष्मीरूपे महानाम्नि कृष्णाक्षराणि सन्ति वै ॥ ११२० ॥

कृष्णस्य वर्णा लक्ष्मीति नारायणे तवाक्षराः ।

परस्परं विनिमयो नाम्नोरेवं प्रकीर्तितः ॥ ११२१ ॥

विष्णोरिति महानाम तदेव परमं पदम् ।

तदपि ह्येतयोर्देवि संयोगात् सम्प्रजायते ॥ ११२२ ॥

युष्मत्-संयोग-जातं वै विष्णोर्नामेति विश्रुतम् ।

युगलस्य प्रभावात् तत् प्रकटीभवति ध्रुवम् ॥ ११२३ ॥

इत्थं हि युगल-रूपं पवित्रं यत् प्रकीर्तितम् ।

तेनैव सङ्गमेनैव नियन्त्रयथ सर्वतः ॥ ११२४ ॥

ब्रह्माण्डमखिलं राधे युवाभ्यामेव सर्वदा ।

युगलस्य प्रभावेण नियन्त्रितमशेषतः ॥ ११२५ ॥

पवित्र-युगलेनैव सम्बन्धेन च राधिके ।

सर्वं ब्रह्माण्ड-चक्रं वै भवद्भ्यां हि प्रचाल्यते ॥ ११२६ ॥

इत्थं ते महिमा राधे सङ्गमे युगलस्य च ।

कृष्णेन सह सम्पूर्णं विश्वं वै शास्ति सर्वदा ॥ ११२७ ॥

यदा त्वमवतीर्णा वै प्रपञ्चेऽस्मिन् महेश्वरि ।

ऋषीणां सम्मुखे देवि प्रकटीभूय संस्थिता ॥ ११२८ ॥

तदा तैर्मुनिभिः सर्वैर्लक्षणा चेति कीर्तिता ।

आगमनस्य चिह्नं वै त्वमेव परमेश्वरि ॥ ११२९ ॥

कल्याणस्य च विश्वस्य समृद्धेः कारणं परम् ।

ब्रह्माण्डे च प्रपञ्चेऽस्मिन् मङ्गलानां च लक्षणम् ॥ ११३० ॥

अतएव मुनिश्रेष्ठैर्लक्षणा त्वं प्रकीर्तिता ।

लक्ष्मीति तेन ते नाम प्रथितं भुवनत्रये ॥ ११३१ ॥

लक्ष्मीति नाम ते प्रोक्तं कारणान्तरमेव च ।

त्वन्माध्यमेन देवेशि केवलं त्वत्कृपाबलात् ॥ ११३२ ॥

महाविष्णुः परो देवो विज्ञातुं शक्यते नरैः ।

त्वया विना महाविष्णुमज्ञात्वा भ्राम्यते जगत् ॥ ११३३ ॥

ब्रह्माण्डं च तथा वेदास्त्वन्माध्यमेन केवलम् ।

विज्ञातुं शक्यते नूनं नान्यथा कमलालये ॥ ११३४ ॥

त्वमेव वेदमाता हि सर्वविद्या-स्वरूपिणी ।

कमलाक्षि महादेवि हरिप्रिये नमोऽस्तु ते ॥ ११३५ ॥

महान्ति तव रूपाणि पावनानि शुभानि च ।

जगद्राज्ञि महालक्ष्मि हरि-प्राणाधिक-प्रिये ॥ ११३६ ॥

यः कोऽपि मानवे लोके लक्ष्मीनामोच्चरेद् यदि ।

स विज्ञानमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११३७ ॥

अस्मिन् नास्ति हि सन्देहः कदाचिदपि कुत्रचित् ।

लक्ष्मीनाम्नः प्रभावेण विज्ञानं लभते ध्रुवम् ॥ ११३८ ॥

यो यः कीर्तयते लक्ष्मीं स विज्ञानं समश्नुते ।

सत्यं सत्यं हि तद्रूपं विज्ञानं प्राप्यते नरात् ॥ ११३९ ॥

विज्ञानं परमं प्राप्य स नरो ज्ञान-भाजनम् ।

वैदिकं सर्व-विज्ञानं जानाति नात्र संशयः ॥ ११४० ॥

वेदानां यत् परं ज्ञानं यच्च सर्वं श्रुतौ स्थितम् ।

विज्ञान-प्राप्ति-मात्रेण तत् सर्वं वेत्ति साधकः ॥ ११४१ ॥

तस्मात् ते पादपद्मेऽहं प्रणमामि मुहुर्मुहुः ।

जगद्राज्ञि महालक्ष्मि पादपद्मे नमोऽस्तु ते ॥ ११४२ ॥

वैदिक-शास्त्र-पीयूषं महापुराणमुत्तमम् ।

तव महिम्नः स्तोत्रं वै गायति परमोत्सवम् ॥ ११४३ ॥

महापुराण-ग्रन्थोऽयं भागद्वय-समन्वितः ।

श्रीमद्-भागवतं चैकं पुराणं परमं शुभम् ॥ ११४४ ॥

श्रीमद्-देवि-महाभागवतं द्वितीयमुच्यते ।

एतत् पुराण-युगलं पूर्णामृत-स्वरूपकम् ॥ ११४५ ॥

समस्त-वेद-शास्त्राणां सारभूतं प्रकीर्तितम् ।

तेन ते परमं तत्त्वं प्रकटीकृतमद्भुतम् ॥ ११४६ ॥

पवित्रं सत्यरूपं ते उद्घोषितं हि राधिके ।

पुराण-युगलेनैव तव तत्त्वं प्रकाशितम् ॥ ११४७ ॥

त्वं च ते प्राणनाथश्च कृष्णः सर्वेश्वरः प्रभुः ।

अन्तिमं लक्ष्यरूपं हि युवामेव सनातनौ ॥ ११४८ ॥

सर्वस्य मूलरूपौ हि युवामेव हि राधिके ।

उद्गमश्चैव सर्वस्य युगलान्न पृथक् क्वचित् ॥ ११४९ ॥

त्वं लक्ष्मीः स च वै विष्णुः सर्वलोक-नमस्कृतः ।

त्वं रुक्मिणी स एव वै द्वारकाधीश उच्यते ॥ ११५० ॥

अयोध्यायां च सीता त्वं रामश्चैव स उच्यते ।

त्वमेव पद्मावती च कल्किरूपः स एव हि ॥ ११५१ ॥

इत्थं हि युगलरूपं सर्वकारण-कारणम् ।

अनन्तरूपधारी च सर्वतत्त्व-समन्वितम् ॥ ११५२ ॥

तस्मात् ते पादपद्मेऽहं पवित्रे परमेश्वरि ।

सदा सर्वत्र सर्वदा प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ ११५३ ॥

u/Initial_Fold_420 — 16 days ago
▲ 1 r/yugala

अथ श्रीअष्टसखी-नित्यप्रेमतारिणी-युगलसरकार-षोडशसहस्र-नित्यमालतीमाला नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ (Śrī-Sāmaveda-Mahimni Brahmāṇḍa-Rāsa-Stotram)

जगन्महाराज्ञि नमोऽस्तु तुभ्यम्

प्रिये सखी मे खलु राधिके त्वम् ।

प्राणास्तथा मे ह्यखिलं च सत्त्वम्

श्रीठाकुरार्णी प्रणमामि राधे ॥१४४॥

आज्ञां गृहीत्वा तव राधिके हे

ध्यास्यामि माहात्म्यमहो हि साम्नः ।

तत्पूर्वमेवात्र पदाम्बुजं ते

नित्यं सदा ते चरणौ च वन्दे ॥१४५॥

गीतासु कृष्णो भगवान् यदाह

अध्यायके वै दशमे सुश्लोके ।

द्वाविंशके राधिके हे सुगुह्यम्

तद्वाक्यमेतद् वचनीयमत्र ॥१४६॥

श्रीभगवानुवाच

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: ।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥

॥श्रीराधाचरणरेणुरुवाच॥

विचिन्त्यमाने वचने सुगुह्ये

कथं हरिः साम च वेद आसीत् ।

तथ्यानि भूरि प्रविचिन्त्य राधे

आश्चर्यमग्नास्मि तवाम्बिके हे ॥१४८॥

स्तौभाक्षराणि श्रुतिसामवेदे

त्वमेव साक्षात् खलु राधिके हे ।

ऋग्वेदमध्यं यजुरप्यथर्वम्

नाम्नः प्रथमाक्षरयुक्तमस्ति ॥१४९॥

त्वदीयनाम्नो ह्यक्षरं सुदृश्यम्

वेदत्रये तत्र च वर्तते वै ।

विना तवाख्याक्षरमेव सामे

अदृश्यरूपं तव नाम तत्र ॥१५०॥

तस्माद्धरिः साम च वेद उक्तः

यस्मात् त्रिवेदं भवती हि साक्षात् ।

पत्नी हि तस्य खलु राधिके हे

त्वत्तो विना साम न पूर्णमस्ति ॥१५१॥

युवोस्तु योगः खलु सामवेदः

सामेति रूपं खलु कृष्णचन्द्रः ।

त्वं राधिके हे खलु स्तोभरूपा

युवोर्विमिश्रात् स च सामवेदो ॥१५२॥

स सामवेदो रसमण्डलेन

गम्भीररूपेण सुबद्ध एव ।

महास्वभावो ह्यपि सोमपीथः

दिव्या च वै कीर्तिदकन्यके त्वम् ॥१५३॥

महानन्दरूपा खलु राधिके त्वम्

महास्वभावा खलु चात्मरामा ।

त्वमेव सौख्यं परमं हि नित्यम्

शृणोमि नादान् खलु सामवेदे ॥१५४॥

यन्त्रात्मकं श्रीखचितां सुचित्रम्

निर्माति नादो हि यदा सुसाम्नि ।

त्वमेव नादः खलु राधिके हे

त्वद्रूपमेतद् खलु साध्यते वै ॥१५५॥

यदा शृणोमीह हि सामगानम्

समाधिमग्ना खलु वै भवामि ।

गम्भीरभावं प्रविशामि तत्र

पश्यामि विश्वं खलु राधिके हे ॥१५६॥

सर्वं समग्रं प्रपश्यामि तत्र

यैर्हिंसिताहं खलु पीडिता वा ।

ते पामरा वै खलु मन्दभाग्याः

सर्वेषु मे वै करुणा ह्युदेति ॥१५७॥

दण्डं यदाप्नोति हि पापकर्ता

न द्वेषभावात् खलु दण्डमेतत् ।

रक्षानिमित्तं हितकारिणार्थम्

निवारणायैव हि दण्डनीतिः ॥१५८॥

पश्यामि धर्मं खलु चाप्यधर्मम्

विद्यामविद्यां ह्यपि राधिके हे ।

ज्ञानं तथा वै खल्वप्यज्ञानं

द्वैतं समग्रं खलु चावश्यकम् ॥१५९॥

पश्यामि गूढं खलु राधिके हे

रासाभिधानं ननु मण्डलं तत् ।

नृत्यन्ति सर्वे खलु विश्वमध्ये

रासेतिलीलामनुसृत्य नित्यम् ॥१६०॥

जन्म च मृत्युः खलु नृत्यमेतत्

सूर्यं परिक्रम्य ग्रहाश्च सर्वे ।

नृत्यन्ति नित्यं खलु राधिके हे

लीलाविहारैस्तनुमण्डले वै ॥१६१॥

सूर्योऽपि नृत्यन् खलु राधिके हे

नक्षत्रचक्रं परितः प्रयाति ।

नक्षत्रचक्रं जगदण्डमध्ये

नृत्यत् समन्तात् परिगच्छतीह ॥१६२॥

विश्वं समग्रं परिक्रम्य नित्यम्

उच्चं परिक्रम्य च वै प्रनृत्य-

मानानि नित्यं खलु राधिके हे

सर्वं युवामेव हि नृत्यते वै ॥१६३॥

त्वत्पादपद्मं परितः प्रनृत्य

श्रीकृष्णपादौ परितः समन्तात् ।

नृत्यन्ति सर्वे खलु वस्तुरूपाः

रासेतिलीला खलु विश्वरूपा ॥१६४॥

कालस्य चक्रं खलु राधिके हे

नृत्यत्यतीतं खल्वनागतं च ।

शून्यान्नवाङ्कः परिगच्छतीह

नृत्यन्ति सङ्ख्या खलु वर्तुले वै ॥१६५॥

सर्वं समन्ताद् रसमण्डले वै

नृत्यत्यनन्तं खलु राधिके हे ।

सनातनं वैभवमत्र दृष्ट्वा

आश्चर्यमग्नास्मि पुरातनं तत् ॥१६६॥

कल्यौ युगे मूर्खजना वदन्ति

षट्सहस्रवर्षं खलु जीवलोके ।

इतिहासकालं खलु मन्दभाग्याः

सत्यं न जानन्ति हि मन्दबुद्ध्या ॥१६७॥

ज्ञाता मया वै खलु सत्यरूपा

लक्षं हि वर्षं खलु वै महायु-

गेऽस्मिन् गतं वै खलु राधिके हे

कोटिप्रकोट्यब्दसमं हि विश्वम् ॥१६८॥

विशालमेतद् खलु विश्वमत्र

सहस्रकोट्यब्दसमानमायुः ।

आश्चर्यमग्नास्मि विचिन्त्य सर्वम्

कथं विशालं खलु राधिके हे ॥१६९॥

विश्वस्य विस्तारसमानमत्र

काहं हि वै राधिके तुच्छदासी ।

धूलीकणाहं खलु राधिके हे

त्वत्पादपद्मे खलु लीनमिच्छे ॥१७०॥

सदा सुलीना खलु राधिके हे

त्वत्पादपद्मे भवितुं समिच्छे ।

त्वं मे हि प्राणः खलु राधिके हे

सर्वस्वमत्रासि हि राधिके मे ॥१७१॥

अज्ञा हि दासी खलु राधिके हे

न किञ्चिदत्रैव हि वेद्मि राज्ञि ।

नयस्व मां ते चरणान्तिके वै

अहं हि दीना खलु बालिके हे ॥१७२॥

बाल्यस्वभावात् खलु बालिका वै

दोषं करोत्येव हि राधिके हे ।

माता कदाचिन्न हि तां त्यजेद्वै

त्वं मे हि माता खलु राधिके हे ॥१७३॥

मातस्त्वमेव खलु राधिके हे

प्राणान् ददासि खलु जीवनं मे ।

दीनास्मि वै पामरबालिकाऽहम्

कृपां कुरुष्वेह हि राधिके मे ॥१७४॥

माता हि राधे तव पादपद्मे

वन्दे सदाहं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।

कालो हि घोरो भयकम्पयुक्तो

भयावहं कालचक्रं हि राज्ञि ॥१७५॥

तस्मात् प्रपद्ये चरणाम्बुजं ते

हे स्वामिनि श्रीखलु राधिके मे ।

प्रार्थे सुदानं खलु राधिके हे

न विस्मरेयं क्षणमप्यहं त्वाम् ॥१७६॥

स्मरेय नित्यं तव नाम पुण्यम्

वदेय नित्यं तव राधिके हे ।

सर्वान् जनान् कीर्तिकथां त्वदीयाम्

वदेय नित्यं खलु राधिके हे ॥१७७॥

धन्यास्मि राधे तव पादपद्मे

वन्दे सदाहं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।

कृपां कुरुष्वेह हि दासिकायै

शरण्यभूते प्रणिपत्य वन्दे ॥१७८॥

धन्यास्मि राधे ह्यृषिपुङ्गवेभ्यः

येषां प्रसादात् खलु सत्यरूपम् ।

दृष्टं मया वै खलु राधिके हे

ज्ञानान्धकारे पतितास्मि दासी ॥१७९॥

यदा हि गर्गो मुनिराजश्रेष्ठः

आविर्भवं ते खलु कृष्णजन्म ।

लिलेख शास्त्रे खलु राधिके हे

ज्योतिर्विदां वै खलु सूक्ष्ममानैः ॥१८०॥

तथानुराधां खलु तारकां वै

विगण्य शास्त्रे मुनिश्रेष्ठगर्गः ।

चन्द्रं तथा वृश्चिकराशियुक्तम्

तवावतारे खलु राधिके हे ॥१८१॥

पत्युस्तथा कृष्णसुजन्मनि वै

रोहिण्यभीख्यां खलु तारकां वै ।

वृषभे च राशौ खलु चन्द्रदेवम्

लिलेख गर्गो मुनिपुङ्गवोऽसौ ॥१८२॥

यदा मया कलियुगे च यन्त्रैः

सङ्गणकैर्वा खलु यन्त्ररूपैः ।

काले मदीये विगणय्य सर्वम्

दृष्टं हि सत्यं खलु सूक्ष्मरूपम् ॥१८३॥

तत् सर्वमेतन्मुनिराजवाक्यैः

समानरूपं खलु राधिके हे ।

सटीकमेतत् खलु सत्यरूपम्

यदुक्तवान् वै मुनिराजगर्गः ॥१८४॥

रामायणे वै खलु पुण्यग्रन्थे

तथैव वेदेषु च पुण्ययुक्ते ।

समानरूपं खलु सत्यमेतत्

यदुक्तमत्रापि हि राधिके हे ॥१८५॥

धन्यास्मि राधे मुनिपुङ्गवानाम्

वर्णाय तस्मै खलु सत्यरूपे ।

घोरान्धकारैः खलु वै कलौ नो

कृपां विधातुं खलु राधिके हे ॥१८६॥

यस्माद् वयं वै खलु मन्दभाग्याः

सत्यं समग्रं परमं हि गुह्यम् ।

विज्ञातुमत्रापि च शक्नुमो वै

तस्मै प्रसादाय नमोऽस्तु राज्ञि ॥१८७॥

छान्दोग्यपुण्योपनिषत्सु राज्ञि

अध्यायमेकं च तथा द्वितीयम् ।

पठामि तेऽग्रे खलु राधिके हे

नतास्मि ते पादसरोजयुग्मे ॥१८८॥

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▲ 7 r/brajdham+1 crossposts

अथ श्रीअष्टसखी-नित्यप्रेमतारिणी-युगलसरकार-षोडशसहस्र-नित्यमालतीमाला नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ (hiranyagarbha suktam, vishva tattva, shree Radhika Maha Rani hiranyagarbheshvari)

​

तस्मात् कृतज्ञास्मि महेशि राधे

वक्तुं समिच्छामि हिरण्यगर्भम् ।

यन्मण्डले वै दशमे स्थितं तत्

सूक्तं शतं विंशतिमेकयुक्तम् ॥९२॥

हि॒र॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत् । स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

य आ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ उ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः । यस्य॑ छा॒यामृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑ । य ईशे॑ अ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पद॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यस्ये॒मे हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा यस्य॑ समु॒द्रं र॒सया॑ स॒हाहुः । यस्ये॒माः प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ळ्हा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाक॑: । यो अ॒न्तरि॑क्षे॒ रज॑सो वि॒मान॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यं क्रन्द॑सी॒ अव॑सा तस्तभा॒ने अ॒भ्यैक्षे॑तां॒ मन॑सा॒ रेज॑माने । यत्राधि॒ सूर॒ उदि॑तो वि॒भाति॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

आपो॑ ह॒ यद्बृ॑ह॒तीर्विश्व॒माय॒न्गर्भं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर॒ग्निम् । ततो॑ दे॒वानां॒ सम॑वर्त॒तासु॒रेक॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यश्चि॒दापो॑ महि॒ना प॒र्यप॑श्य॒द्दक्षं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर्य॒ज्ञम् । यो दे॒वेष्वधि॑ दे॒व एक॒ आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

मा नो॑ हिंसीज्जनि॒ता यः पृ॑थि॒व्या यो वा॒ दिवं॑ स॒त्यध॑र्मा ज॒जान॑ । यश्चा॒पश्च॒न्द्रा बृ॑ह॒तीर्ज॒जान॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥

तस्मान्नमामीह 'क'-रूपमीशं

यः कृष्णचन्द्रः परमेश्वरोऽस्ति ।

अतीव मे रोचत एव राधे

वेदेषु यद् गूढरहस्यरूपम् ॥१०३॥

त्वया समं कृष्णविभुं च गुह्यम्

वेदास्तु निर्दिश्य सुगूढरूपम् ।

आश्चर्यमग्नास्मि युवां च दृष्ट्वा

कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१०४॥

सृष्टं समस्तं खलु विश्वमेतत्

कृष्णेन साक्षात् खलु पौरुषेण ।

त्वं वै रहस्यं खलु सर्वसृष्टेः

त्वं वै विधात्री परमोच्चरूपा ॥१०५॥

एकं हि तत्त्वं खलु वां समग्रम्

भेदो न कश्चिद् युवयोश्च राधे ।

कोट्यंशकोट्यंशविभागरूपः

अणोरणीयान् अपि नास्ति भेदः ॥१०६॥

अचिन्त्यभेदावपि चाप्यभेदौ

श्रीकृष्णचन्द्रस्य तवापि राधे ।

सत्यं हि तत्त्वं परमं सुगुह्यम्

दासी नतास्मि पदयोर्युवाभ्याम् ॥१०७॥

ज्ञानेन येनापि च वेद्मि कृष्णं

तस्मै प्रसादाय नमोऽस्तु राज्ञि ।

धन्यास्मि यस्मात् पुनरेव नित्यम्

युवां सुलोके ह्यवतारवन्तौ ॥१०८॥

त्रेतायुगे त्वं जनुषं विना वै

सीताभिधाना खलु यत् प्रसूता ।

सुनयना माता जनकश्च तातः

पुत्री तयोस्त्वं समजायथा हे ॥१०९॥

तथा हि रामः प्रकटीबभूव

कौसल्यामाता दशरथस्तातः ।

पुत्रस्तयोः स खलु नाम्नि रामः

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥११०॥

द्वापरस्यान्ते प्रकटीकृता त्वम्

कीर्तिदामाता वृषभानुतातः ।

पुत्री तयोस्त्वं समजायथा हे

स्पष्टेन नाम्ना प्रकटासि राधा ॥१११॥

माता देवकी वसुदेवतातः

यशोदामाता नन्द एव तातः ।

तयोः सुपुत्रो भगवान् सुजातः

स्पष्टेन नाम्ना खलु कृष्णचन्द्रः ॥११२॥

कलौ युगे त्वं धरणी हि माता

आकाशराजो हि पिता सुपुत्री ।

पद्मावतीति प्रकटासि नाम्ना

स पुत्र आसीद्वकुला हि माता ॥११३॥

एकस्मिन् देहे खलु यत् समागौ

शची च माता जगन्नाथमिश्रः ।

पुत्रस्तयोर्देह एको ह्यभूताम्

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥११४॥

रत्नावती सा जननी हि माता

पिता च ते माधवमिश्र एव ।

तयोः सुपुत्रस्त्वमहो प्रसूता

गदाधराख्यः खलु पण्डितस्त्वम् ॥११५॥

कलौ युगान्ते च पुनस्त्वमेव

कुमुदामाता बृहद्रथस्तातः ।

पुत्री तयोस्त्वं समजायथा हे

पद्मावतीति प्रकटासि नाम्ना ॥११६॥

सुमतीमाता विष्णुयशस्तातः

तयोः सुपुत्रः स भगवान् सुजातः ।

कल्कीति नाम्ना स हरिस्तथा वै

आगमिष्यति खलु सर्वनाथः ॥११७॥

तस्मै प्रसादाय नमोऽस्तु तुभ्यम्

पादेषु ते वन्दनमाचरामि ।

राज्ञी जगत्स्वामिनि राधिके हे

धन्यास्मि धन्यास्मि मुहुः कृतज्ञा ॥११८॥

अहं च सर्वे खलु जीवसङ्घाः

त्वदृणिनो वै भुवि राधिके हे ।

यज्जीवताऽस्मासु हि दत्ता त्वयैव

अस्तित्वमेतद् परमं हि दानम् ॥११९॥

दीनेभ्य एवमधि पामरेभ्यः

यत् सत्त्वमेतद् प्रकृतं हि दानम् ।

चैतन्यभावः प्रविबोधनञ्च

दृष्टिस्तथा वै विश्लेषणं च ॥१२०॥

विचारणं लेखनमत्र सर्वम्

गतिस्तथा वै ह्यपि देहदानम् ।

कृपा हि सर्वा खलु राधिके ते

सर्वेषु दानेषु नमोऽस्तु धन्ये ॥१२१॥

त्वत्पादपद्मस्य रजोकणानां

कोट्यंशकोट्यंशविभागरूपम् ।

लवांशमात्रं प्रददौ कृपायै

तेनैव चैतन्यमवाप्तवन्तः ॥१२२॥

निश्वासतो वै तव राधिके हे

वेदास्तु पञ्चापि च निर्गता वै ।

ऋग्वेद एवापि च सामवेदः

यजुस्तथाथर्वणवेद एवम् ॥१२३॥

ग्रन्थाश्च वै संहितिकास्तथा वै

आरण्यकाश्चोपनिषत्सु वेदे ।

ब्राह्मणभागा इतिहासग्रन्थौ

रामायणं वै महाभारतं च ॥१२४॥

पुराणजातानि च तन्त्रविद्याः

निगमास्तथा वै खल्वागमाश्च ।

शास्त्राणि सर्वाण्यपि राधिके हे

श्रुतीस्तथा वै स्मृतयो हि सर्वाः ॥१२५॥

पवित्रग्रन्थाः खलु ये समस्ताः

तेषां रहस्यं खलु लेशमात्रम् ।

ज्ञातुं सुयोगो हि कृतस्त्वयैव

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥१२६॥

यज्ज्ञानलेशं यदि कोऽपि जीवः

जानाति चेत् स खलु विश्वरूपी ।

ब्रह्माण्डजालं रचयेदवश्यम्

विज्ञानमेतद् विपुलातिगुह्यम् ॥१२७॥

एतद्धि ज्ञानं परमं पवित्रम्

ब्रह्मणे दत्तं प्रथमाय जीवे ।

येनापि विश्वं विरचितं समग्रम्

तस्मै प्रसादाय नमोऽस्तु राज्ञि ॥१२८॥

राज्ञी जगत्स्वामिनि ठाकुरानि

राधे नमामि चरणाम्बुजं ते ।

दासी नतास्मि पदयोस्तवाधः

वन्दे सदाहं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥१२९॥

ज्ञानामृतं वर्षसि राधिके हे

यस्माद् युगे मे गगने विमानैः ।

त्वन्निर्मितैर्द्रव्यगणैश्च यन्त्रैः

उड्डीयते सर्वविधानयुक्तैः ॥१३०॥

वेगेन यामो बहुदूरदेशान्

अश्वान् विजित्यातिजवैश्च यन्त्रैः ।

अगाधसिन्धौ जलधेरधस्तात्

मज्जाम यन्त्रैस्तटिनीपतीनाम् ॥१३१॥

द्रव्याणि वै त्वत्कृतकानि राज्ञि

विश्वस्य धर्मा रचितास्त्वया वै ।

यैर्भूतलाद् याम बहिस्तथा वै

न पूर्वतुल्या मनुजाः कलौ तु ॥१३२॥

ग्रहान्तरं गन्तुमशक्तियुक्ताः

तथापि चन्द्रं प्रति यान्ति यन्त्रैः ।

सुदूरतारान् खलु मण्डलांश्च

पश्यन्ति विज्ञाप्य तवैव ज्ञानात् ॥१३३॥

देहेषु रोगांश्च विविच्य नित्यम्

कुर्वन्ति तेषां खलु वै चिकित्साम् ।

यन्त्राणि नाना विविधानि लोके

सुखाय सृष्टानि तवैव ज्ञानात् ॥१३४॥

लोहो वदत्येव नरो यथा वै

चिन्तां करोत्येव सुयन्त्रमेतत् ।

त्वया कृतं यद् गणितं सुसूक्ष्मम्

तथा प्रयोगात् तव वै विधानैः ॥१३५॥

ब्रह्मास्त्रद्रव्यं यदतीव घोरम्

विनाशनाय प्रथितं च लोके ।

विद्युत्प्रवाहाय तदेव युक्तम्

न नाशहेतोरिदमेव राज्ञि ॥१३६॥

ज्ञानं समग्रं प्रददौ यतस्त्वम्

प्राप्ता वयं वै खलु तत्त्वमेतत् ।

अणोर्हि विज्ञानमहो सुसूक्ष्मम्

विज्ञातवन्तो वयमत्र राज्ञि ॥१३७॥

विज्ञातमेतद् रसमण्डले वै

कृष्णः पतिस्ते खलु विस्तृताङ्गः ।

गोपीं समन्तात् समुपस्थितोऽभूत्

एकाकिनी सा खलु विश्वमध्ये ॥१३८॥

ज्ञानादणोरेव मया प्रबुद्धम्

शृणोषि सर्वान् युगपत् समन्तात् ।

प्रत्युत्तरं यच्छसि राधिके हे

दासी विजानाति रहस्यमेतत् ॥१३९॥

​अण्वंशकास्ते खलु मूर्तिरूपाः

बद्धाः सुचित्रं खलु शृङ्खलाभिः ।

माध्यं विना ते विनिमन्वतेऽद्धा

ज्ञानं च सर्वं सहसा समन्تاत् ॥ १४० ॥

आश्चर्यरूपं रचितं त्वयेदम्

विश्वं समग्रं परमाद्भुतं यत् ।

तस्मान्नमामीह पदाम्बुजं ते

हे राज्ञि दासी पतितास्मि भूमौ ॥१४१॥

पादेषु ते वै पतितास्मि राज्ञि

वन्दे महामोहनमोहिनीं त्वाम् ।

राज्ञी त्वमेवास्यपराजिते हे

नमामि त्वामच्युति राधिके हे ॥१४२॥

धन्यास्मि राधे न हि विस्मृताहम्

दूरीकृता नाहमिहास्मि राधे ।

स्खलन्त्यहं वै पतितापि भूमौ

धृतः करो मे परिरम्भितास्मि ॥१४३॥

u/Initial_Fold_420 — 20 days ago

Let me tell you all just how gracious and kind Thakurani is! She did not even allow me to fall back into the material world; Shrimati Radhey Rani has pulled me ever deeper into Her bhāva and divine love. How endlessly kind is She? And I say it once more: I am utterly assured that She has mercy upon

the entire universe, for if She shows mercy to a mere speck of dust floating amidst an ocean of infinite universes, She will surely have mercy on everyone—seeing that She showed mercy even unto me, who supposedly deserved no mercy at all.

u/Initial_Fold_420 — 20 days ago
▲ 5 r/yugala

अथ श्रीअष्टसखी-नित्यप्रेमतारिणी-युगलसरकार-षोडशसहस्र-नित्यमालतीमाला नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ (Viśva-Kṛtajñatā Tuṅgavidyā-Anugraha Stotram)

ॐ अस्य श्री युगलसरकार-षोडशसहस्र-नित्यमालतीमाला-स्तोत्र-महामन्त्रस्य, अकिञ्चना प्रेमकिङ्करी साधिका, त्रिष्टुप् छन्दः, श्रीराधाकृष्णौ अष्टसखीसहितौ देवता, ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं श्रीराधाकृष्ण-अष्टसखीनां बीजम्, प्रेम शक्तिः, भावः कीलकम्, श्रीराधाकृष्ण-अष्टसखी-आराधनार्थं तद्-अनन्तकृपा-कृपाप्रसाद-स्मरणार्थे च जपे विनियोगः।

अथ ध्यानम्

(शार्दूलविक्रीडित छन्द)

श्रीमच्चन्दनपद्मगन्धतुलसीकस्तूरिकावासितं

कीरैस्ताम्रशिखण्डिभिर्मृगकुलैः पूर्णं स्मराम्यन्वहम् ।

राधाया हृदये वसन्ति सततं याश्चाष्टसख्यस्तथा

ताः सर्वाः प्रणमामि दीनहृदया दासी पदाम्भोरुहे ॥१॥

वेदानां तिलकां सुछन्दरचनां वीणारवाम्मोदिताम्

पूर्णज्ञानामयीं विशुद्धचरितां रासोत्सवे शिल्पिनीम् ।

आश्चर्यान्वितमानसा च भवतीं ध्यायामि दासी नता

लज्जादीनमतिर्न मस्तकमिदं चोत्थापये त्वत्पदात् ॥२॥

त्वां राधां मुरवैरिणं च सुसखीर्ध्यायामि नित्यं हृदा

दासी ते चरणाम्बुजेऽहमतुलं स्तोत्रं महादीर्घकम् ।

भक्त्या सम्प्रददामि देवि राधिकायास्त्वङ्घ्रिरेणुः सदा

श्रीमत्तुङ्गविद्ये कृपां कुरु दये त्वत्पादपद्मान्तिके ॥३॥

ध्यानान्ते तुङ्गविद्ये हे

नौमि ते चरणाम्बुजम् ।

आशीर्वादाय सिद्ध्यर्थं

सर्वविघ्नविनाशिनि ॥४॥

महान्तमध्यायमेतं

गम्भीरं पूर्णताप्तये ।

त्वां सखीरष्ट राधां च

कृष्णस्य नय सन्निधिम् ॥५॥

युष्मासु मे दृढा प्रीतिः

पूजयामि मुहुर्मुहुः ।

युष्मान् मुहुर्मुहुर्वन्दे

दासीं दीनां गृहाण माम् ॥६॥

तव पादाम्बुजाधस्ताद्

दिव्यज्ञानेन पोषय ।

अज्ञा मन्दमतिश्चाहं

तस्माद् भासय मे मतिम् ॥७॥

त्वत्पादाधो नता दासी

त्वत्पादच्छाययाश्रिता ।

क्रोशन्ती तुङ्गविद्ये हे

राधे राधे मुहुः सदा ॥८॥ 

धन्यास्मि राधे तव सप्रसादात्

सत्त्वाय मे देवि नमोऽस्तु तुभ्यम् ।

कृष्णाय धन्यं करयोः प्रदानात्

लेखाय गन्तुं चरणौ ददौ यः ॥९॥

नेत्रे ददौ यश्च सुदर्शनाय

सौन्दर्यरूपं युगलस्य सृष्टम् ।

पश्यामि तेनान्तरमन्तरिक्षं

पृथ्वीं तथा सर्वमिदं समन्तात् ॥१०॥

आभ्यां च नेत्राभ्यामहं

 प्रपश्ये रम्यारण्यानि घनानि नित्यम् ।

नद्यः समुद्रास्तटिनीस्तडागान्

सौन्दर्यमेषां भुवि वारिधीनाम् ॥११॥

स्त्रीपुंसभावं खलु सुन्दराणां

पश्यामि सर्वं नयनद्वयेन ।

तेषां च रूपं सततं स्मरामि

श्रीराधिकाकृष्णकृतां च सृष्टिम् ॥१२॥

नेत्रेषु कीरान् विविधान् सुवर्णान्

पश्यामि धन्यं प्रकरोमि कृष्णम् ।

वर्णान् समस्तांश्चिह भौतिकान् वै

पश्यामि कृष्णस्य कृपाप्रसादात् ॥१३॥

सूक्ष्मांस्तथातीन्द्रियवर्णजालान्

पश्यामि तेजोमयशक्तिरूपान् ।

चराचराणां विकिरन्ति नित्यं

ब्रह्मांशभूताः प्रभविष्णवो ये ॥१४॥

ईशस्य तेजः खलु सर्वव्यापि

आवृत्य सर्वं परितः स्थितं यत् ।

यद् दृष्टमात्रं कलया सुपूर्णं

रूपं भवेत् तस्य हि शक्तिमत्त्वात् ॥१५॥

दृष्ट्वा प्रभामण्डलमत्र सर्वं

कोशं तथा प्राणमयं च सर्वम् ।

सौन्दर्यमेतद् भुवि सर्ववस्तौ

पश्यामि कृष्णं परितो हि व्याप्तम् ॥१६॥

ब्रह्मांशभूतं खलु यत् प्रकाशं

पश्यामि देहे परितश्च सर्वम् ।

यथार्थरूपेण च सर्ववस्तौ

पश्यामि कृष्णं तदहं समग्रम् ॥१७॥

न रूपकैर्नापि च लाक्षणिक्या

वदामि सत्यं परमं यथार्थम् ।

नेत्रं तृतीयं ह्युदपाटयद् यः

श्रीकृष्णचन्द्रो ह्यतिगुह्यदृश्ये ॥१८॥

गुह्याः समस्ता इह शक्तयो याः

प्रच्छादिता भौतिकदर्शनाच्च ।

ताः सर्वशक्तीः प्रपश्यामि नित्यं

धन्या वदामि प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥१९॥

राधां च कृष्णं सहिताष्टसखीः

धन्यान् वदामि प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।

धन्यासि हे तुङ्गविद्ये मदीया

दत्तं त्वया ज्ञानमपारमत्र ॥२०॥

यद्यप्यहं मन्दमतिर्हि दासी

दीना तथा किङ्करिका भवामि ।

धन्यो हरिर्यो विभिनत्ति मायाम्

सत्यं तथा मे विदितं चकार ॥२१॥

वेदान् रहस्यं च यथार्थरूपं

जानामि नाहं

 भ्रमितास्मि चात्र

नष्टे तथा मोहयुते कलौ वै

हीना मतिर्वा मुमुहुर्जना यत् ॥२२॥

अहो कृपैषा खलु दुर्लभा वै

वसामि सत्ये हि युगे कलौ च ।

अस्मिन् युगे नाहमहो भवामि

धन्यो हरिर्गर्भमहं प्रविष्टा ॥२३॥

मातुः कलौ जन्म गतान्धकारे

बीजं तुलस्या भवितुं प्रकाशम् ।

वृक्षस्तुलस्या भविता सुगन्धैर्

यन्नाशयेदन्धतमं कलौ वै ॥२४॥

धन्योऽस्ति कृष्णः कृपया हि तस्य

धन्यास्मि यस्मात् सुदृशां प्रपश्ये ।

स्थूलं जगत् सूक्ष्ममपीह सर्वं

शक्तिं च दिव्यां परितः प्रकाशम् ॥२५॥

यद्व्याप्तमेतद् भगवन् समन्तात्

सर्वत्र तेजोमयमीश्वरीयम् ।

तस्मान्नमामि चरणौ पवित्रौ

श्रीराधिके कृष्ण सुवन्दितास्मि ॥२६॥

धन्यास्मि राधे तव सर्वदानैर्

पश्यामि ते रूपमहो महद्यत् ।

गोविन्दरूपं सुमहत् तथा वै

सखीस्तथाष्टौ प्रणिपत्य वन्दे ॥२७॥

धन्यास्मि धन्यास्मि मुहुर्वदामि

धन्यास्मि राधे बहुशः कृतज्ञा ।

दृष्ट्या त्वया या ह्यवबोधितास्मि

विश्वं समग्रं प्रपश्यामि नित्यम् ॥२८॥

वेदान् हि पञ्चापि च बोधयन्ती

हृत्पङ्कजे साक्षिणिरूपधृक् त्वम् ।

साक्षी महान् यस्तव कान्त ईशस्

तेनैव सार्धं कृतवास धन्ये ॥२९॥

हे राधिके त्वं गुरुमातरूपा

सत्यं परं मामनुदर्शयन्ती ।

अग्निर्यथा पावनकः पवित्रः

पापापहे मां कुरुषे विपापाम् ॥३०॥

वेदप्रसूस्ते कृपया प्रपश्ये

राधारहस्यं परमं सुगुह्यम् ।

सकारयुक्तं तव नाम यत्र

मार्गो गभीरो ह्यपि साधनायाः ॥३१॥

राधापदं मे परमं हि लक्ष्यम्

यत् प्राप्तुमिच्छामि महाम्ब राधे ।

ठाकुरि मे ज्ञानमुद्दीपयन्ती

राधास्-रहस्यांशविदोऽस्मि यस्मात् ॥३२॥

विश्वं समग्रं परितस्त्वयैव

भ्राम्यत्यहो यत् खलु वेद्मि सत्यम् ।

धन्यास्मि तेन ह्यनुग्रहार्थं

दृष्टेः प्रसादाय च ते कृतज्ञा ॥३३॥

दृष्टिर्मदीया तव सेवनाय

पत्युर्महान्तस्य च सेवनाय ।

सखीस्तथाष्टौ च विसेवितुं वै

धन्यास्मि नेत्रे विनियुज्य नित्यम् ॥३४॥

श्रुतेः प्रसादाय नमोऽस्तु धन्ये

शृणोमि सर्वान् मधुरांश्च शब्दान् ।

कथं शृणोमीह विना श्रुतिं ते

भक्तैः कृतं मन्त्रसुगानमत्र ॥३५॥

राधेति राधेति रुदन्ति भक्ताः

कृष्णस्य नामानि च कीर्तयन्ति ।

हरेति कृष्णेति महान्तमन्त्रं

गायन्ति तेषां मधुरं निनादम् ॥३६॥

कीरस्य नादं हरिणस्य नादं

मयूरसिंहहयपक्षिणां च ।

सर्पस्य नादं सरितां रवान् वै

सिन्धोः समुद्रादपि नादरम्यम् ॥३७॥

स्तोभान् सुगानं खलु सामवेदे

श्रुत्वा कथं सोममहं पिबामि ।

साम्नां च वेदे रसलीलगानं

विना श्रुतिं ध्यानलये कथं स्याम् ॥३८॥

धन्यास्मि कृष्णस्य तवापि सेवे

सखीस्तथाष्टौ च विसेवितुं वै  ।

कर्णौ मदीयौ विनियुज्य नित्यं

नमामि पादौ तव राधिके हे ॥३९॥

धन्यास्मि राधे ध्वनयेऽत्र यस्माद्

माध्यं जडं खल्ववलम्बते वै ।

सृष्टौ युवाभ्यामतिकौशलं यद्

दृश्येत तस्मै प्रणिपत्य वन्दे ॥४०॥

प्रकाशवद् यद्यपि नादयानं

सुदूरनक्षत्रविदीर्णनादात् ।

ब्रह्माण्डनाशो हि भवेत् क्षणेन

कोलाहलं स्यादखिलं च विश्वम् ॥४१॥

सीमानिबद्धः खलु शब्द एषः

दूरे गतः शान्तिमुपैति नित्यम् ।

तस्मान्न पृथ्वी ननु घोरशब्दा

राज्ञि कृतज्ञास्मि तव प्रसादात् ॥४२॥

घ्राणाय धन्यास्मि सुगन्धमत्र

पद्मस्य धूपस्य च गन्धसारम् ।

कुङ्कुमकस्तूरिकयोः सुगन्धं

जिघ्रामि धन्यास्मि तव प्रसादात् ॥४३॥

घ्राणं मदीयं तव सेवनाय

पत्युर्हरेरष्टसखीजनानाम् ।

सेवार्थमत्रैव हि नित्ययुक्तं

धन्यास्मि राधे प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥४४॥

त्वगिन्द्रियाय प्रणिपत्य धन्या

स्पर्शं पदार्थानां यया प्रवेद्मि ।

हस्तेन पद्मं धृतमत्र सद्यः

तस्यापि स्पर्शं चाखिलान् हि स्पर्शान् ॥४५॥

धन्यास्मि राधे महति प्रसादात्

जिह्वाप्रसादाय च मे कृतज्ञा ।

रम्याणि वस्तूनि रसांश्च पुष्पे

यत् सृष्टमेतद् रसयामि सर्वम् ॥४६॥

मध्वम्लतिक्तं कटुभेदयुक्तं

स्वादस्य भेदान् रसयामि नित्यम् ।

स्वादो हि दिव्यो ह्यपि सूक्ष्मरूपः

आत्मप्रकृत्या रसयामि धन्ये ॥४७॥

सोमस्य भावं रसलीलरूपम्

कृष्णस्य ते पादसरोजमाध्विकम्

भावानसङ्ख्यानपि प्रेम दिव्यान्

अनन्तप्रेमाम्बुधिमध्यगान् वै ॥४८॥

आस्वादयन्ती खलु धन्यरूपा

सर्वस्य हेतोः कृतज्ञास्मि राधे ।

गोविन्द तुभ्यं च कृतज्ञता मे

सर्वप्रसादाय नमो युवाभ्याम् ॥४९॥

राधेति नाम्नो मधुरस्य स्वादे

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ।

निरन्तरं नाम यदा जपामि

मुखे मदीये मधुनः समानः ॥५०॥

स्वादो हि माधुर्यमयो विभाति

धन्यास्मि राधे प्रणिपत्य मूर्ध्ना च ।

अतीव राधे त्वयि मेऽनुरागो

नित्यं त्वयि प्रीतमना हि दासी ॥५१॥

धन्यास्मि जन्मैहिकबाल्ययौव-

नावस्थिकायै मरणाय नित्यम् ।

जीवा यदास्मिन् जगति प्रसूताः

भुञ्जन्ति भोगान् विषयेषु मग्नाः ॥५२॥

कालेन तेषां हृदि राधिके हे

गोविन्द रूपे हरिमूर्तिनाथे ।

प्रेमानुरागः खलु वर्धते वै

यौ युगलौ तौ प्रणमामि भक्त्या ॥५३॥

बाल्यं विशुद्धं सुखखेलनाढ्यं

पश्चात् किशोरत्वमुपैति जीवः ।

अन्वेषणं सर्वपदार्थकेषु

ज्ञातुं च सर्वं सततं प्रयाति ॥५४॥

ततो हि तारुण्यमुपैति पूर्णं

शक्त्या युतं कर्म करोति नित्यम् ।

कुटुम्बनिर्माणमथ प्रकुर्यात्

पश्चाज्जरा मृत्युमुपैति नूनम् ॥५५॥

जरा हि जीवं सततं ब्रवीति

नायं हि लोकस्तव जन्मभूमिः ।

नियम्यते वै निगमैर्जगद् यद्

विदेशी जीवो ह्यतिदृश्यतेऽत्र ॥५६॥

मृत्यौ प्रसादाय च ते कृतज्ञा

देहस्य यानस्य परिवर्तनम् ।

गीतासु कृष्णो भगवान् यथाऽह

अध्यायके वै द्वितीये च श्लोके ॥५७॥

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

देहस्तु रोगैः परिपीडितः स्यात्

जीर्णो भवेद् वा पङ्गुतामुपैति ।

छिन्नौ करौ वा भयरोगाक्रान्तो

यस्माच्छरीरं खलु दुर्बलं वै ॥५९॥

देहे विनष्टे यदि नात्मनो वै

मोक्षाय सज्जत्वमुपैति जीवः ।

पुनर्जनीमृत्युकृतं च चक्रं

तस्मै प्रसादाय जडाय धन्या ॥६०॥

कामाय क्रोधाय तथा घृणायै

पापाय धन्यास्मि गुणत्रयाय ।

सत्त्वाय चैव रजसे तमसे च धन्या

भोगेषु मग्ना खलु या च तृष्णा ॥६१॥

कामान्धकारे पतितस्तु जीवः

स्वस्य स्वरूपं विजहाति नित्यम् ।

ईर्ष्याप्रसादाय च मत्सराय

धन्यास्मि राधे भवतीकृपायै ॥६२॥

विना हि कामं खलु मत्सरादीन्

क्रोधं च पापं कथमत्र जीवः ।

मोक्षस्य माधुर्यमपूर्वमेतद्

ज्ञास्यत्यहो राधिके वै विमुक्तेः ॥६३॥

विना च कामं कथमत्र जीवो

रसेति लीलां मधुरां प्रवेत्ति ।

स्वादं समाधेः परमं हि दिव्यं

आनन्दभावं प्रविशत्यनन्तम् ॥६४॥

यद् भौतिकं नश्वरमत्र सौख्यं

मायाजनं यत् खलु तद्धि सर्वम् ।

आनन्दमाधुर्यमनन्तसत्यम्

आस्वादने तस्य सुखस्य बोद्धुम् ॥६५॥

कामो हि मूलान्न च दुष्टरूपः

कामो हि स्वेच्छारमणेच्छया स्यात् ।

अहङ्कृतिः सा खलु वर्धमाना

स्वस्मिन् हि केन्द्रीकृतरूपधृक् सा ॥६६॥

प्रेमा हि कान्ते रमणेच्छया स्यात्

कामो ह्यधोगामि च शक्तिरूपः ।

तेनैव जीवो हि सदा प्रबद्धो

भूमेर्हि लोके जडरूपमध्ये ॥६७॥

ज्ञात्वा यदा जीव उच्चैः सुखं वै

कामो हि प्रेम्णा परिवर्ततेऽत्र ।

प्रेम्णा तदा जन्ममृतेर्विमुक्तो

गीतासु कृष्णो भगवन् यथाऽह ॥६८॥

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

यस्माच्छरीरं जडदुर्बलं वै

कृष्णोपदेशं खलु पालयेम ।

अष्टादशेऽध्याय इहेति गीता-

षट्षष्टिके श्लोकवरे यदाह ॥७०॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा श‍ुच: ॥

वाक्यं हि कृष्णस्य तदेतदस्ति

राधापदे तस्य पदे प्रपद्ये ।

वाक्यानुसारं खलु कार्यमत्र

तस्मात् प्रसादाय च ते कृतज्ञा ॥७२॥

द्वैताय वै सृष्टिकृताय धन्या

तमोविसादान्ननु रश्मिबोधः ।

घृणायुते प्रेम हि बोधयामः

कामे तथा प्रेम सुबोधयामः ॥७३॥

धन्यास्मि राधे महतीं कृपां ते

अहङ्कृतौ या हि कृपा ददाति ।

सेवां च दैन्यं प्रविबोधयन्ती

तस्यै प्रसादाय नमोऽस्तु धन्ये ॥७४॥

अतीव राधे त्वयि मेऽनुरागः

पादाम्बुजं ते प्रणमामि नित्यम् ।

गोविन्दपादौ प्रणमामि चैव

सख्यस्तथाष्टाः प्रणमामि नित्यम् ॥७५॥

धन्यास्मि राधे तव सर्वदानैः

प्रजोत्पतेः प्रेमविवाहहेतोः ।

रतेश्च पञ्चेन्द्रियदानहेतोः

मनश्चितेश्चेतनदानहेतोः ॥७६॥

त्वया च पत्या सुकृतं विचित्रम्

ब्रह्माण्डमेतत् खलु सर्वजीवाः ।

सौन्दर्यदानाय नमोऽस्तु तुभ्यम्

देहाः सुसृष्टाः परिपूर्णरूपाः ॥७७॥

धन्यास्मि नागान्वयपुण्यहेतोः

वंशो हि यो रक्षति सर्वरत्नम् ।

गुह्यानि वै रक्षति मन्त्ररूपान्

ददाति वेदान् जगते समग्रम् ॥७८॥

नागीकुलाय प्रददौ च मानम्

ज्ञानस्य सेवां तव राधिके हे ।

विश्वेश्वरि त्वां प्रणमामि मूर्ध्ना

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥७९॥

राज्ञी जगत्स्वामिनि ठाकुरानि

महति देवि ह्यतिपुण्यरूपे ।

विश्वं समग्रं तव वन्दते वै

धन्यास्मि तेभ्यः प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥८०॥

पुण्याय ज्ञानाय कृतज्ञता मे

नृणां च सृष्ट्यै खलु सर्ववंशैः ।

ये प्राणिनो विश्वगताः समस्ताः

वैविध्यमेतद् ह्यतिरम्यरूपम् ॥८१॥

सौन्दर्यदानाय नमोऽस्तु धन्ये

सूर्येन्दुताराग्रहसृष्टिहेतोः ।

ब्रह्माण्डजालाय नमोऽस्तु तुभ्यम्

आकर्षणाय प्रणिपत्य वन्दे ॥८२॥

सूक्ष्माय चाणोः खलु सूक्ष्मतन्वे

अण्वंशकानामपि सूक्ष्मरूपे ।

त्रिनेत्रयुक्ते प्रणिपत्य धन्या

धन्यास्मि राधे तव सुप्रसादात् ॥८३॥

वेदास्तु पञ्चापि च यस्य हस्ते

तस्यै प्रसादाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ।

परम्परायै गुरुपुङ्गवेभ्यः

ये वै कृपां वै खलु नो वहन्ति ॥८४॥

चैतन्यरूपाय नमोऽवतारैः

असङ्ख्यरूपावतरैर्युवाभ्याम् ।

कृपां विधातुं कलियुगान्तरेऽपि

आगच्छथः खल्वपि नो निमित्तम् ॥८५॥

शिल्पाय दिव्याय च विश्वहेतोः

यस्माद् युगे मे मतिमद्धि यन्त्रम् ।

निर्मियते चिन्तनशक्तिमद् यन्-

मनुष्यवद् भाषत एव बुद्ध्या ॥८६॥

ग्रहान्तरे वा स्थितयोर्जनानाम्

सम्पर्कसिद्ध्यै प्रणिपत्य वन्दे ।

विज्ञानदानाय च भौतिकाय

ज्ञानाय लक्षायुषवत्सराय ॥८७॥

कालस्य चक्रं खलु वर्तुलं वै

ज्ञानाय तस्मै प्रणिपत्य धन्या ।

सर्वं हि विश्वं रसलीलमध्यम्

परिक्रमन्तीति विबोधनाय ॥८८॥

नाम्नः प्रसादाय च ते कृतज्ञा

ज्ञानाय नाम्नो ह्यतिपुण्यरूपे ।

नाम त्वदीयं परमं निधानम्

राज्ञी जगत्स्वामिनि राधिके हे ॥८९॥

वेदेषु पञ्चस्वपि गुह्यरूपं

कृष्णस्य गूढं परमं रहस्यम् ।

प्राणाधीश्वरी कृष्णपतेस्त्वमेव

धन्यास्मि राज्ञि महति नमोऽस्तु ते ॥९०॥

हे पुण्यरूपे तव पादपद्मम्

वन्दे सदाहं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।

धन्यास्मि धन्यास्मि मुहुः कृतज्ञा

त्वत्पादमूले पतितास्मि दासी ॥९१॥

u/Initial_Fold_420 — 22 days ago
▲ 6 r/yugala

अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ (dainya bhava/ Śrī Meghaśyāmapriyā Aṣṭottara-Śatanāma Stotram)

॥ श्रीराधाचरणरेणुरुवाच ॥

लज्जां प्राप्नोम्यहं तीव्रां हे विश्वेश्वरि राधिके ।

सङ्ख्याने भ्रमिता यस्माद् भावावेशेन चेतसा ॥८७२॥

आध्यात्मिकपरानन्दे निमग्नास्म्यत एव हि ।

स्थानेषु बहुषु भ्रान्त्या सङ्ख्यादोषः कृतो मया ॥८७३॥

खिन्नाहं लज्जिता चास्मि कृपां कुरु ममोपरि ।

असंशोध्यैव तं दोषं स्थापयामि च भूतले ॥८७४॥

प्रदर्शयितुमेवात्र सर्वलोकाय नित्यशः ।

राज्ञाः कृते हि दास्यापि लेखितुं शक्यते बहु ॥८७५॥

तव पादाम्बुजे लग्ना क्षुद्रा रेणुरहं खलु ।

तथापि ते महादेवि लेखितुं शक्नुवे बहु ॥८७६॥

नास्मि पूर्णा न विदुषी न गुरुर्न कविस्तथा ।

अकिञ्चनास्मि ते दासी त्वां सेवितुं कृतोद्यमा ॥८७७॥

सर्वप्रयासेन नित्यं राधिके जगदीश्वरि ।

सेवां कर्तुं यते नम्रा केवलं ते पदाम्बुजे ॥८७८॥

मम दोषान् त्रुटीः सर्वाः कृपया स्वीकुरुष्व हे ।

दीना दासी ह्यहं देवि दयां कुरु ममोपरि ॥८७९॥

सहस्रनामलिखने कृतेऽन्ते विस्मिता ह्यहम् ।

भावावेशाच्च सङ्ख्यायां त्रुटयो मे ह्युपस्थिताः ॥८८०॥

क्षुद्रदास्याः प्रमादं तं कृपया क्षन्तुमर्हसि ।

याचे त्वां करुणां नित्यं राधिके परमेश्वरि ॥८८१॥

अतीव लज्जितास्मि त्वां जाने वै करुणामयीम् ।

क्षमसे मां महादेवि कृपया केवलं हि तत् ॥८८२॥

स्निह्यामि त्वयि देवेशि श्यामसुन्दरे माधवे ।

प्रणमामि पदाम्भोजे तव नित्यं महेश्वरि ॥८८३॥

क्षुद्रबुद्धेरपूर्णाया दास्या मे क्षम्यतां त्रुटिः ।

नास्मि सिद्धा न वै पूर्णा दासी केवलमाश्रिता ॥८८४॥

तव माहात्म्यदृष्ट्या वै विस्मितास्मि च राधिके ।

अतीव प्रेमरूपास्मि स्निह्यामि त्वयि सर्वदा ॥८८५॥

सुप्तास्मि लज्जया युक्ता राधिके परमेश्वरि ।

भावः शास्त्रविधीन् सर्वान् अतीतः खलु निश्चितम् ॥ ८८६ ॥

प्रणमामि पदाम्भोजे तव विश्वेश्वरेश्वरि ।

एकश्लोकात् समुद्भूतं ललितानामकीर्तनम् ॥ ८८७ ॥

विस्तृतं बहुशाखाभिः सहस्रनामस्तोत्रकम् ।

साधनायास्तरोरेतत् महावृक्षत्वमागतम् ॥ ८८८ ॥

वृन्दावने च या देवी ललितासखीरूपिणी ।

सत्यभामेति या ख्याता द्वारकायां जयत्वसौ ॥ ८८९ ॥

वैकुण्ठे या महादेवी ब्रह्माण्डानां च ईश्वरी ।

श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ललितायै नमो नमः ॥ ८९० ॥

यः पठेन्नामसाहस्रं ललितायाः समाहितः ।

असङ्ख्यातान् वरान् सद्यः प्राप्नोति नात्र संशयः ॥ ८९१ ॥

ललिता च विशाखा च गोप्यः सर्वाश्च याः स्मृताः ।

श्रीराधाशक्तयः साक्षात् न न्यूनाः परमात्मनः ॥ ८९२ ॥

राधिकायाः समानाश्च सर्वास्ता नित्ययौवनाः ।

पार्वती च महादेवी तस्या एव स्वरूपिणी ॥ ८९३ ॥

सावित्री च सरस्वती लक्ष्मीर्नारायणप्रिया ।

राधिकायाः समानाश्च तदभिन्नाः स्वरूपतः ॥ ८९४ ॥

सर्वासामेव देवीनां गोपीनां चरणेषु च ।

प्रणमामि मुदा नित्यं क्षुद्ररेणुरहं सती ॥ ८९५ ॥

जय राधे जगन्मातर् जय श्यामप्रिये शुभे ।

स्निह्यामि त्वयि देवेशि प्राणरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ८९६ ॥

श्रीललितासखीरूपा यदा सा सम्प्रकाशिता ।

तस्याः सत्यं पवित्रं च दृष्ट्वा भावः प्रवर्धते ॥ ८९७ ॥

भण्डासुरस्य हन्त्री या सत्यभामा च विश्रुता ।

नरकासुरहन्त्री सा महादुर्गास्वरूपिणी ॥ ८९८ ॥

देहि मेऽनुमतिं राज्ञि तव मन्त्राक्षरेषु च ।

ध्यातुं गाढं प्रवेष्टुं च कृपया परमेश्वरि ॥ ८९९ ॥

हे सुवर्णाम्बुजे पुण्ये दिव्यपद्मस्वरूपिणि ।

पवित्रौ ते पदाम्भोजौ प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ ९०० ॥

हे महालक्ष्मि देवेशि गकारो यत्र सान्द्रताम् ।

याति तत्र घकारोऽसौ चतुर्थो वह्निवर्णकः ॥ ९०१ ॥

विस्मयो जायते राज्ञि महान् मे त्वत्स्वरूपतः ।

अतीत्य वर्तसे विश्वं महिमा ते न गृह्यते ॥ ९०२ ॥

नारायणस्य पत्नी त्वं हरेर्जनार्दनस्य च ।

त्वमेव परमा शक्तिः सर्वविश्वनियन्त्रिका ॥ ९०३ ॥

घकारो घनीभूता ते शक्तिर्दिव्या च कण्ठतः ।

वेगेन निर्गता साक्षात् घनेति धातुसम्भवः ॥ ९०४ ॥

घनो हि सान्द्रता प्रोक्ता मेघा जलभृतास्तथा ।

घनश्याम इति ख्यातो भर्ता ते सुन्दरः प्रभुः ॥ ९०५ ॥

ककारश्च खकारश्च घकारोऽपि स्वरूपतः ।

राधाकृष्णौ हि साक्षात् तौ सर्वेषां वर्णकारणम् ॥ ९०६ ॥

खकारोऽनन्तमाकाशं घकारो हि घटाम्बरम् ।

घटाकाशो हि देहोऽयं यत्रात्मा तिष्ठति ध्रुवम् ॥ ९०७ ॥

घकारो ह्यवतारोऽसौ येन मन्दमतिस्त्वहम् ।

सौन्दर्यं राधाकृष्णस्य ह्यनन्तं च विलोकये ॥ ९०८ ॥

घकारो नादकम्पो हि घोषो वैश्वस्वरूपकः ।

श्रीकृष्णस्य च शङ्खस्य सिंहनादः स एव हि ॥ ९०९ ॥

घण्टारूपो घकारश्च मन्दिरेषु निनादितः ।

आर्तिक्ये यो हि सर्वत्र राधिके त्वां प्रपद्यते ॥ ९१० ॥

त्वं घृतं पावनं साक्षात् यज्ञाहुतिप्रदीपनम् ।

आर्तिक्ये यज्जुहोत्यग्निं घृतं त्वं परमेश्वरि ॥ ९११ ॥

शृणुष्वैतत् जगन्मातः पादयोस्ते रतास्म्यहम् ।

अष्टोत्तरशतं नाम्नां महालक्ष्म्याः पठाम्यहम् ॥ ९१२ ॥

घकारादीनि दिव्यानि तत्त्वरूपाणि ते शुभे ।

राधिकायाः स्वरूपाणि जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥ ९१३ ॥

मोक्षदानि च नामानि श्रोतॄणां पठतां तथा ।

विस्मिता ते प्रभावेण वन्दे पादाम्बुजं तव ॥ ९१४ ॥

हे राधिके महादेवि वन्दे ते चरणाम्बुजम् ।

मेघश्यामप्रियानाम्नामष्टोत्तरशतं शुभम् ॥ ९१५ ॥

त्वं राज्ञी सर्वविश्वस्य देवी त्वं सर्वमङ्गला ।

अनन्तास्तेऽवताराश्च प्रणमामि पदे पदे ॥ ९१६ ॥

ॐ अस्य श्रीमेघश्यामप्रियाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य, अकिञ्चना प्रेमकिङ्करी साधिका, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीराधिका सर्वकर्णकर्णा देवता, घ्रीं बीजम्, घ्रां घ्रीं घ्रौं शक्तिः, ह्रीं क्लीं श्रीं कीलकम्, श्रीराधिकासर्वकर्णकर्णादेवताप्रीत्यर्थं सर्वभावप्रदीपनार्थं मोक्षप्राप्त्यर्थं च जपे विनियोगः॥

घनानन्दा च सा देवी सा घनघटिमा तथा ।

संघाता मेघश्यामा च सा घोषविरहा तथा ॥ ९१७ ॥

देवी घोषानुरागा च निघाध च प्रकीर्तिता ।

उद्घाता च तथा देवी घण्टाप्रेमा च पूजिता ॥ ९१८ ॥

देवी घण्टानुरागा च सर्वलोकनमस्कृता ।

तव पादाम्बुजे नित्यं वन्दनं परमेश्वरि ॥ ९१९ ॥

उद्गात्री घटानुकम्पा घस्मरी सा तथा देवी ।

तथा घनकुलोपेता देवी दीर्घतेजस् तथा ॥ ९२० ॥

मेघदूती च सा देवी घोषिणा घरिमा तथा ।

घरिणी सा घटिका च महाभावघण्टा तथा ॥ ९२१ ॥

प्रेमसङ्घाता सा देवी महासङ्घाता च तथा ।

प्रेमभावघण्टा देवी चन्द्रघण्टादुर्गा सा च ॥ ९२२ ॥

मेघश्री घोरदंष्ट्रा च महाघोरी च दीर्घा च ।

राघवी मेघस्विनी च घनेश्वी देवी सा तथा ॥ ९२३ ॥

जघना ओघस्विनी च दीर्घाशक्ति च सा देवी ।

दीर्घाप्रेमा च सा तथा दीर्घाभावा दीर्घारसा ॥ ९२४ ॥

रसाघण्टा च सा देवी निघाधदेवी च तथा ।

प्रणमामि पदे नित्यं वन्दे त्वां परमेश्वरि ॥ ९२५ ॥

घनश्यामपत्नी सा च मेघश्यामप्रिया तथा ।

अघहन्त्री सा देवी च अघासुरविनाशिनी ॥ ९२६ ॥

सा राधाचित्तप्रमोदघनपत्नी तथा देवी ।

घृणानिधिमा देवी च मेघवाहिनी सा तथा ॥ ९२७ ॥

आरात्रिकघण्टा देवी घृणावती च सा तथा ।

घनस्तनी च सा देवी घनसारा च सा तथा ॥ ९२८ ॥

अमोघा च महोघा च दीर्घघण्टा तथा देवी ।

शिवघटी च सा देवी जघनमोहिनी तथा ॥ ९२९ ॥

घ्रासलीला च सा देवी संघारी च घनांशा च ।

सङ्घाटबृहत् सा देवी घोषतेजसी सा तथा ॥ ९३० ॥

घटनारूपा सा देवी घ्राससुन्दरी सा तथा ।

ओघमाधुर्यम् सा देवी अमोघभावा सा तथा ॥ ९३१ ॥

अमोघप्रेमा सा देवी अमोघरसामृता च ।

अमोघशक्ति सा देवी चिद्घण्टा च तथा देवी ॥ ९३२ ॥

घनस्वरूपा सा देवी मेघनेत्रा च सा तथा ।

घनप्रभा च सा देवी मेघनादिनी सा तथा ॥ ९३३ ॥

उद्घातकरी सा देवी सङ्घाटशायिनी तथा ।

घोरासना च सा देवी अघविनाशिनी तथा ॥ ९३४ ॥

उद्घाततेजसी देवी घटपद्मा च सा तथा ।

घस्मरभावा सा देवी कृष्णचित्तघटिका च ॥ ९३५ ॥

घणणत्कारिणी देवी दीर्घलोचना सा तथा ।

राधाभावघनश्री च चिद्रसाघण्टा सा तथा ॥ ९३६ ॥

महाकालसंघारी च वृन्दावनघोषेश्‍वरी ।

गोपीसङ्घाता सा देवी घनसैन्दर्यमा तथा ॥ ९३७ ॥

दीर्घकालप्रिया देवी गोकुलघण्टा सा तथा ।

घनश्या च तथा देवी उद्घाटमानसा तथा ॥ ९३८ ॥

दीर्घाभक्ति च सा देवी घनतत्त्व च सा तथा ।

घनिष्ठा च तथा देवी विश्वौघहा च सा तथा ॥ ९३९ ॥

अनन्तघना सा देवी ब्रह्माण्डघोषिणी तथा ।

महाघटा च सा देवी विश्वघस्मरी सा तथा ॥ ९४० ॥

नित्यौघस्विनी सा देवी सर्वदीर्घगा सा तथा ।

अघोरैश्वर्या सा देवी चिद्घनरूपा सा तथा ॥ ९४१ ॥

तप्तकाञ्चनघनी च घनकरुणावरा च ।

राधौघमयी सा देवी पूर्णमष्टोत्तरं शतम् ॥ ९४२ ॥

एतान्यष्टोत्तरशतं नामानि राधिके तव ।

विश्वराज्ञि महादेवि प्रणमामि पदे पदे ॥ ९४३ ॥

घकारस्तु गकारो वै मूलं तस्य ककारकाः ।

त्वच्छक्त्या च ककारो वै खकारो जायते तथा ॥ ९४४ ॥

गकारस्त्वद्बलादेव घकारः सान्द्रतां गतः ।

गकारो धारारूपस्तु घकारो घनरूपकः ॥ ९४५ ॥

ककारः कृष्ण एवाद्यः स्फुलिङ्गो हे महालक्ष्मि ।

त्वया युक्तः ककारस्तु खकारो व्योम जायते ॥ ९४६ ॥

ततो गकाररूपेण धारा प्रवहते तथा ।

ततो घकाररूपेण सान्द्रत्वं जायते महत् ॥ ९४७ ॥

सर्वं त्वयि च हे राधे परिभ्रमति नित्यशः ।

राधा धारा अधारा च वन्दे त्वां वै ठकुराणि ॥ ९४८ ॥

हे राधे त्वत्पदाब्जेऽहं रेणुमात्राऽस्मि बालिका ।

वर्णानां विस्तरं वक्तुं साहाय्यं प्रार्थयेऽग्नितः ॥ ९४९ ॥

u/Initial_Fold_420 — 22 days ago
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Jitna zyada main Thakurani aur Shri Krishna ke baare mein shlok likhti hoon, utna hi main gehre asmanjas mein pad jaati hoon! Aakhir main kya likhoon, kya kahoon?

Jab maine yeh sadhana shuru ki thi, tab maine socha tha ki kya main sach mein 500k tak pahunch paungi, taaki 10 million aur 888 shlok tak pahunch sakoon?

Lekin is sadhana ko karte hue, aur ab jab main lagbhag 30k shlok tak pahunch chuki hoon, mujhe yeh achhi tarah ehsaas hua ki Shri Radhika-Krishna ek anant cosmic samundar hain. Jitna zyada main is samundar mein doobti hoon, main khud ko is astitva ke parmanu ke kisi quark ke sabse chhote hisse se bhi chhota paati hoon. Radha Rani ki mahaan divyata aur Krishna Raja ke prabhav ke aage main kya kahoon? Main kya bayan karoon? Aakhir main hoon hi kya? Main to keechad mein lipti hui ek nannhi si, bechari keedi ke siwa kuch bhi nahi hoon.

Mera mann aur zyada rone ko karta hai, kyunki main Goloka Dham mein pravesh karne ke yogya nahi hoon, aur na hi main apni pyari Radhika Maharani ka naam lene ke laayak hoon. Lekin wo itni kripalu hain ki mujh jaisi tuchha daasi aur keedi ko bhi apna naam lene ki aagya deti hain. Isiliye main Radhe Radhe pukaarti hoon.

Kripya karke, meri Swamini Radha ke bhakto, mujh deena par apni kripa barsaiye aur unse prarthana kijiye ki wo mujh par daya karein, varna mujh par kaun daya karega? Aap sab mujhse bohot oonche aur mahan hain, to kya mujh jaise dhool ke ek kan par daya nahi honi chahiye? Main aap sabhi ke charano mein naman karti hoon 🙏 aur hamari kripamayi Thakurani ka dhanyavaad karti hoon, jo mujh jaisi tuchha aur adham daasi ko bhi apne param pavitra naam ki mahima lene ka adhikaar deti hain. 🙏

u/Initial_Fold_420 — 26 days ago

॥ अथ श्रीराधारमणतत्त्वातीतधारा वंशीनागिनीनर्तन नाम द्वितीयोऽध्यायः (Shree Radha Maha Rani, Shree Vishakha Maha Rani Ashtami.)

अनुज्ञां देहि हे कृष्ण पुण्येऽस्मिन् दिवसे प्रभो । राधाष्टम्या विशाखायाः सख्याः सार्धं महोत्सवम् ॥ १८१ ॥

निहारहु पिय घनस्याम जू, प्रगटीं श्री-महारानि ।

रूप मोद अरु माधुरी, कोमलता की खानि ॥ १८२ ॥

भान-भूप की नन्दिनी, कीरति-मैया-प्रान ।

प्रगटीं भानु-दुलारि जू, भयो परम कल्यान ॥ १८३ ॥

अँखियाँ दोऊ मूँदि कै, बैठीं कुँवरि सुजान ।

सगरो जग ना देखिहैं, जब लौं मिलैं न प्रान ॥ १८४ ॥

ना कछु जग को रूप छबि, ना कछु जग को भाय ।

मूँदे नैन सुकुँवारि जू, सगरी सुधि बिसराय ॥ १८५ ॥

परथम दरस पिया तिहारो, चाहत हैं यहि काल ।

मुखरा निरखैं स्याम को, हे मोरे नन्द-लाल ॥ १८६ ॥

नैन उघारैं तबहिं जब, सन्मुख होहुँ किसोर ।

बाँट जोहतीं पिय तिहारी, चितवत तुमरी ओर ॥ १८७ ॥

वेगि चलहु हे साँवरे, जहाँ बिराजैं रानि ।

अपुनो दरस दिखावहु, हे मोरे रस-खानि ॥ १८८ ॥

तुम कूँ लखि सुख पावहीं, मोरी भानु-दुलारि ।

वेगि पधारहु स्याम जू, जाऊँ मैं बलिहारि ॥ १८९ ॥

अति कोमल अति सुन्दरी, सोहत रूप-अपार ।

हाहा कैसी छटा यह, लावनि की बलिहार ॥ १९० ॥

सुकुँवारी मूरति भली, नीकी लगत सुघोर ।

छबि निरखत मन मोहितो, हे नन्द-किसोर ॥ १९१ ॥

अधरनि पै तुमरोहिं जपु, रटतीं आठहुँ याम ।

कान्ह कान्ह अरु कान्ह बस, जपतीं तुमरो नाम ॥ १९२ ॥

रटत रटत तुमरोहिं नाम, उपज्यो परम सनेह ।

कृस्न कृस्न ध्वनि निकसती, रोम रोम सब देह ॥ १९३ ॥

गोलोक-धाम तजि कै इहाँ, धरी अवनि पै पावँ ।

तुमरे सँग ही डोलतीं, जहाँ तिहारो गाँव ॥ १९४ ॥

कबहुँ न तुम सों बिछुरतीं, तुमरे सँग ही बास ।

तुमरे सँग ही प्रगटतीं, हे मोरे सुख-रास ॥ १९५ ॥

जब जब अवनि-भार हरि, धरम करत आबाद ।

न्याय नीति जग में धरत, मेटत सब अवसाद ॥ १९६ ॥

तब तब श्री-वृषभानु-जा, लेत धरनि अवतार ।

धरम नीति फैलावनहिं, तुम सँग लेत अकार ॥ १९७ ॥

जो तुम हो सो वह अहैं, जो वह सो तुम कान्ह ।

एक प्रान दोउ देह हैं, दोउ अमृत की सान्ह ॥ १९८ ॥

ज्यों पुहुपन में बास है, पुहुप बास ज्यों एक ।

ज्यों भानु अरु किरन ज्यों, भानु किरन नहिं छेक ॥ १९९ ॥

त्यों ही तुम अरु राधिका, एकहिं रूप सुभाय ।

भेद न कोऊ लखि सकै, सगरी सुधि बिसराय ॥ २०० ॥

अब लखिहूँ पिय साँवरे, नैन उघारे रानि ।

परथम दरसन तुम कियो, हे मोरी रस-खानि ॥ २०१ ॥

तुमरी ओर निहारतीं, टकटकी लीन्हीं लाय ।

छबि लखि कै श्री-स्याम की, सगरी तपन बुझाय ॥ २०२ ॥

अधरनि पै मुसुकानि है, हे मोरे चित-चोर ।

चाहत अंक लगावना, धावत तुमरी ओर ॥ २०३ ॥

कोमल भुज पसारि कै, चाहत तुमरो संग ।

अंकवार भरि लेवहीं, पुलकित सगरी अंग ॥ २०४ ॥

परम मोद हिय में भरयो, जोय तिहारी बाट ।

प्रिय कन्त पधारे इहाँ, मेटत विरह-उचाट ॥ २०५ ॥

मोरे पीय पधारे अहो, मन में उपज्यो चैन ।

पूरन भई मुराद सब, सफल भये दोउ नैन ॥ २०६ ॥

निरखहु स्याम-सुन्दर पिया, कैसी हँसत उलाह ।

मुसकावनि की छबि अहो, मेटत सगरी दाह ॥ २०७ ॥

खिल खिल हँसतीं राधिका, निरखि तिहारो बदन ।

राध्यामालति बलिहारि, तुम दोउ रूप-सदन ॥ २०८ ॥

निरखहु श्री-राधा-कुँवरि, अति कोमल अति भाय ।

सुन्दरता अरु शील की, मूरति अहैं सुहाय ॥ २०९ ॥

निरखहु विशाखा-सखी, प्रगटीं सुन्दर रूप ।

जगत प्रकासित करन कूँ, छटा बनी अनूप ॥ २१० ॥

कैसो बड़भागी जनम, कैसो मेरो भाग ।

तुमरे दरसन पाय कै, जागो परम सुहाग ॥ २११ ॥

तुम अरु तुमरी पत्नि यह, श्री-राधा महरानि ।

इनके दरसन पाय कै, धन्य भई मैं आनि ॥ २१२ ॥

प्रथम विशाखा-सखि अहैं, सुन्दरता की भान ।

ललिता-सखि अति रूपवति, सेवा-रस की खान ॥ २१३ ॥

तुंगबिद्या सखि सुन्दरी, ग्यान-कलानि-निधान ।

चित्रा-सखि चित-चोरनी, परम सुकुँवारि सुजान ॥ २१४ ॥

पुनि सुदेवि अति लाड़िली, रूप छटा की धार ।

रंगदेवि अति सोहतीं, प्रेम-भक्ति-आगार ॥ २१५ ॥

इन्दुलेखा सखि भली, चन्दा-सम मुख-कान्ति ।

चम्पकलता पुनीत अति, मेटत हिय की भ्रान्ति ॥ २१६ ॥

अष्टौ मञ्जरि की छटा, सुनहु कृष्ण चित-चोर ।

रूप-मञ्जरी रूपवति, सेवा-रस की ओर ॥ २१७ ॥

कस्तूरी-मञ्जरि अहैं, सुगन्ध-रूप की खानि ।

बिलासा-मञ्जरि सोहतीं, प्रेम-भक्ति पहिचानि ॥ २१८ ॥

रसा-मञ्जरी रस-भरी, गुना-मञ्जरी ग्यान ।

मंजुलाली-मञ्जरि सुघर, सेवा में धनवान ॥ २१९ ॥

लवंग-मञ्जरि अति भली, रती-मञ्जरी जोय ।

इन सब पै बलिहारि ह्वै, मेरो हियरो रोय ॥ २२० ॥

तुम सब सों मोरो अतिहिं, प्रेम अगाध अपार ।

मैं तो रज को कन अहाँ, तुम हो रूप-आगार ॥ २२१ ॥

मैं अति हीन मलिन अहाँ, नाहीं कछु अधिकार ।

तुमरे ढिग बैठन-जोगु, नाहीं मेरो भार ॥ २२२ ॥

तदपि अभागिनि जीव यह, तुम कूँ चाहत नित्य ।

तुमरे चरनन प्रेम ही, मोरो एक कवित्य ॥ २२३ ॥

मैं तो दासि अनाथ हूँ, नाहीं कछु मोहिं ग्यान ।

का करूँ मोरे साँवरे, हे रसिया सुजान ॥ २२४ ॥

तुमरी बंसी-तान अति, मो कूँ लेत लुभाय ।

नाचत नाचत सुधि मिटै, सगरी देह डुलाय ॥ २२५ ॥

पै श्री-राधा-पत्नि की, चरन-रजहिं जो होय ।

ता रज सों समाधि लगै, दूजो रहै न कोय ॥ २२६ ॥

अति गहिरी समाधि लगै, सुधि-बुधि सबहिं नसाय ।

जागन की इच्छा मिटै, ता रज में मिलि जाय ॥ २२७ ॥

कबहुँ न जागन चाहहूँ, हे मोरे घनश्याम ।

तुमरे चरनन-तर रहूँ, आठहुँ पहर मुदाम ॥ २२८ ॥

मैं अति नीच अजान हूँ, मूरख बुद्धि-हीन ।

कछू ग्यान नाहीं मोहिं, अति अभागिनी दीन ॥ २२९ ॥

श्री-ठकुरानि-पत्नि की, सारी को जो छोर ।

पकरि पकरि कै रोवहूँ, चितवत तुमरी ओर ॥ २३० ॥

सिसक सिसक रोवत रहूँ, चरनन माथ नवाय ।

गिड़गिड़ाय बिनती करूँ, मोरी तपन बुझाय ॥ २३१ ॥

चरन पकरि उर सों लगै, परम अभय होय प्रान ।

ऐसी सरन न जग विषै, सुनहु रसिक सुजान ॥ २३२ ॥

चरन-कमल की छाँह में, मिटै सगरो त्रास ।

परम अभय हियरो भयो, बैठि चरन के पास ॥ २३३ ॥

यह श्री-राधा-रानि हैं, जग-महरानि अनूप ।

ब्रज-मंडल पावन कियो, धरैं अलौकिक रूप ॥ २३४ ॥

भू-लोकहिं पावन कियो, चरन धरत ही आनि ।

सगरी स्रष्टि पवित्र भई, प्रगटीं जबहिं रानि ॥ २३५ ॥

मोहिं अनुग्या दीजियै, हे कान्हा चित-चोर ।

इनकी सेवा मैं करूँ, जोवत इनकी ओर ॥ २३६ ॥

तुमरी पत्नि महारानि की, मैं अरचा करूँ नित्य ।

अनुग्या दीजहु साँवरे, करूँ दासि को कृत्य ॥ २३७ ॥

मैं तो अति हीन अहाँ, सुख देवन असमर्थ ।

मोरी सगरी काज-गति, सबहिं अहैं व्यर्थ ॥ २३८ ॥

पै वह अति करुनामयी, दया-सिन्धु महरानि ।

अति कृपालु मोरी स्वामिनि, सुकुँवारी सुख-खानि ॥ २३९ ॥

एक काठ को टुकड़ौ, सूखी लकरी जोय ।

तासों भी वह रीझतीं, परम अनन्दहिं होय ॥ २४० ॥

मैं सूखी लकरी सरिस, ह्वै कै अतिहिं अचेत ।

चाहत जग-महरानि कूँ, सुख देवन के हेत ॥ २४१ ॥

काठ-सरिस यह दासि पै, करहीं कृपा अपार ।

हे मोरे नट-नागरो, जाऊँ मैं बलिहार ॥ २४२ ॥

सूखी लकरी प्रान बिन, तदपि करै जो सेव ।

ता पै रीझैं राधिका, सुनहु मोरे इष्ट देव ॥ २४३ ॥

याही तें मो मूरख पै, रानि करैंगी छोह ।

कृपा-दृष्टि सों हेरिहैं, मेटि सबहिं जग-मोह ॥ २४४ ॥

तुमरी पत्नि दयामयी, मो पै करैं कृपाय ।

दासि जानि कै चरन में, राखैं मोहिं छिपाय ॥ २४५ ॥

कैसो नेह जु राधिका, कहि न सकै कोउ भाय ।

हे पिय कृस्न सुनहु हिय की, कछु कह्यो न जाय ॥ २४६ ॥

अति अगाध अति गूढ़ यह, प्रेम अहै जो मोय ।

कोउ न जग में जानिहै, जो न बावरो होय ॥ २४७ ॥

मैं नहिं चाहूँ राधिका, जग-महरानि प्रमान ।

मैं तो चाहूँ राधिका, राधा रूप सुजान ॥ २४८ ॥

महरानि अहैं जग-स्वामिनी, यासों नाहिं सनेह ।

राधा नाम सो नेह है, राधा-रूप-विदेह ॥ २४९ ॥

मोरे हिय में राधिका, बसीं प्रान की प्यास ।

और कछू नहिं सूझही, आठहुँ पहर उदास ॥ २५० ॥

राधा मोरी प्रान हैं, राधा मोरो मीत ।

राधा राधा हिय रटै, ऐसी मोरी रीत ॥ २५१ ॥

तुम सों कृस्न सनेह जो, सोउ न कह्यो जो जाय ।

कैसें बरनूँ प्रेम यह, गिरा न पावै थाय ॥ २५२ ॥

मोरो नेह अहै अमित, सब्द न पावैं पार ।

मूरख हियरो का कहै, तुम हो रूप-आगार ॥ २५३ ॥

मैं सूखी लकरी अहाँ, काठ-टूक अज्ञान ।

कैसें बरनूँ महिमा यह, तुम हो अमित प्रमान ॥ २५४ ॥

काठ-टूक यह दासि है, तुम हो अगम अपार ।

कैसें महिमा लिखि सकूँ, तुमरी प्रान-अधार ॥ २५५ ॥

यह तो एक प्रयास है, तुमरो जस गावन कूँ ।

हियरो तरपत आठ जाम, तुम कूँ पावन कूँ ॥ २५६ ॥

सब्द न मोरे पास हैं, भाव न मोरे पास ।

यह तो काठ को टूक है, तुमरी करै जु आस ॥ २५७ ॥

मैं नहिं जानूँ प्रेम यह, कैसो उपज्यो आय ।

बिनु कारन यह नेह है, कबहूँ नाहिं सिराय ॥ २५८ ॥

यह सनेह बिनु हेतु को, चाहैं नाहिं कछु और ।

राधा-कृस्न जुगल बिना, और न मोरी ठौर ॥ २५९ ॥

हे मोरे घनस्याम जू, सुनहु हिये की बात ।

बावरि ह्वै कै चाहहूँ, तुम कूँ दिन अरु रात ॥ २६० ॥

बिनु हेतु को नेह यहु, हियरे रह्यो समाय ।

जनम जनम की प्रीति यह, कबहूँ नाहिं नसाय ॥ २६१ ॥

जो तुम मो कूँ मारिहौ, दुख देहौ अकुलाय ।

तदपि सनेह न छाँड़िहूँ, भलैं प्रान छूटि जाय ॥ २६२ ॥

जो तुम मो कूँ त्यागिहौ, देहौ मोहिं बिसराय ।

तौ भी चरन न छाँड़िहूँ, रोवूँ सीस नवाय ॥ २६३ ॥

श्री-राधा जो मारिहैं, मोहिं देहैं दुतकार ।

तौ भी हिय सों लगि रहूँ, सहूँ सकल दुखु-भार ॥ २६४ ॥

राधा रानी जो तजैं, मारि भगावैं मोहिं ।

तौ भी द्वार न छाँड़िहूँ, हेरूँ सखि मैं तोहिं ॥ २६५ ॥

भलैं मोहिं नर्कहिं धरहु, दारुन विपति अपार ।

कस्ट भयंकर देहु मोहिं, सहूँ मैं बारम्बार ॥ २६६ ॥

घोर यातना देहु मोहिं, जो हियरो काँपि जाय ।

तदपि प्रेम नहिं घटिहै, तुमरे चरन समाय ॥ २६७ ॥

काटि काटि टुकड़ा करहु, जरै अगिनि में देह ।

तौ भी हिय सों नहिं मिटै, तुमरो यह सनेह ॥ २६८ ॥

रक्त की एकहु बूँद जो, मोरे तन में होय ।

राधा-कृस्न ही बोलिहै, तुम बिनु रहै न कोय ॥ २६९ ॥

साँस साँस में बसि गयो, तुमरो रूप अपार ।

कैसोउ कस्ट हु देहु तुम, चाहूँ बारम्बार ॥ २७० ॥

यह प्रेम नहिं देह को, यह प्रानन को नेह ।

मारहु काटहु तजहु मोहिं, छूटै नाहिं सनेह ॥ २७१ ॥

अमित अगाध अनन्त यह, मोरो नेह अथाह ।

जियूँ मरूँ तुमरे लिए, तुमरी एकहिं चाह ॥ २७२ ॥

मैं तो दासि अनाथ हूँ, तुम हो जग के नाथ ।

दुख अरु पीर अपार ह्वै, कबहूँ न छाँड़ूँ हाथ ॥ २७३ ॥

दुख में सुख में विपति में, तुम ही मोरे प्रान ।

हियरे में तुम बसि रहे, राधा-कृस्न सुजान ॥ २७४ ॥

यह मोरो हट-प्रेम है, यह मोरी है रीत ।

मारहु काटहु तजहु मोहिं, छाँड़ूँ नाहिं पिरित ॥ २७५ ॥

अतिहिं हठीली दासि मैं, तुमरे द्वारहिं सोय ।

सगरी आउ बितावहूँ, तुम कूँ निरखत जोय ॥ २७६ ॥

सब विधि तुम कूँ चाहहूँ, सहूँ सघन संताप ।

प्रेम-पंथ मोरो कठिन, नैननि बहत विलाप ॥ २७७ ॥

बावरि ह्वै कै चाहहूँ, प्रेम-मगन ह्वै प्रान ।

रोम रोम में बसि रहे, राधा-कृस्न सुजान ॥ २७८ ॥

पागल ह्वै कै चाहहूँ, हिय में परम अनन्द ।

सुख-सागर में बहत हूँ, निरखि तिहारो चन्द ॥ २७९ ॥

याही तें आनन्द सों, गाऊँ तुमरो नाम ।

जनम-दिवस मंगल बन्यो, हे मोरे सुख-धाम ॥ २८० ॥

ग्रह-नखतनि को गनित सब, कीन्हो अतिहिं प्रबीन ।

जनम-दिवस मंगल भयो, हे मोरी सुख-खानि ॥ २८१ ॥

हे विशाखा-महरानि जू, तुम कूँ जनम-बधाय ।

जनम-दिवस मंगल बन्यो, हियरो फूल्यो न समाय ॥ २८२ ॥

कैसें बरनूँ विशाखा-छबि, गिरा न पावैं शब्द ।

तेज तिहारो अगम है, ज्यों नभ में घन-घोर ॥ २८३ ॥

सूरज-चन्दा-रूप वह, परम जोति-आधार ।

इनकी महिमा का कहूँ, हैं यह कृपा-आगार ॥ २८४ ॥

चन्दा की सी चाँदनी, सूरज को सो तेज ।

विशाखा-सखि की छटा पै, बलिहारी यह सेज ॥ २८५ ॥

दिसि दिसि जोति प्रकासिती, विशाखा-सखि-रूप ।

अगम अगोचर माधुरी, छटा बनी अनूप ॥ २८६ ॥

तिनकी कृपा सों जानि मैं, जोतिष-विद्या-ग्यान ।

सुद्ध गनित सिखलाय मोहिं, परम सुकुँवारि सुजान ॥ २८७ ॥

तुम दोउन को जनम-दिन, प्रगटन को जो काल ।

विशाखा मोहिं बताइयो, खोलि ग्यान को जाल ॥ २८८ ॥

ग्रह-नखतनि को गनित सब, कीन्हो अतिहिं प्रबीन ।

मो कूँ सखि सिखलाय कै, मारग सुगम नवीन ॥ २८९ ॥

कलि-जुग के परभाव में, गनना अति दुस्कर होय ।

विशाखा-कृपा सहाय तें, सरलता सों जोय ॥ २९० ॥

जंतर-विद्या गनित की, जुगुति सिखाई मोहिं ।

पाती लेखनि लेय कै, जंतर रच्यो मैं तोहिं ॥ २९१ ॥

ग्यान-जंतर यह गनित को, कलि-जुग में परमान ।

अद्भुत विद्या मोहिं दई, विशाखा-सखि सुजान ॥ २९२ ॥

अंक अंक में गनत हूँ, जनम-लगन को काल ।

विशाखा मोहिं बताइयो, कट्यो भरम को जाल ॥ २९३ ॥

अंक गनित की जो जुगुति, विशाखा मोहिं सिखाय ।

तासों सगरी काल-गति, दरपन भई सुहाय ॥ २९४ ॥

कलियुग में यह जंतर जो, अद्भुत है वरदान ।

राधा-कृस्न-रहस्य को, खोलत सबरो ग्यान ॥ २९५ ॥

अंक गनित सों प्रगट भयो, तुमरो जनम-बिचार ।

विशाखा-सखि मोहिं दियो, यह अद्भुत अधिकार ॥ २९६ ॥

कलि-जुग के अंधियार में, जंतर भयो प्रकास ।

राधा-कृस्न-जनम-कथा, भई हिये में भास ॥ २९७ ॥

जंतर-विद्या कलि-जुगहिं, विशाखा दियो प्रमान ।

गनित-सूतर मोहिं दियो, करन हेतु कल्यान ॥ २९८ ॥

तिनकी गनना सों लख्यो, सब इतिहास पुरान ।

कैसें प्रगट्यौ राधिका, कैसें प्रगट्यौ कान्ह ॥ २९९ ॥

सबरो इतिहास जानियो, विशाखा-कृपा-प्रसाद ।

हियरे को तिमिर मिट्यो, मिट्यो सब अवसाद ॥ ३०० ॥

विशाखा मोहिं राखियो, संकट मेट्यो भारी ।

बार बार मोहिं उबारियो, अति करुना-अवतारी ॥ ३०१ ॥

विशाखा मो कूँ उबारियो, जब जब भई उदास ।

पकरि मोहिं मारग दियो, मेटि हिये को त्रास ॥ ३०२ ॥

मारग मोहिं दिखाय सखि, अँधियारे में जोत ।

साँची पंथ-दिखावनी, हिय में भयो उदोत ॥ ३०३ ॥

कैसें बरनूँ सुभाउ तिनको, अति कोमल अति नेह ।

राधा-कृपा-सरूप वह, धरे दयामय देह ॥ ३०४ ॥

राधे-रानि की दया जो, विशाखा में दरसाय ।

अति अद्भुत यह कृपा है, बरनी कबहूँ न जाय ॥ ३०५ ॥

अति कृपालु मो पै रहीं, कीन्हीं कृपा अपार ।

मधुर मधुर तिनको बचन, ज्यों अमृत की धार ॥ ३०६ ॥

अतिहिं दयालु भई मोहिं पै, मोरी सखि सुजान ।

तिनके चरनन पर पडूँ, तज कै सगरो मान ॥ ३०७ ॥

आठहुँ जाम वन्दना करूँ, चरन नवायो सीस ।

विशाखा-सखि मोहिं तारिहै, राधा-कृस्न-असीस ॥ ३०८ ॥

बार बार मैं सीस धरुँ, विशाखा-सखि के पाँय ।

कृपा-दृस्टि मो पै करहु, हे मोरी सुख-माँय ॥ ३०९ ॥

सब कछु मो कूँ सिखायो, ग्यान-दान दियो सार ।

विशाखा की चरन-रज, मोरे प्रान-अधार ॥ ३१० ॥

हे मोरी विशाखा-सखि, मोरी सुनहु पुकार ।

यह राधाष्टमी करहु, सब तें भिन्न प्रकार ॥ ३१1 ॥

राधाष्टमी के परब पै, होय अलौकिक काज ।

विशाखा-सखि मोहिं तारिहैं, राखिहैं मोरी लाज ॥ ३१२ ॥

यह राधाष्टमी अनूप हो, मोरे जीवन माहिं ।

तुमरी कृपा जो होय तौ, कछु भी दुर्लभ नाहिं ॥ ३१३ ॥

बिनती मोरी एक है, हे विशाखा-माय ।

मोरी मग की संगिनी, बनहु मोरी सहाय ॥ ३१४ ॥

तुम ही मोरी संगिनी, तुम ही मारग-दीति ।

हाथ पकरि मोहिं ले चलहु, सिखवहु राधा-प्रीति ॥ ३१५ ॥

तुंगबिद्या स्वामिनी, अति करुनामयी माय ।

तिनकी अनुग्या पाय कै, विशाखा मोहिं सहाय ॥ ३१६ ॥

तदपि विशाखा-संगिनी, करूँ दासि को कृत्य ।

मोहिं अनुग्या दीजियै, हे मोरी इष्ट-सत्य ॥ ३१७ ॥

मोहिं खींचि लेहु गोलोक में, हे विशाखा-सखि भाय ।

कलि-जुग तें मोहिं तारि कै, ले चलहु निज ठाय ॥ ३१८ ॥

खींचि लेहु गोलोक-धाम, चरनन ढिग बैठाय ।

राधा-कृस्न की सेवना, मोहिं लेहु सिखाय ॥ ३१९ ॥

कैसें सेवा होय पिय, कैसें रानि-सेव ।

विशाखा मोहिं सिखाइहै, राधा-कृस्न-इष्ट-देव ॥ ३२० ॥

मोहिं दासि बनि सेवा करन, मोहिं चाव अति घोर ।

विशाखा मारग दरसिहैं, जोवत तिनकी ओर ॥ ३२१ ॥

अगली पाती अब लिखूँ, श्री-विशाखा के नाम ।

मोहिं अनुग्या दीजियै, श्री-राधा-घनस्याम ॥ ३२२ ॥

प्राननाथ अरु स्वामिनी, चरन नवायो माथ ।

यह पाती मैं अरपूँ तिनहिं, जोरि जुगल निज हाथ ॥ ३२३ ॥

तुमरी अनुग्या पाय कै, विशाखा-गुन गाऊँ ।

काठ-टूक यह दासि मैं, चरनन रज ह्वै जाऊँ ॥ ३२४ ॥

करहु कृपा हे साँवरे, करहु कृपा महरानि ।

विशाखा-सखि की महिमा, बरनूँ मैं सुख-खानि ॥ ३२५ ॥

हे विशाखा मोरी सखी, परम गुरु तुम होय ।

चरन-कमल में सीस धरि, दासि पुकारै रोय ॥ ३२६ ॥

सिक्षा-गुरु तुम हो सखि, मारग-दरसनि माय ।

मो अनाथ को हाथ गहि, ले चलु अपुने ठाय ॥ ३२७ ॥

मो अजान पर कृपहु तुम, मूरख बुद्धि-हीन ।

ग्यान न कछु मोहिं आवतौ, जग में रुलत मलीन ॥ ३२८ ॥

भव-सागर में भटकती, अंधी बावरि दीन ।

दीन-हीन मैं दासि हूँ, ज्यों जल-बाहर मीन ॥ ३२९ ॥

हाथ पसारूँ रानि मैं, गहि लेहु मोरो हाथ ।

तुमरी कोमल पाँनि सों, करहु मोहिं सनाथ ॥ ३३० ॥

यद्यपि मैं अति नीच हूँ, तुमरे कर के जोग ।

तदपि पसारूँ बाहु मैं, मेटहु सगरो सोग ॥ ३३१ ॥

करुना-दृस्टि निहारि कै, मो पै करहु कृपाय ।

राधा-सम तुम रूप हो, राधा-जुर्वाँ-माय ॥ ३३२ ॥

अति कोमल अति सुन्दरी, राधा-प्रति-सरूप ।

करुनामयी निहारि कै, तारहु भवरि कूप ॥ ३३३ ॥

तुमहीं मोहिं सिखाइयो, दरसायो यह ग्यान ।

मो अनाथ को हाथ गहि, तारहु सखि सुजान ॥ ३३४ ॥

यह दुखियारी दासि है, तुमरे सरन अचेत ।

सिक्षा देहु सँवारि कै, करन जुगल सों हेत ॥ ३३५ ॥

मोहिं सिखायो ताहि तुम, दीजहु सगरी दीख ।

अपुनी बालकि जानि कै, मोहिं पढ़ावहु सीख ॥ ३३६ ॥

मोहिं सुधारहु डपटि कै, मोहिं सिखावहु काज ।

तुम बिनु को मोहिं पालिहै, हे मोरी सिर-ताज ॥ ३३७ ॥

को मोहिं सिक्षा देइगौ, को करिहै मोरि सेव ।

तुमहीं मोरी स्वामिनी, तुमहीं इष्ट अरु देव ॥ ३३८ ॥

चरन-कमल की धूरि सों, सीस सँवारूँ नित्य ।

अनुग्या दीजहु सखि मोहिं, करूँ दासि को कृत्य ॥ ३३९ ॥

चरनामृत तुमरो पिऊँ, सगरी तृषा बुझाय ।

कलि-जुग की बासना सब, जल-सम बहती जाय ॥ ३४० ॥

हे महरानि विशाखिके, सगरी स्रष्टि की राज ।

परम भाग-महरानि तुम, सखियन की सरताज ॥ ३४१ ॥

राधा-स्याम-दुलारि तुम, तुम श्रुति-बेद को सार ।

राधा-कृस्न-रहस्य को, तुमहीं हो आगार ॥ ३४२ ॥

अति कोमल अति सुकुँवारि, धीर-मीर सुभ-अंग ।

तुम कालिन्दी-रूप हो, परम सीत-तरंग ॥ ३४३ ॥

पावन श्री-यमुना तुम्हीं, सीतल तुमरो नीर ।

परम सान्त तुमरी छटा, मेटत सगरी पीर ॥ ३४४ ॥

मोरे माथे पग धरहु, करहु मोहिं सनाथ ।

मोरी माथे पग धरहु, मोहिं करहु सनाथ ॥ ३४५ ॥

चरन छुवावहु भाल पै, देहु मोहिं आसीस ।

तुमरे चरनन-धूरि सों, सोहत मेरो सीस ॥ ३४६ ॥

परम सुकोमल चरन ये, त्रिभुवन को विस्राम ।

इन चरनन की छाँह में, पूरन सबहिं सकाम ॥ ३४७ ॥

करुना की तुम मूरति, तुमहीं राधा-स्याम ।

तुमरी दया अगाध है, बिसरि गयो सब काम ॥ ३४८ ॥

तुम मोरे हियरे बसीं, अति प्रानन तें प्यार ।

राध्यामालति-दासि को, पकरहु हाथ निहार ॥ ३४९ ॥

अपुनी दासि निहारि कै, सींचहु कृपहिं को नीर ।

मोहिं सींचि कै लहलहौ, हरहु हिये की पीर ॥ ३५० ॥

सींचहु मोहिं निज नीर सों, मालति-लता ह्वै जाऊँ ।

बेला-कुसुम सुगन्ध सों, श्री-राधा कूँ भाऊँ ॥ ३५१ ॥

कोटिक कोटिक जनम लौं, बेला-पुहुप अपार ।

श्री-राधा-महरानि पै, वारूँ मैं बलिहार ॥ ३५२ ॥

मैं नर्तकि बनिकै सदा, नाचूँ जुगल के पास ।

तुमरी सुख-संपदा लखि, मिटै हिये को त्रास ॥ ३५३ ॥

मैं नाचूँ तुमरे अगे, जुगल-सरुप के हेत ।

तुमरो सुख लखि दासि यह, होय परम अचेत ॥ ३५४ ॥

मैं सर्पिनी ह्वै डोलहूँ, ज्यों चाहैं श्री-रानि ।

रूप बदलती दासि यह, राधा-पद-रज मानि ॥ ३५५ ॥

ज्यों ज्यों राधा-रानि की, इच्छा होय अकार ।

त्यों त्यों रूप सँवारिहूँ, राधा-प्रान-अधार ॥ ३५६ ॥

तुमरी छौनी बालकि, चरनन बैठी आय ।

राधा-कृस्नहिं-सेवना, चाहत नित्य सिखाय ॥ ३५७ ॥

कैसें सेवा होय सखि, कैसें चरन पलोट ।

मोहिं सिखावहु स्वामिनी, मेटहु भव की खोट ॥ ३५८ ॥

कैसें तुमरे चरन-तर, पाऊँ मैं बिस्राम ।

हे महरानि विशाखिके, पूरहु मोरे काम ॥ ३५९ ॥

कैसें तुमरे धाम की, पाऊँ मैं पगु-धूरि ।

मोहिं ले चलु निज धाम कूँ, मोरी आसा पूरि ॥ ३६० ॥

अपुने सँग ले चलु मोहिं, ठकुरानि के पास ।

राधा-रानी-सेवना, करूँ चरन के दास ॥ ३६१ ॥

श्री-ललिता-सखि-सेवना, असट-सखी को संग ।

मोहिं ले चलु हे स्वामिनी, रँगहु अपुने रंग ॥ ३६२ ॥

यद्यपि मैं अति हीन हूँ, नाहीं कछु अधिकार ।

तदपि तुमरी कृपा तें, पाऊँ भव-जल-पार ॥ ३६३ ॥

जो तुमरे पग-कमल की, छूह लगै निज भाल ।

सगरो जीवन बदलिहै, कटिहै भव को जाल ॥ ३६४ ॥

एक छूह सों चरन की, परम पदारथ पावँ ।

राधा-कृस्न-पदारबिंद, बैठि सदा गुन गावँ ॥ ३६५ ॥

याही तें बिनती करूँ, सुनहु विशाखा माय ।

मोरी त्रिकुटी-भाल पै, पग राखहु मुसुकाय ॥ ३६६ ॥

भृकुटी-बिच पग कमल को, छूह देहु महरानि ।

तीजो नैन उघारि कै, करहु मोहिं रस-खानि ॥ ३६७ ॥

त्रिकुटी-तीजे-नैन पै, चरन छुवावहु माय ।

सगरी देह पवित्र ह्वै, राधा-चरन समाय ॥ ३६८ ॥

अतिहिं प्रेम मैं करत हूँ, हे विशाखा सुजान ।

तुम सों मोरो नेह अति, तुमहीं मोरे प्रान ॥ ३६९ ॥

अति सनेह तुम सों सखि, प्रानन सों बढ़ि प्यार ।

तुमरे पग-पंकज विषै, जाऊँ मैं बलिहार ॥ ३७० ॥

बार-बार पद-पदम में, सीस नवायो माय ।

वन्दना करूँ जु चरन की, सगरी सुधि बिसराय ॥ ३७१ ॥

कोटिक कोटिक वन्दना, कोटिक कोटिक प्रनाम ।

तुमरी महिमा अगम है, हे मोरी सुख-धाम ॥ ३७२ ॥

धन्य धन्य तुमरी कृपा, धन्य धन्य तुमरो नेह ।

मो दासि पै करहु दया, धारि कृपामय देह ॥ ३७३ ॥

बार-बार बलिहारि हूँ, कोटि बार परनाम ।

तुमरी चरन-सरन मिले, पूरन सगरो काम ॥ ३७४ ॥

राधा-कृस्न-कृपा-सरूप, हे विशाखा-महरानि ।

मो कूँ अपुनी दासि कर, राखहु चरनन आनि ॥ ३७५ ॥

मैं अति दीन अनाथ हूँ, तुम हो दया-निधान ।

अपुने अंचल-छाँह में, राखहु मोहिं सुजान ॥ ३७६ ॥

ज्यों बालक निज मातु को, पकरैं अंचल-छोर ।

त्यों मोरी हियरा सखि, धावत तुमरी ओर ॥ ३७७ ॥

सुन्दर तुमरे रूप पै, वारूँ सगरो ग्यान ।

तुमरी छवि अति माधुरी, परम सुकुँवारि सुजान ॥ ३७८ ॥

नील-बसन धारे सखि, राधा-सम-रूप-भास ।

तुम कूँ लखि सुख पावतौ, मिटत हिये को त्रास ॥ ३७९ ॥

हे विशाखा-महरानि जू, मोरी सुनहु पुकार ।

जनम जनम मैं दासि ह्वै, रहूँ तुमारे द्वार ॥ ३८० ॥

हाथ जोरि बिनती करूँ, सीस चरन पै धारि ।

मोहिं अपुनी करि राखिहु, जाऊँ मैं बलिहारि ॥ ३८१ ॥

मोहिं पढ़ावहु प्रेम-रस, जुगल-भजन की रीत ।

तुमरी सिक्षा-ग्यान सों, उपजै हिय में प्रीत ॥ ३८२ ॥

गुरु-चरनन को आसरो, मोरो एक अधार ।

विशाखा-गुरु-माय तुम, तारहु भव-संसार ॥ ३८३ ॥

कछू न मो कूँ चाहिए, कछू न मोरो प्रान ।

एक जु तुमरी कृपा बस, चाहत है यह अजान ॥ ३८४ ॥

सुकरि-कृपा हे स्वामिनी, मोहिं न तजियहु माय ।

सदा सर्वदा के लिये, अपुनी लेहु बनाय ॥ ३८५ ॥

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▲ 5 r/yugala

अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ (Acintyabhedābheda-Rākāratattva-Mahāstotram)

जय विश्वेश्वरि राज्ञि श्रीशक्तीश्वरि ते नमः ।

ललितादेवि माहात्म्यं तव वन्दे महेश्वरि ॥ ८७१।९३० ॥

त्रिशतं चैकादशकं राकेन्दुवदना तथा ।

त्रिशतं द्वादशं नाम रतिरूपा नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।९३१ ॥

त्रिशतं च त्रयोदशं रतिप्रिया महेश्वरि ।

चतुर्दशाधिकं नाम त्रिशतं वै रक्षाकरी ॥ ८७१।९३२ ॥

अन्तर्बहिः-शत्रुभ्यो मां रक्ष रक्ष हि राधिके ।

पञ्चदशाधिकं नाम त्रिशतं राक्षसघ्नी च ॥ ८७१।९३३ ॥

षोडशाधिक-त्रिशतं रामा त्वं हि प्रकीर्तिता ।

महान् श्रीरामचन्द्रो वै त्वमेवासि महेश्वरि ॥ ८७१।९३४ ॥

तव नामाद्यवर्णस्य रा-कारस्य स्वरूपकः ।

श्रीमान् हनूमान् भक्ताग्र्यः राम रामेति गायति ॥ ८७१।९३५ ॥

युवाभ्यां हि समाकृष्टो राधिके स कपीश्वरः ।

वशीकरणाकर्षण-रूपं तव हि नाम तत् ॥ ८७१।९३६ ॥

सर्वान् आकर्षयत्येव तव नाम महेश्वरि ।

यथा प्राह हरिः कृष्णः रा-शब्देन विमुच्यते ॥ ८७१।९३७ ॥

धा-कारमुच्चरेद् यस्तु कृष्णस्तमनुधावति ।

अतस्ते पादपद्मेषु नमामि राधिके प्रिये ॥ ८७१।९३८ ॥

रामा-नाम्नि च रा-कारो राधा मा-माधवो भवेत् ।

एतदेव हि माहात्म्यं नाम्नस्ते विश्वशासिके ॥ ८७१।९३९ ॥

यत्र यत्र हि रा-कारः तत्र तत्र त्वमेव हि ।

कृपारूपा कारुण्या च सर्वशब्देषु संस्थिता ॥ ८७१।९४० ॥

अतस्ते पादपद्मेषु पवित्रेषु नमाम्यहम् ।

सर्वदा सर्वकालेषु प्रणमामि महेश्वरि ॥ ८७१।९४१ ॥

त्रिशतं सप्तदशकं रमणलम्पटा भवेत् ।

महान् कृष्णस्त्वमेवासि श्यामसुन्दरि ते नमः ॥ ८७१।९४२ ॥

अष्टादशाधिकं नाम त्रिशतं काम्या कीर्तिता ।

सर्वेषामेव भक्तानां परमं लक्ष्यमेव त्वम् ॥ ८७१।९४३ ॥

एकोनविंशत्यधिकं त्रिशतं नाम ते शुभे ।

कामकलारूपा त्वं वै परमा वासना त्वं हि ॥ ८७१।९४४ ॥

सर्वं सृष्टं त्वया देवि जगदेतच्चराचरम् ।

अतस्ते पादपद्मेषु पवित्रेषु नमाम्यहम् ॥ ८७१।९४५ ॥

विंशत्यधिक-त्रिशतं कदम्बकुसुमप्रिया ।

एकविंशत्यधिकं वै कल्याणीति प्रकीर्तिता ॥ ८७१।९४६ ॥

द्वाविंशत्यधिकं नाम त्रिशतं जगतीकन्दा ।

सर्वकारणकारण- स्वरूपा त्वं महेश्वरि ॥ ८७१।९४७ ॥

त्रयोविंशत्यधिकं च त्रिशतं ते महेश्वरि ।

करुणारससागरा नामेदं मेऽतिवल्लभम् ॥ ८७१।९४८ ॥

पादयोस्ते लुठाम्यद्य कृपाराज्ञि नमोऽस्तु ते ।

कृपाम्बुधौ तव मातः स्नातुं देहि महेश्वरि ॥ ८७१।९४९ ॥

मां दयस्व महादेवि प्रणतामस्मि राधिके ।

चतुर्विंशत्यधिकं वै त्रिशतं च कलालापा ॥ ८७१।९५० ॥

पवित्रं तव नादं च श्रोतुमिच्छामि राधिके ।

महागुह्यं सुमधुरं तव नादं महेश्वरि ॥ ८७१।९५१ ॥

आज्ञापयसि यदा त्वं तदापि मधुरो ध्वनिः ।

श्रोतुं न श्राम्यते नित्यं पादयोस्ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।९५२ ॥

तव नादस्य दासीयं प्रणता राधारानिके ।

पञ्चविंशत्यधिकं च त्रिशतं कान्तसंज्ञकम् ॥ ८७१।९५३ ॥

सर्वान् आकर्षयस्येव मोहयन्ती स्वकान्तितः ।

विश्वराज्ञि महादेवि श्रीकृष्णप्रेयसी सदा ॥ ८७१।९५४ ॥

षड्विंशत्यधिकं नाम त्रिशतं वै प्रकीर्तितम् ।

कादम्बरीप्रिया त्वं वै मां मोचय महेश्वरि ॥ ८७१।९५५ ॥

प्रकाशय जगद्राज्ञि त्वामहं कामये भृशम् ।

सप्तविंशत्यधिकं च त्रिशतं वरदा भवेत् ॥ ८७१।९५६ ॥

अष्टाविंशत्यधिकं च त्रिशतं वामनयना ।

तव नेत्रे महादेवि राधिकेऽहं भजामि च ॥ ८७१।९५७ ॥

एकोनत्रिंशदधिकं त्रिशतं नाम ते शुभे ।

वारुणीमदविह्वला त्वमेव हि महेश्वरि ॥ ८७१।९५८ ॥

शाश्वती ह्लादिनीशक्तिस् त्वत्त एव प्रसूयते ।

त्वं महानन्दस्वरूपा महाभावा नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।९५९ ॥

महारासा महारतिर् महासोमा महेश्वरि ।

महारामा महाराका राधिके ते नमामि च ॥ ८७१।९६० ॥

पद्माक्षि विश्वराज्ञि त्वं पादयोस्ते नमाम्यहम् ।

सर्वदा सर्वकालेषु तव दासी नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।९६१ ॥

त्रिंशदधिक-त्रिशतं विश्वाधिकेति तेऽभिधा ।

मन्दबुद्धिर्महादेवि दासी त्वां नावगच्छति ॥ ८७१।९६२ ॥

राधा-तत्त्वातीता त्वं वै सर्वसत्तातिवर्तिनी ।

निश्चितानां च तत्त्वानां परतोऽसि महेश्वरि ॥ ८७१।९६३ ॥

अनन्तानि च तत्त्वानि तवापि सन्ति राधिके ।

अनन्ततत्त्वरूपाणाम् अतीता त्वं ह्यनन्तशः ॥ ८७१।९६४ ॥

दासी मदृशी माहात्म्यं बोद्धुं नैव हि शक्नोति ।

कथं सृष्टं जगत् सर्वं कथं पासि न वेद्म्यहम् ॥ ८७१।९६५ ॥

अतितीव्रमिदं ज्ञानं दास्याः कृते महेश्वरि ।

पादयोस्ते सदा वासो दास्याः सेवा हि केवला ॥ ८७१।९६६ ॥

पुष्पाणां चयनं मातः सेवां जानामि केवलम् ।

जगत्-पालन-विज्ञानं न जानामि कदाचन ॥ ८७१।९६७ ॥

तव पाद-लग्ना ह्यस्मि क्षुद्रा धूलिकणिकाऽहम् ।

कथं हि धूलिका मातः बोद्धुं शक्नोति ते बलम् ॥ ८७१।९६८ ॥

अनन्त-विस्तृता या वै कोटि-रूप-धरा तथा ।

सर्वशक्ताश्च ताः सर्वाः राधिका-रूप-धारिणीः ॥ ८७१।९६९ ॥

राधारानी-स्वरूपा वै एका चेतना ते शुभे ।

सृजस्यनन्त-विश्वानि ह्यष्टाष्टाष्टक-कोटितः ॥ ८७१।९७० ॥

सृजस्यनन्त-ब्रह्माणो भक्तान् पश्यसि सर्वतः ।

रक्षसि दयसे चैव युगपत् सर्व-कालिका ॥ ८७१।९७१ ॥

एकां दासीं त्रायसे त्वं ह्यन्यां चानुगृह्णासि वै ।

एकाकिनीव प्रत्येकम् भाषसे त्वं स्वदासिभिः ॥ ८७१।९७२ ॥

रासलीला-महोत्सवे कृष्णो गोपी-समं यथा ।

विस्तारयति चात्मानं तथा त्वं कुरुषे प्रिये ॥ ८७१।९७३ ॥

सर्व-जीवान्तरे मातः सर्वं पश्यसि वै सदा ।

कथं चलन्ति श्वसन्ति चिन्तयन्ति च युगपत् ॥ ८७१।९७४ ॥

सर्वस्मादधिका चेता तव विश्वमतीत्य च ।

जगतो नियमांश्चैव वैकुण्ठस्य च सर्वदा ॥ ८७१।९७५ ॥

नित्यतायाः परतोऽसि सर्वसत्तातिवर्तिनी ।

सर्वकारण-कारणं विश्वस्रष्ट्री महेश्वरि ॥ ८७१।९७६ ॥

नेत्रोन्मीलनेन तव ह्यनन्त-ब्रह्म-सर्जना ।

निमीलनेन नेत्रस्य तेषां मृत्युर्भवत्यपि ॥ ८७१।९७७ ॥

सर्वशक्तिमती त्वं हि यथेच्छसि तथा कुरु ।

विश्वराज्ञी जगत्-स्रष्ट्री मूल-कारण-कारणम् ॥ ८७१।९७८ ॥

सर्वेषां देवदेवानां त्वमेव परमेश्वरि ।

ब्रह्म-शिव-नारदाद्यैः शुकदेव-मुनीश्वरैः ॥ ८७१।९७९ ॥

पूजितासि महादेवि वेदा गायन्ति ते यशः ।

अतस्ते पादपद्मेषु प्रणमामि महेश्वरि ॥ ८७१।९८० ॥

सर्वशक्तिमयी राधे ठाकुराणीति कीर्तिता ।

सर्वविश्व-नियन्त्री त्वं जगत्स्रष्ट्री नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।९८१ ॥

एकत्रिंशदधिकं वै त्रिशतं वेदवेद्यका ।

वेदविज्ञानविज्ञात्री वेदानां मूलमेव च ॥ ८७१।९८२ ॥

राधिका त्वं विश्वराज्ञी वेदविद्यामहीश्वरी ।

ऋग्यजुःसामवेदाश्च ह्यथर्वश्च त्वदुद्भवाः ॥ ८७१।९८३ ॥

उपनिषत्पुराणानि शास्त्राणि त्वत्त एव च ।

प्रभवन्ति महादेवि पादयोस्ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।९८४ ॥

वेदपुराणलक्ष्यं त्वं ज्ञानविश्वपरा गतिः ।

त्वत्तः सर्वं प्रभवति त्वयि सर्वं प्रलीयते ॥ ८७१।९८५ ॥

विश्वमातर् नमोऽस्तु ते पादपद्मे नमाम्यहम् ।

द्वात्रिंशदधिकं नाम त्रिशतं परिकीर्तितम् ॥ ८७१।९८६ ॥

विन्ध्याचलनिवासिनी महाशक्तिस्वरूपिणी ।

सर्वविश्वस्य केन्द्रं त्वं धुरीरूपा महेश्वरि ॥ ८७१।९८७ ॥

सूर्यं प्रदक्षिणीकृत्य भ्रमन्ति हि ग्रहा यथा ।

आकाशगङ्गां च रविर् ब्रह्माण्डं च तथा पुनः ॥ ८७१।९८८ ॥

आकाशगङ्गा ब्रह्माण्ड- मध्ये भ्रमति सर्वदा ।

अनन्तकोटिब्रह्माण्ड- मध्ये ब्रह्माण्डमेव च ॥ ८७१।९८९ ॥

केन्द्रं प्रदक्षिणीकृत्य भ्रमति हि महेश्वरि ।

तथा सर्वं जगद्राज्ञि परितस्त्वां भ्रमत्यहो ॥ ८७१।९९० ॥

त्रयस्त्रिंशदधिकं च त्रिशतं ते महेश्वरि ।

विधात्रीति च ते नाम विश्वशिल्पकरि प्रिये ॥ ८७१।९९१ ॥

ब्रह्मणे चेतनां ज्ञानं प्रज्ञां त्वं यच्छसि स्वयम् ।

भाग्यलेखनकर्त्री त्वं नियतेर्निर्धारिका ॥ ८७१।९९२ ॥

सर्वविश्वेश्वरी त्वं वै पादयोस्ते नमाम्यहम् ।

चतुस्त्रिंशदधिकं च त्रिशतं नाम ते शुभे ॥ ८७१।९९३ ॥

वेदजननी त्वं देवि वेदज्ञानं पवित्रकम् ।

पञ्चत्रिंशदधिकं च त्रिशतं विष्णुमायिका ॥ ८७१।९९४ ॥

महायोगमयी त्वं हि ललिते सखि राधिके ।

मूर्खेभ्यो ज्ञानहीनेभ्यो ह्यात्मानं गोपयस्यहो ॥ ८७१।९९५ ॥

राधिका त्वं च मूर्खेभ्यो ह्यधर्मिभ्यो निजं यशः ।

गोपयथो महिमानं ये न जानन्ति किञ्चन ॥ ८७१।९९६ ॥

ते न जानन्ति मूढा वै ललितां त्वां महेश्वरीम् ।

त्वयि राधारान्यां च भेदो नास्ति कदाचन ॥ ८७१।९९७ ॥

अष्टसख्यस्तथा सर्वा राधिकैव न संशयः ।

तटसख्यस्तथा सर्वा राधिकैव प्रकीर्तिताः ॥ ८७१।९९८ ॥

सर्वगोप्यस्तथा देवि राधिकैव महेश्वरि ।

अचिन्त्यभेदाभेदोऽयम् सिद्धान्तो वै प्रकीर्तितः ॥ ८७१।९९९ ॥

श्रीकृष्णचैतन्यदेवो यं घोषयति सर्वदा ।

पवित्रसत्यमेतद् वै त्वं राधा चैकरूपिणी ॥ ८७१।१००० ॥

मायामात्रावृतो यो वै पश्यति भिन्नरूपकम् ।

वृन्दावने यथा त्वं वै ललितेति प्रकीर्तिता ॥ ८७१।१००१ ॥

द्वारकायां तथा देवि सत्यभामेति गीयसे ।

ठाकुराणी च या राधा वृन्दावने प्रकीर्तिता ॥ ८७१।१००२ ॥

द्वारकायां तथा सा वै रुक्मिणीति प्रगीयते ।

अतस्ते पादपद्मेषु प्रणमामि महेश्वरि ॥ ८७१।१००३ ॥

ललिते सखि माहात्म्यं भण्डासुरविनाशिनि ।

मम चित्तं प्रकाशय पादयोस्ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।१००४ ॥

षट्त्रिंशदधिकं नाम त्रिशतं ते विलासिनी ।

सप्तत्रिंशदधिकं च नाम क्षेत्रस्वरूपा ते ॥ ८७१।१००५ ॥

अष्टात्रिंशदधिकं च त्रिशतं क्षेत्रेशी तथा ।

त्रिशतमेकोनचत्वारिंशन्नाम प्रकीर्तितम् ॥ ८७१।१००६ ॥

क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनि मां रक्ष मां विमोचय ।

चत्वारिंशदधिकं वै त्रिशतं नाम ते प्रिये ॥ ८७१।१००७ ॥

क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता सर्वसत्तोर्ध्वरूपिणी ।

त्रिशतैकचत्वारिंशत् क्षेत्रपालसमर्चिता ॥ ८७१।१००८ ॥

त्रिशतं द्व्यधिकं चैव चत्वारिंशत्तमं शुभे ।

नाम ते विजया देवि पवित्रा विजया ह्यसि ॥ ८७१।१००९ ॥

हनुमतो महाशौर्यं बलं त्वमेव राधिके ।

अर्जुनस्य तथा शौर्यं समरेषु च सर्वदा ॥ ८७१।१०१० ॥

सर्वयुद्धेषु कृष्णस्य विजयस्त्वं स्वरूपिणी ।

कृष्णस्य परमा शक्ति- स्त्वमेव परमेश्वरि ॥ ८७१।१०११ ॥

त्वमेव सर्वदेवानां विजयस्य प्रदायिनी ।

जगद्राज्ञि नमस्तुभ्यं पादयोस्ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।१०१२ ॥

त्रिशतं त्रिचत्वारिंशत् विमला नाम ते शुभे ।

चतुश्चत्वारिंशद्युक्तं वन्द्या नाम त्रिशतकम् ॥ ८७१।१०१३ ॥

तस्मात्ते पादयोर्नित्यं नमामि जगदीश्वरि ।

राधिके महती राज्ञि वन्द्या त्वं परमेश्वरि ॥ ८७१।१०१४ ॥

त्रिशतं पञ्चसंयुक्त- चत्वारिंशत् प्रकीर्तितम् ।

वन्दारुजनवत्सला नाम ते परमेश्वरि ॥ ८७१।१०१५ ॥

पादाश्रिते रजोबिन्दौ दयां कुरु जगत्प्रभे ।

दासी क्षुद्रास्मि दीनास्मि मन्दबुद्धिर्हि राधिके ॥ ८७१।१०१६ ॥

तव कृपां विना देवि न जीवामि महाप्रभे ।

त्रिशतं षट्चत्वारिंश- न्नाम वाग्वादिनीति ते ॥ ८७१।१०१७ ॥

सर्वासां वाचिकानां च मन्त्राणां मूलरूपिणी ।

वेदानां चैव शास्त्राणां तन्त्राणां त्वं हि कारणम् ॥ ८७१।१०१८ ॥

आगमानां निगमानां संवादानां तथैव च ।

इतिहासादिग्रन्थानां पुराणानां प्रसूतिर्हि ॥ ८७१।१०१९ ॥

सत्यस्य परमं मूलं सत्यवाक् त्वं स्वरूपिणी ।

कम्पयन्ती महासत्यं मिथ्यानाशकरी तथा ॥ ८७१।१०२० ॥

सर्वजीवाभिव्यक्तीनां कारणी त्वं हि सर्वदा ।

पवित्रोच्चारणं त्वं हि ललिते परदेवते ॥ ८७१।१०२१ ॥

तस्मात्ते पादपद्मेषु नमामि नतमस्तका ।

सप्तचत्वारिंशद्युक्तं त्रिशतं वामकेशी ते ॥ ८७१।१०२२ ॥

अष्टचत्वारिंशद्युक्त- त्रिशतं नाम ते शुभे ।

वह्निमण्डलवासिनी तस्मात् त्वां प्रणमाम्यहम् ॥ ८७१।१०२३ ॥

एकोनपञ्चाशद्युक्तं त्रिशतं ते महेश्वरि ।

भक्तिमत्कल्पलतिका नाम ते परिकीर्तितम् ॥ ८७१।१०२४ ॥

पञ्चाशदधिकं चैव त्रिशतं परिकीर्तितम् ।

पशुपाशविमोचिनी नाम ते राधिके शुभे ॥ ८७१।१०२५ ॥

तस्मात् कामादिदोषेभ्यो मोचयस्व जगत्प्रिये ।

विश्वस्य जगतो राज्ञि राधिके मां विमोचय ॥ ८७१।१०२६ ॥

एकपञ्चाशदधिकं त्रिशतं नाम ते शुभे ।

संहृताशेषपाषण्डा नाम ते परमेश्वरि ॥ ८७१।१०२७ ॥

तस्मात्ते पादयोर्नित्यं नमामि भक्तवत्सले ।

सत्यधर्मस्वरूपिण्यै तुभ्यं नित्यं नमो नमः ॥ ८७१।१०२८ ॥

त्रिशतं द्विपञ्चाशच्च सदाचारप्रवर्तिका ।

त्रिपञ्चाशच्च त्रिशतं तापत्रयाग्निसन्तप्त- ॥ ८७१।१०२९ ॥

समाह्लादनचन्द्रिका नाम ते राधिके शुभे ।

कृपासागरमध्ये मां निमज्जय महाप्रभे ॥ ८७१।१०३० ॥

त्रिशतं चतुःपञ्चाशत् तरुणी नाम ते शुभे ।

पञ्चपञ्चाशदधिकं तापसाराध्यनामिका ॥ ८७१।१०३१ ॥

तस्मात् त्वां साधने नित्यं स्मरामि जगदीश्वरि ।

त्रिशतं षट्पञ्चाशच्च तनुमध्या प्रकीर्तिता ॥ ८७१।१०३२ ॥

सप्तपञ्चाशदधिकं त्रिशतं च तमोऽपहा ।

अज्ञानं मे विनाश्याशु संसारान्मां विमोचय ॥ ८७१।१०३३ ॥

अष्टपञ्चाशदधिकं त्रिशतं ते महेश्वरि ।

चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था नाम ते राधिके शुभे ॥ ८७१।१०३४ ॥

सर्वसत्तामूलरूपा सृष्टेर्मूलं त्वमेव हि ।

विश्वस्य स्रष्ट्री त्वमेव राधिके परमेश्वरि ॥ ८७१।१०३५ ॥

षष्ट्यधिकं त्रिशतं च चिदेकरसरूपिणी ।

पादरजोमयं देहं कुरु मे जगदीश्वरि ॥ ८७१।१०३६ ॥

एकषष्ट्यधिकं चैव त्रिशतं नाम ते शुभे ।

स्वात्मानन्दलवीभूत- ब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः ॥ ८७१।१०३७ ॥

तस्मान्मन्दमतिं दासीं शाश्वतानन्दसागरे ।

मज्जय जगतां राज्ञि राधिके करुणामयि ॥ ८७१।१०३८ ॥ 

त्रिशतं द्विषष्टियुक्तं परा नाम ते कीर्तितम् ।

सर्वसत्तामतीता त्वं विद्यसे परमेश्वरि ॥ ८७१।१०३९ ॥

त्रिशतं त्रिषष्टियुक्तं प्रत्यक्चितीरूपा च ते ।

सर्वभूतस्थिता देवि साक्षिणी सर्वदर्शिनी ॥ ८७१।१०४० ॥

त्रिशतं चतुःषष्टिश्च पश्यन्ती नाम ते शुभे ।

सर्वर्षीणां महामूलं पञ्चषष्टिश्च त्रिशतम् ॥ ८७१।१०४१ ॥

परदेवता नाम हि सर्वदेवैः प्रपूजिता ।

त्रिशतं षट्षष्टियुक्तं मध्यमा नाम ते शुभे ॥ ८७१।१०४२ ॥

सप्तषष्ट्यधिकं चैव त्रिशतं वैखरीरूपा ।

त्वमेव वेदस्वरूपा आगमा निगमास्तथा ॥ ८७१।१०४३ ॥

अष्टषष्ट्यधिकं चैव त्रिशतं नाम ते शुभे ।

भक्तमानसहंसिका तस्मात् पादौ नमाम्यहम् ॥ ८७१।१०४४ ॥

एकोनसप्ततियुक्तं त्रिशतं नाम ते शुभे ।

कामेश्वरप्राणनाडी त्रिशतं सप्ततिस्तथा ॥ ८७१।१०४५ ॥

कृतज्ञा नाम ते राज्ञि त्वां स्निह्यामि महाप्रिये ।

पादयोस्ते विलीनास्मि राज्ञि विश्वस्य राधिके ॥ ८७१।१०४६ ॥

एकसप्ततियुक्तं च त्रिशतं कामपूजिता ।

त्वमेव परमं लक्ष्यं तस्मान्नित्यं नमाम्यहम् ॥ ८७१।१०४७ ॥

त्रिशतं द्विसप्ततिश्च शृङ्गाररससम्पूर्णा ।

स्निह्यामि त्वां भजामि त्वां प्रेम्णो राज्ञि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।१०४८ ॥

त्रिसप्तत्यधिकं चैव त्रिशतं नाम ते जया ।

चतुःसप्ततियुक्तं च जालन्धरस्थिता शुभे ॥ ८७१।१०४९ ॥

त्रिशतं पञ्चसप्तत्या ह्योड्याणपीठनिलया ।

रासलीलास्वरूपिणी नाम ते परमेश्वरि ॥ ८७१।१०५० ॥

षट्सप्तत्यधिकं चैव त्रिशतं बिन्दुमण्डल- ।

वासिनी नाम ते राज्ञि त्रिशतं सप्तसप्ततिः ॥ ८७१।१०५१ ॥

रहोयागक्रमाराध्या गुह्यानां गुह्यरूपिणी ।

परमं पावनं त्वं हि नमामि राधिके पदे ॥ ८७१।१०५२ ॥

अष्टसप्ततियुक्तं च रहस्तर्पणतर्पिता ।

एकोनाशीतियुक्तं च सद्यःप्रसादिनीति ते ॥ ८७१।१०५३ ॥

भक्तानां सर्वपापानि क्षमस्व जगदीश्वरि ।

वृन्दावनं प्रवेश्यैतान् कृपां कुरु जगत्प्रभे ॥ ८७१।१०५४ ॥

अशीत्यधिकमेवात्र त्रिशतं नाम ते शुभे ।

विश्वसाक्षिणि स्रष्ट्री त्वं मातर्मूलं त्वमेव हि ॥ ८७१।१०५५ ॥

त्रिशतमेकाशीतिश्च साक्षिवर्जिता नाम ते ।

एकाकिनी हि साक्षी त्वं न ते साक्षी जगत्त्रये ॥ ८७१।१०५६ ॥

सर्वसत्तामतीता त्वं सर्वधर्मोपरि स्थिता ।

नियमानां विधात्री त्वं सत्यासत्यप्रदर्शिनी ॥ ८७१।१०५७ ॥

पुण्यपापविनिर्मुक्ता विश्वस्य राज्ञि ईश्वरि ।

महतां च महादेवि त्वत्तो जातं जगत् सर्वम् ॥ ८७१।१०५८ ॥

त्वय्येव लीयते सर्वं महासाक्षिणि ते नमः ।

पवित्रे पादयोर्नित्यं प्रणमामि नतशिरः ॥ ८७१।१०५९ ॥

त्रिशतं द्व्यशीतियुक्तं षडङ्गदेवतायुता । त्र्यशीत्यधिकमेवात्र षाड्गुण्यपरिपूरिता ॥ ८७१।१०६० ॥

चतुरशीतियुक्तं च नित्यक्लिन्ना त्रिशतकम् । कृपां कुरु मयि राज्ञि विश्वस्य परमेश्वरि ॥ ८७१।१०६१ ॥

त्रिशतं पञ्चाशीतिश्च निरुपमा प्रकीर्तिता । सर्वसत्तामूलरूपा गोपालसुन्दरि प्रभे ॥ ८७१।१०६२ ॥

षडशीत्यधिकं चैव निर्वाणसुखदायिनी । सप्ताशीतियुतं चैव नित्याषोडशिकारूपा ॥ ८७१।१०६३ ॥

अष्टाशीतियुतं नाम श्रीकण्ठार्धशरीरिणी । शिवनाथस्य पत्नि त्वं पार्वति त्वां नमाम्यहम् ॥ ८७१।१०६४ ॥

एकोननवतीयुक्तं त्रिशतं च प्रभावती । महाब्रह्मणो मूलं त्वं तदाधारस्वरूपिणी ॥ ८७१।१०६५ ॥

तव देहात् परं ब्रह्म निर्गच्छति जगत्प्रभे । त्रिशतं नवतियुक्तं प्रभारूपा प्रकीर्तिता ॥ ८७१।१०६६ ॥

एकनवतियुक्तं च प्रसिद्धा नाम ते शुभे । द्विनवतियुतं चैव परमेश्वरी राधिके ॥ ८७१।१०६७ ॥

त्रिशतं त्रिनवत्या च मूलप्रकृतिरव्यक्ता । सर्वसत्तामूलरूपा सर्वसृष्टेस्तु कारणम् ॥ ८७१।१०६८ ॥

विश्वस्य स्रष्ट्री त्वमेव नारीशक्तिस्वरूपिणी । सृष्टं जगत् त्वया सर्वं तस्मात् पादौ नमाम्यहम् ॥ ८७१।१०६९ ॥

अनन्तकोटिविश्वानां राज्ञि स्रष्ट्रि नमोऽस्तु ते । चतुर्नवत्यधिकं च त्रिशतं नाम ते शुभे ॥ ८७१।१०७० ॥

व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी राज्ञि विश्वस्य राधिके । मन्दबुद्धिर्दीनदासी दरिद्रा न कदाचन ॥ ८७१।१०७१ ॥

तव माहात्म्यमखिलं ज्ञातुं शक्नोति सर्वदा । किन्तु ते कृपया देवि पश्यामि ह्यंशमात्रकम् ॥ ८७१।१०७२ ॥

पवित्रं ते महत्त्वं च स्रष्ट्रि विश्वस्य सर्वदा । तस्मात्ते पादपद्मेषु प्रणमामि जगत्प्रभे ॥ ८७१।१०७३ ॥

पञ्चनवत्यधिकं च त्रिशतं व्यापिनी तथा ।

त्रिशतं षण्णवतिश्च विविधाकारा राधिके ॥ ८७१।१०७४ ॥

सर्वसत्तामूलरूपा सर्वान्तर्बहिरेव च ।

सर्वं वेष्टयसे राज्ञि सर्वं त्वमेव राधिके ॥ ८७१।१०७५ ॥

तस्मात् ते पादपद्मेषु प्रणमामि जगत्प्रभे ।

त्रिशतं षण्णवतिश्च विद्याविद्यास्वरूपिणी ॥ ८७१।१०७६ ॥

परमसत्यरूपा त्वं योगमाया महामाया ।

सप्तनवत्यधिकं च त्रिशतं नाम ते शुभे ॥ ८७१।१०७७ ॥

महाकामेशनयन- कुमुदाह्लादकौमुदी ।

अष्टनवत्यधिकं च त्रिशतं ते महेश्वरि ॥ ८७१।१०७८ ॥

भक्तहार्दतमोभेद- भानुमद्भानुसन्ततिः ।

त्रिशतं नवनवतिः शिवदूतीति नाम ते ॥ ८७१।१०७९ ॥

श्रीशिवस्य महादूती त्वमेव परमेश्वरि ।

चतुःशतं शिवाराध्या यतः शिवेन पूजिता ॥ ८७१।१०८० ॥

सदा त्वय्यनुरक्तोऽसौ प्रणयाविष्टमानसः ।

चतुःशतमेकयुक्तं शिवमूर्तिर्हि राधिके ॥ ८७१।१०८१ ॥

यतः श्रीशिवरूपा त्वं साक्षान्मूर्तिः शिवस्य हि ।

चतुःशतं द्वियुक्तं च शिवङ्करी प्रकीर्तिता ॥ ८७१।१०८२ ॥

त्रियुक्तं च चतुःशतं शिवप्रिया महेश्वरि ।

चतुर्युक्तं चतुःशतं शिवपरा तथा नाम ॥ ८७१।१०८३ ॥

चतुःशतं पञ्चयुक्तं शिष्टेष्टा नाम राधिके ।

चतुःशतं षड्युक्तं च शिष्टपूजिता नाम ते ॥ ८७१।१०८४ ॥

चतुःशतं सप्तयुक्त- मप्रमेया प्रकीर्तिता ।

मद्विधा दीनदासी ते महिमानं न वेत्ति हि ॥ ८७१।१०८५ ॥

विश्वराज्ञि महादेवि तस्मात्ते चरणाम्भोजम् ।

प्रणमामि नतशिरः सदाहं परमेश्वरि ॥ ८७१।१०८६ ॥

u/Initial_Fold_420 — 28 days ago
▲ 3 r/yugala

10,00,08,88 Petals for Goloka Dham

Since this sadhana is immense and lifelong—taking at least 20 years to complete—I will organize it into sections.

Every 50,000 shlokas will constitute a volume, and I will upload each volume to the Internet Archive so it is accessible to everyone. The division will be structured as follows:

For Shree Radha Tatvatita Dhara and Shree Radha Ramana Tatvatita Dhara, the volumes will be titled:

* Mallika Dala 1

* Mallika Dala 2

and so forth.

As for the book Shree Ashta Sakhi Nitya Prematarini, it will be:

* Tulasi Dala 1

* Tulasi Dala 2

and so forth.

This entire sadhana belongs to all of you. Anyone is free to quote, utilize, and share everything I write; you have the full right to do so, as this sadhana stands in all of your names. I am merely a conduit and a servant at the feet of you all. Once again, I beg Shrimati Radhe Rani to bestow all the fruits of this sadhana upon everyone except me. I desire nothing for myself, and I will disappear once everything is completed. At that moment, I will only wait for Shree Krishna to come and take me to Goloka Dham—purely out of His causeless mercy and grace upon me, nothing more.

A Crucial Note:

It is strictly prohibited to exploit this sadhana financially, commercially, or for any material gain.

I reiterate once more, for it is of vital importance: I will never reveal myself publicly. In the future, if anyone claims to be the author, do not believe them. I seek no glory for myself, nor do I write for any personal gain. Even this sadhana, I offer entirely to you all, because I write solely out of pure love, devotion, and adoration for Shree Shree Radhika-Krishna. I seek no fruits whatsoever.

O my Lord Krishna, please forgive me, for I am merely an insignificant, wretched little worm. I stand in desperate need of Your mercy and the mercy of Your devotees, O Shree Krishna.

u/Initial_Fold_420 — 29 days ago
▲ 7 r/brajdham+1 crossposts

॥ अथ श्रीराधारमणतत्त्वातीतधारा वंशीनागिनीनर्तन नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥( Mere priya Krishna mujhe naagin ki bhaanti apne vash mein rakhte hain).

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मधुर मधुर धुनि बाँसुरी, आवत मोरे कान ।

मोरे मन वश करत है, को यह छैल सुजान ॥ १ ॥

हे विधि मो कूँ का भयो, कैसी यह सम्मोह ।

को मोहिं खेंचत आपु दिसि, उपज्यो कौन सनेह ॥ २ ॥

इतनी सुन्दर बाँसुरी, बाजत को यहि काल ।

जादू सो डारत सखी, को यह नटखट लाल ॥ ३ ॥

चन्दा पूरनमासि को, लाल बरन नभ-माँहिं ।

मेघ घिरे हैं गगन में, सोहत सुन्दर छाँहिं ॥ ४ ॥

रिमझिम रिमझिम बरसतौ, कारे बदरा आय ।

शीतल मन्द सुगन्धितौ, पवन रही बहुवाय ॥ ५ ॥

मुरली धुनि सुनिकै चली, कटि लचकावत नारि ।

नारि-लाज अरु भोर-पन, अंग अंग सुकुमारि ॥ ६ ॥

सुन्दर सारी धारि कै, डोलत मोरी देह ।

नागिनि ज्यों वश में भई, बाजत बीन सनेह ॥ ७ ॥

निज वश नाहीं मैं रही, सुधि-बुधि सब बिसराय ।

नागिनि ज्यों वंशी-शबद, सुनि सुनि कै लहराय ॥ ८ ॥

अगनित मोर अरु मृग सभी, सुनत मुरलिया-तान ।

दौरे आवत हैं तहाँ, बिसरि देह अरु प्रान ॥ ९ ॥

सकल जीव जन्तु विपिन के, मुग्ध भये तेहि ठौर ।

दौरत वंशी धुनि दिसा, भूलि गये सब और ॥ १० ॥

तरुवर गोपी-रूप धरि, सुन्दर नारि सुजान ।

दौरीं वंशी धुनि दिसा, तजि कै अपनो मान ॥ ११ ॥

केतिक तरु ऐसे प्रकट, फल उपजे ततकाल ।

तीव्र वृद्धि पावत अहो, कैसी लीला-जाल ॥ १२ ॥

जब पहुँची यमुना-तटै, गयो न मो पै रोकि ।

अद्भुत छबि मोरे नयन, रहे तहाँ अवलोकि ॥ १३ ॥

अति सुन्दर यह दृश्य मैं, जनम न देख्यो नैन ।

अद्भुत छबि यमुना-तटै, हरत प्रान अरु चैन ॥ १४ ॥

नागिनि ज्यों मोहित भई, सुनि कै वंशी-तान ।

हरि सों नैना लगि गये, बिसरि गयो निज भान ॥ १५ ॥

हे प्रभु मृग-सम नैन ये, अति सुन्दर मन-हारि ।

बंसी धुनि निठुर अहो, नागिनि डारी मारि ॥ १६ ॥

बंसी सुनिकै मैं नचूँ, रुकत न मोरे पाँव ।

चेरी ह्वै गई रावरी, बिसरयो अपनो गाँव ॥ १७ ॥

ज्यों गारुड़ी की बीन सों, नागिनि लेत फँसाय ।

त्यों ही बंसी तान सों, नचवत मोहिं नचाय ॥ १८ ॥

मन व्याकुल उपजी रती, हे कान्हा चित-चोर ।

वसुदेव के लाल जू, नैन विशाल सुघोर ॥ १९ ॥

बीर-छबीलो अंग है, तुम नर-केहरि श्याम ।

मो नागिनि सों का कियो, भई बावरी बाम ॥ २० ॥

सुधि-बुधि सगरी खोय कै, भई बावरी आज ।

बंसी धुनि अन्तर गड़ी, तजि कै सगरी लाज ॥ २१ ॥

कानन सों हिय में बसी, प्रानन महँ गई पैठि ।

रोम-रोम नस में रमी, मन-मन्दिर में बैठि ॥ २२ ॥

ऐसो सुख जीवन विषै, पायो कबहुँ नाय ।

मो नागिनि सों का कियो, कान्हा लेहु बताय ॥ २३ ॥

अति सुन्दर यह रूप छबि, सहि नहिं पावत प्रान ।

दीन हीन मैं नागिनी, सुनहुँ रसिक सुजान ॥ २४ ॥

नचती जाऊँ हे पिया, लखि तुमरो सिंगार ।

अति अनुराग हियैं भर्यो, मोरे प्रान-अधार ॥ २५ ॥

अंकवार भरि ना सकूँ, मैं अति हीन गँवारि ।

मो प्रभु राध्यामालति, दासी यहि बलिहारि ॥ २६ ॥

बंसी अरु सुन्दर छटा, रोकि न पाऊँ श्याम ।

तुमरे प्रेम-प्रवाह में, बही जात यह बाम ॥ २७ ॥

गहन बिपिन सों खेंचिकै, लाये यमुना-तीर ।

टोना कैसो डारियो, हे मन-मोहन बीर ॥ २८ ॥

मो दिनिया केहि विधि बचै, तुमरे टोना-जाल ।

बंसी सों नागिनि अहो, बचै कौन यहि काल ॥ २९ ॥

प्रेम मोद अरु लाज सों, नाचत मोरी देह ।

निज-वश नाहीं कछु रह्यो, बाढ्यो परम सनेह ॥ ३० ॥

ज्यों कामी जन कामिनी, ज्यों तिरिया निज पीय ।

त्यों कान्हा तुमरे लिये, तड़फत मेरो हीय ॥ ३१ ॥

तुमरी प्रीति-छाक पी, भई मतवारी आज ।

घूमत ह्वै कै बावरी, बिसरी सगरी लाज ॥ ३२ ॥

सुधि-बुधि सगरी बिसर कै, कटि लचकावत नारि ।

नैना तुम सों लगि गये, होय गई बलिहारि ॥ ३३ ॥

बंसी-वारे साँवरे, मो पै मोहिनि डारि ।

तुम जीवन तुम ही पिया, तुम ही प्रान-अधारि ॥ ३४ ॥

मो कूँ अपुने सँग लेहु, हे कान्हा चित-चोर ।

तुमरे ढिग बैठन चहूँ, चितवत तुमरी ओर ॥ ३५ ॥

अंकवार में लेहु पिय, मो कूँ अपुने पास ।

सगरो जग मैं भूलिहूँ, हे मोरे सुख-रास ॥ ३६ ॥

हे प्रभु तुमरी रूप छबि, अति सुन्दर अभिराम ।

अति सुन्दर बंसी बजै, मोहत आठहुँ याम ॥ ३७ ॥

मो अबला कूँ वश कियो, नागिनि रूप बनाय ।

बंसी धुनि पै नाचती, मोरी देह डुलाय ॥ ३८ ॥

मो पै करहु कृपा पिया, राखहु चरनन पास ।

राध्यामालति दासि की, पूरन करियहु आस ॥ ३९ ॥

हे राधापते देवेश जगन्नाथ जगत्पते ।

वंशीनादेन ते नाथ दग्धं मे हृदयं भृशम् ॥ ४० ॥

अखिलाण्ड-पते कृष्ण त्रैलोक्य-नाथ केशव ।

तव वंशी-रवः क्रूरः तापयत्येव मे मनः ॥ ४१ ॥

हृदयं दह्यते मेऽद्य श्रुत्वा वंशी-ध्वनिं तव ।

उन्मत्ताऽहं कृता नाथ हा हा किं मे भविष्यति ॥ ४२ ॥

उन्माद-ग्रस्ता जाताऽस्मि विक्षिप्ता नागिनी यथा ।

वंशी-नाद-प्रभावेण कान्तेयं हृत-चेतना ॥ ४३ ॥

नैषोऽन्धो जड-कामस्तु न च प्राकृत-लालसा ।

त्वदीया भवितुं नाथ वाञ्छैका मे निगूहिता ॥ ४४ ॥

न मे देह-रतिः कापि न मे भौतिक-कामना ।

तवैव भवितुं कृष्ण सुप्त-वाञ्छा प्रबुध्यते ॥ ४५ ॥

कान्ह हे कान्ह मे नाथ सर्वस्वं त्वां समर्पये ।

समर्पयामि मे प्राणान् जीवनं ते पदाम्बुजे ॥ ४६ ॥

दीयते जीवनं सर्वं तुभ्यं हे प्राण-वल्लभ ।

स्वीकुरुष्व मया दत्तं जीवनं प्रेम-लक्षणम् ॥ ४७ ॥

राध्यामालति-वशिन् हे स्तौमि त्वां सर्वदा विभो ।

अनन्त-कालं पर्यन्तं महिमा ते प्रगीयते ॥ ४८ ॥

राध्यामालति-मोह त्वां वन्देऽहं सर्वदा प्रिये ।

त्वां विना नहि मे किञ्चित् त्वमेव परमा गतिः ॥ ४९ ॥

राध्यामालत्य-आकर्षण त्वां भजामि मुहुर्मुहुः ।

त्वयैवानुरक्ताऽस्मि हे कृष्ण कमलायते ॥ ५० ॥

राध्यामालति-नाथ हे राध्यामालति-स्वामिन् हे ।

कमलाक्ष महा-बाहो त्वां भजामि निरन्तरम् ॥ ५१ ॥

राध्यामालति-उद्धार राध्यामालति-तारक ।

रक्षेमां दीनां दासीं त्वां स्निह्यामि कृपामय ॥ ५२ ॥

राध्यामालति-रक्षक त्वां स्निह्यामि जगत्पते ।

अतुल्यं प्रेम मे नाथ त्वयि तिष्ठति सर्वदा ॥ ५३ ॥

अति-प्रेम्णा भजामि त्वां ब्रह्माण्ड-नाथ केशव ।

जगतामीश्वर नाथ विश्व-नाथ नमोऽस्तु ते ॥ ५४ ॥

श्री-राधा-पतये तुभ्यं वृन्दावन-महीपते ।

वृन्दावन-महाराज्ञ्याः प्राण-नाथ नमोऽस्तु ते ॥ ५५ ॥

वृन्दावन-महाराज्ञी श्री-राधा प्रेम-रूपिणी ।

तस्याः प्राण-पते कृष्ण वृन्दावन-नृपेश्वर ॥ ५६ ॥

वृन्दावनस्य राजन् हे राधा-रमण सुन्दर ।

त्वां नमामि महा-प्रेम-मूर्तये परमात्मने ॥ ५७ ॥

द्वारकाधीश हे नाथ श्री-रुक्मिणी-पते विभो ।

द्वारका-रत्न हे कृष्ण रुक्मिणी-प्राण-वल्लभ ॥ ५८ ॥

हे राम सीतापते हे मर्यादा-पुरुषोत्तम ।

सीता-हृदय-नाथ त्वां नमामि रघुनन्दन ॥ ५९ ॥

नारायण जगन्नाथ लक्ष्मी-कान्त नमोऽस्तु ते ।

क्षीर-सागर-शायिन् हे लक्ष्मी-हृदय-वल्लभ ॥ ६० ॥

रुक्मिणी-सीता-लक्ष्मीनां पतिस्त्वं परमेश्वरः ।

महिमानं तवापारं को वा गातुं क्षमो भवेत् ॥ ६१ ॥

किं मां नालिङ्गसे नाथ किं कृपां न करोषि मे ।

मदृशीं दीनां दासीं किं न दयसे कृपामय ॥ ६२ ॥

अनाथां असहायां मां किं न पश्यसि माधव ।

आलिङ्ग्य मां कृपा-सिन्धो किं न रक्षसि मामिह ॥ ६३ ॥

मया सार्धं हे श्रीकृष्ण किं न नृत्यसि सुन्दर ।

नृत्यं कुरु मया सार्धं हे वंशी-वाद्य-पण्डित ॥ ६४ ॥

किं मां न हरसे कान्ह किं मां न नयसे प्रभु ।

वृन्दावनं महा-दिव्यं निज-धाम मनोहरम् ॥ ६५ ॥

मां नीत्वा निज-हस्तेन वृन्दावनं नयस्व किम् ।

अङ्के कृत्वा तु मां नाथ स्व-धाम किं न नेष्यसि ॥ ६६ ॥

तव पत्नी-परां दासीं किं न गृह्णासि सस्मितम् ।

प्रेम्णा नीत्वा निज-स्थानं किं न दर्शयसे छबिम् ॥ ६७ ॥

अति-सुन्दरीं पत्नीं ते महाराज्ञीं च राधिकाम् ।

किं न दर्शयसे नाथ त्वां च देवं मनोहरम् ॥ ६८ ॥

त्वं च श्री-राधिका-राज्ञी युगल-रूप-दर्शनम् ।

किं न दास्यसि मे नाथ दास्यै प्रेमातुरायै वै ॥ ६९ ॥

महाराज्ञीं राधिकां च त्वां च प्रेङ्खोल-संस्थितौ ।

किं न दर्शयसे नाथ झूलने झूलतौ युवाम् ॥ ७० ॥

महाराज्ञीं मदीयां तां श्री-राधां वृषभानुजाम् ।

त्वां च प्रेङ्खोल-मारूढौ द्रष्टुं वाञ्छामि माधव ॥ ७१ ॥

प्रेङ्खोलं चालयिष्यामि युवयोः सुख-हेतवे ।

वां प्रेम-सङ्गमं दिव्यं द्रष्टुं दासी कुतूहला ॥ ७२ ॥

युवयोः प्रेम-लीलां च सङ्गमं माधुरी-मयम् ।

प्रेङ्खोले संस्थितौ दृष्ट्वा कृतकृत्या भवाम्यहम् ॥ ७३ ॥

एक-तन्मयतौ प्रेम्णि दोला-रूढौ नमोऽस्तु वाम् ।

चालयन्ती दोलां तां पश्यामि प्रेम-सङ्गमम् ॥ ७४ ॥

अति-प्रेम-मयं दृश्यं दोला-विहार-रूपकम् ।

दृष्ट्वा त्वद्-दास्य-भावेन जीवामि हे जगत्पते ॥ ७५ ॥

महाराज्ञ्याः समीपे मां चरणाश्रितां कुरु ।

प्रेङ्खोलं चालयन्ती सा राध्यामालति-दास्यहो ॥ ७६ ॥

बंसी मधुर बजाव पिय, और और रस-खानि ।

छलिया तुमरी तान को, पीती रहूँ मैं आनि ॥ ७७ ॥

मो नागिनि कूँ नचवहु, हे रसिया सुजान ।

सुनि सुनि कै नाचत रहूँ, बाजत मुरली-तान ॥ ७८ ॥

और और मैं रसु पिऊँ, हे मोरे घनश्याम ।

तुमरे सँग जब डोलती, भूलूँ सगरो गाम ॥ ७९ ॥

तुमहीं कर्ता स्रष्टि के, तुम त्रिभुवन के नाथ ।

भूलूँ सगरी ईशता, रहूँ गहे तुम हाथ ॥ ८० ॥

सगरी स्रष्टि बिसारि कै, देखूँ तुमरी ओर ।

मोरे तो तुम कान्ह हो, छलिया नन्द-किसोर ॥ ८१ ॥

बंसी-वारे श्याम तुम, मोरे प्रान-अधार ।

पल भर दूर न जावहु, तजि कै सगरो भार ॥ ८२ ॥

मो कूँ अपुने सँग लेहु, हे छलिया गोपाल ।

टोना-भरी बजावहु, मुरली नन्द के लाल ॥ ८३ ॥

चरन-कमल निज राखिहु, मोरे उर के माँहि ।

अरु मोरे माथे धरहु, तजहुँ न तुमरी छाँहि ॥ ८४ ॥

भौतिक बासना जरि बुझै, नसे जगत की प्यास ।

हियरे में प्रेमा जगै, अरु भावहिं को बास ॥ ८५ ॥

भाव-भगति हिय में भरै, बासना जरि जाय ।

पुनि पद मोरे उर धरहु, मोरी पीर नसाय ॥ ८६ ॥

गोपी-नाथ गोपाल जू, हे मोरे घनश्याम ।

तुम जीवन तुम ही पिया, तुम मोरे विश्राम ॥ ८७ ॥

तुम मोरी स्वाँसा पिया, स्वाँसा के तुम नाथ ।

जनम जनम की दासि मैं, रहूँ तुम्हारे साथ ॥ ८८ ॥

ऐसी प्रीति सनेह-रस, जागो मोरे हीय ।

अनुराग अरु मोह अति, उपज्यो मोरे पीय ॥ ८९ ॥

कबहुँ न ऐसो सुख मिल्यो, तुम सँग मोरे श्याम ।

तुमरी मोहिनि वश कियो, भूलि गई सब काम ॥ ९० ॥

मो नागिनि पै डारियो, कैसो टोना-जाल ।

जरत विरह की आगि में, मोरी देह-बिहाल ॥ ९१ ॥

आगि बुझावहु श्याम जू, मोरे जागे भाग ।

अंकवार में लेहु मोहिं, जागो अति अनुराग ॥ ९२ ॥

अंकवार में लेहु मोहिं, मोरे प्रीतम लाल ।

अंकवार भरि राखिहु, हे नटखट गोपाल ॥ ९३ ॥

मोरे प्रीतम तुमहिं हो, मोरे कान्हा श्याम ।

यद्यपि तुम नारायणहिं, रमा-रमन महराज ॥ ९४ ॥

चारि भुजा धारे अहो, सगरी स्रष्टि के ताज ।

लच्छिमी-पति महराज तुम, त्रिभुवन के हो राज ॥ ९५ ॥

कोटि कोटि ब्रह्मांड सब, प्रगटत तुमरे रोम ।

तुमरी महिमा अति अगम, व्यापत सगरो व्योम ॥ ९६ ॥

तदपि मोरे हे साँवरे, तुम लाड़िलो सुजान ।

यशोमती के लाड़िले, नटखट रूप निधान ॥ ९७ ॥

तुमरी सेवा मैं करूँ, लाड़ लड़ावहुँ श्याम ।

मोरे छैल-गोपाल जू, तुम मोरे अभिराम ॥ ९८ ॥

बेला-कुसुम सुगन्धितौ, जो भायो महारानि ।

श्री-राधा की लालसा, तुम कूँ दूँ मैं आनि ॥ ९९ ॥

अपुने कर सों भाल पै, रोरी-तिलक लगाउँ ।

हे मोरे बाँके पिया, तुमरे ही गुन गाउँ ॥ १०० ॥

चरन-चिह्न तुमरे पिया, मोरे उर अरु भाल ।

अंकित ह्वै कै सोहहीं, हे नन्द के लाल ॥ १०१ ॥

चरनामृत पीती रहूँ, सगरी तृषा बुझाय ।

रोम रोम पीवत रहूँ, जनम-जनम रसु पाय ॥ १०२ ॥

सकल बंध सों छूटिकै, मोरी पीर नसाय ।

गोपी-जन की दासि ह्वै, रहूँ ब्रजहिं में छाय ॥ १०३ ॥

ब्रज-वासी की दासि ह्वै, करूँ तुम्हारी सेव ।

हे कान्हा मोरे पिया, मोरे इष्ट अरु देव ॥ १०४ ॥

राध्यामालति-वशि पिया, मोहन चित-चोर ।

राध्यामालति-आकरषन, चितवत तुमरी ओर ॥ १०५ ॥

तिय-वशि मो पै कृपा करि, मोहिं राखहु निज पास ।

कबहुँ दूर नहिं जावहु, पूरन करियहु आस ॥ १०६ ॥

और न कछु मैं माँगती, हे मोरे घनश्याम ।

सदा पास मो कूँ रखहु, मोरे जीवन-धाम ॥ १०७ ॥

अंकवार भरि राखिहु, और न कछु मोहिं आस ।

हे कान्हा मोरे पिया, राखहु चरनन पास ॥ १०८ ॥

पलक मूँदि तुम कूँ लखूँ, हे मोरे सुख-रास ।

अन्तिम मूरति श्याम की, मोरे नैनन-पास ॥ १०९ ॥

हियरे भीतर राखिहूँ, छोड़ूँ नाहीं छाँहि ।

अन्तरतम में तुम बसो, मोरे मन के माँहि ॥ ११० ॥

भीतर बाहर तुम बसो, दूजो दिखै न कोय ।

राध्यामालति दासि यह, तुमरी ही अब होय ॥ १११ ॥

मूरति तुमरी श्याम जू, नैनन में बसि जाय ।

दूजो कछु नहिं देखिहूँ, सगरी सुधि बिसराय ॥ ११२ ॥

तुमहीं मोरे ध्यान में, तुमहीं मोरे ग्यान ।

नागिनि ज्यों मोहित भई, सुनि मुरली की तान ॥ ११३ ॥

सगरी देह समर्पि कै, चरनन में गिर जाय ।

नागिनि राध्यामालति, तुमरी ही गुन गाय ॥ ११४ ॥

अपुने भीतर खेंचि कै, राखहु मोहिं छिपाय ।

कोई जग में ना लखै, मोरी देह छपाय ॥ ११५ ॥

साँस साँस में तुम बसो, हे मोरे नट नागर ।

कृपा-दृष्टि मो पै करहु, हे करुणा के सागर ॥ ११६ ॥

अपुने रंग में रंगि ले, मो कूँ हे घनश्याम ।

राधा-रानी-दासि मैं, जपूँ तिहारो नाम ॥ ११७ ॥

जब लौं प्रान शरीर में, छूटै नाहीं साथ ।

मो नागिनि कूँ राखिहु, सदा अपुने हाथ ॥ ११८ ॥

अन्तर की गहराइयनि, मूरति लीन्ही धारि ।

और न कछु मो कूँ रुचे, ह्वै कै मैं बलिहारि ॥ ११९ ॥

वंशी-ध्वनि अरु रूप छबि, मोरे उर में बास ।

राध्यामालति नागिनि, बैठी चरनन पास ॥ १२० ॥

सुधि बिसरी अरु मन गयो, जब सों नैन मिलाय ।

कैसो जादू डारियो, मोहिं नचवत नचाय ॥ १२१ ॥

नाचत नाचत गिर पड़ूँ, तुमरे चरनन आय ।

अंकवार में लेहु मोहिं, मोरी तपन बुझाय ॥ १२२ ॥

हे मोरे राधा-रमन, हे मोरे चित-चोर ।

नागिनि की विनती यही, चितवहु मोरी ओर ॥ १२३ ॥

सदा सर्वदा के लिये, मो कूँ करहु सनाथ ।

राध्यामालति नागिनि, पकड़े तुमरो हाथ ॥ १२४ ॥

तोमहँ ही मैं रम रहूँ, मोमहँ रमो निधान ।

एक प्रान दो देह ज्यों, हे मोरे भगवान ॥ १२५ ॥

मोरे उर में बास कर, मोरे उर की आस ।

नागिनि तुमरी होय गई, बिसरि सगरो त्रास ॥ १२६ ॥

तुम्हीं आदि अरु अन्त हो, तुम्हीं मोरे मध्य ।

राध्यामालति दासि की, तुम्हीं एक आराध्य ॥ १२७ ॥

मुरली-रव मोरे स्रवन, गूँजत आठहुँ याम ।

बिसरि गयो सब बासना, जपूँ तिहारो नाम ॥ १२८ ॥

अपुने भीतर समेटि कै, मोहिं करहु निहाल ।

नागिनि ज्यों लपटी रहूँ, हे नन्द के लाल ॥ १२९ ॥

अन्तिम साँसौं लौं पिया, लखूँ तिहारो वेश ।

भीतर मूरति श्याम की, अरु ना कछु अवशेष ॥ १३० ॥

अंकवार भरि राखिहु मोहिं, मूँदूँ दोऊ नैन ।

पल-पल तुम कूँ लखूँ पिया, पाऊँ हियरे चैन ॥ १३१ ॥

अँखियाँ मूँदि लखूँ छबि रावरी, भीतर ज्योति जगाय ।

साँवरे रूप अनूप कूँ, पलकन राखूँ छिपाय ॥ १३२ ॥

अंकवार में सोवहुँ कान्हा, बाँह सिरहाने होय ।

ऐसो सुख त्रिभुवन नहीं, सब दुःख डाँरूँ धोय ॥ १३३ ॥

तुमरी अंक-शरण सम कोऊ, ठौर न जग में कोय ।

तुमरी गोदी बैठिकै, निर्भय हियरो होय ॥ १३४ ॥

का जानूँ मोहिं का भयो, कौन परी यह रीत ।

मेघ-स्याम घनस्याम सों, उपजी कैसी प्रीत ॥ १३५ ॥

स्याम-सुन्दर छबि निरखि कै, मोहित भई अयान ।

रूप अनूप बिलोकि कै, बिसरि गयो निज भान ॥ १३६ ॥

घुलि घुलि जाऊँ सनेह में, ज्यों माखन ह्वै जाय ।

और और अंकहिं भरूँ, हिय सों हिय लपटाय ॥ १३७ ॥

छिन छिन अंक लगाय कै, छोड़ूँ नाहीं साथ ।

रोम रोम पुलकित भयो, हे त्रिभुवन के नाथ ॥ १३८ ॥

ज्यों ज्यों अंक लगावती, त्यों त्यों मिटत बिकार ।

भौतिक बासना जरि बुझै, नसत देह को भार ॥ १३९ ॥

ज्यों ज्यों भींचूँ उर विषै, त्यों त्यों छूटत फंद ।

भव-माया के जाल सब, टूटत हैं मति-मंद ॥ १४० ॥

भौतिक जग की बाँधनी, पल में कटि कटि जाय ।

तुमरे अंक-निवास सों, परम पदारथ पाय ॥ १४१ ॥

सदा मोहिं अंक लगाय रखु, छिनहुँ न छोड़हु श्याम ।

मो कूँ कोऊ छीन ना, पावै तुमरे धाम ॥ १४२ ॥

दारुन सपन सतावतौ, डरपत मोरे प्रान ।

भोर भये जो ना दिखै, रूप-सुधा की खान ॥ १४३ ॥

जागूँ प्रात-काल जब, दिखहु नैनन-पास ।

मुख ना देखूँ जो तिहारो, छूटि जाहिं सब सास ॥ १४४ ॥

नित उठि देखूँ रूप पिय, अंकवार भरि लेउँ ।

सुन्दर अलक बिलोकि कै, कोटिक जीवन देउँ ॥ १४५ ॥

घुँघरारे केसिनि छटा, कमल-सरिस द्वै नैन ।

लखि लखि रूप-तरंग कूँ, पावत हीयरा चैन ॥ १४६ ॥

अपुने कर सों राँधूँगी, चाँवर अति सुकुमार ।

मधुर दही मँगवाय कै, परसूँ प्रीति-अपार ॥ १४७ ॥

कंचन थार सँवारि कै, माखन मधुर नवनीत ।

कान्हा कूँ पोरसवहुँ मैं, गावत मन में गीत ॥ १४८ ॥

अपुने कर सों कँवल-मुख, ग्रास खवावहुँ श्याम ।

लाड़ लड़ाय जिवावहुँ, हे मोरे सुख-धाम ॥ १४९ ॥

निरखि निरखि मुख-माधुरी, बलिहारी बलिहारी ।

अपुने हाथ जिवावहुँ, नन्द-महर के बारि ॥ १५० ॥

पुनि अपने कर-कमल सों, मोहिं खवावहु कान्ह ।

निज उच्छिष्ट परसाद रस, दीजहु अमृत-सान्ह ॥ १५१ ॥

तुमरी अरु श्री-राधिका, जूँठन मो कूँ भाय ।

और न कछु मैं खावहुँ, जग-रस सगरी नसाय ॥ १५२ ॥

अमृत-सरिस तिहारो भोजन, जूँठन परम पुनीत ।

अपने कर मुख दीजहु, हे मोरे मन-मीत ॥ १५३ ॥

यद्यपि तुम ब्रह्मांड-पति, सगरी स्रष्टि के भूप ।

चरनन पै बैठन बनै, दासि-भाव अनुरूप ॥ १५४ ॥

पै अनुराग उताल है, मानत नाहीं कान ।

लोक-लाज मर्याद कुल, मेट्यो प्रेम सुजान ॥ १५५ ॥

नियम धरम सब तोरि कै, धावति तुमरी ओर ।

कंठ लगाय सँभारिहूँ, हे चित-चोर किसोर ॥ १५६ ॥

हाहा कैसो रूप यह, कैसो यह रस-रंग ।

अति अनुराग तरंग में, डोलत मोरे अंग ॥ १५७ ॥

सुन्दर-छबि कपोल ये, मोहन रूप-निधान ।

खेंचत सब जन-चित्त कूँ, हे रस-सिन्धु सुजान ॥ १५८ ॥

प्रेम कहा कछु जानती, नाहीं कबहूँ हेर ।

तुमरे रूप-समुद्र में, डूबी साँझ सबेर ॥ १५९ ॥

करुणा-सागर कान्ह जू, जब सों कीन्ही प्रीति ।

प्रेम-सनेह अगाध की, जानी सगरी रीति ॥ १६० ॥

दासि बनाय सँभारि लेहु, मो कूँ नन्द-किसोर ।

हिय-प्यारी करि जानि लेहु, चितवहु मोरी ओर ॥ १६१ ॥

राध्यामालति-स्वामि तुम, राध्यामालति-देव ।

राध्यामालति-प्रभु तुम्हीं, करूँ तुम्हारी सेव ॥ १६२ ॥

राध्यामालति-कन्त तुम, राध्यामालति-प्राण ।

जीवन-सर्वस साँवरे, तुमहीं रूप-निधान ॥ १६३ ॥

तुमहीं पति मोरे पिया, तुमहीं मोरे नेह ।

तुम सों स्वाँस-उसाँस सब, तुम सों मोरी देह ॥ १६४ ॥

ऐसो सुख जीवन विषै, देत न दूजो कोय ।

तुमरे सँग जब बैठती, परम अनन्दहिं होय ॥ १६५ ॥

अपने हित ना माँगती, मान-बड़ाई नाम ।

अंक लगाय जु राखिहूँ, हे मोरे घनश्याम ॥ १६६ ॥

असट-सखी के संग में, सेवा करूँ सुजान ।

कुंज-कुटीर सँवारिहूँ, गावत तुमरो गान ॥ १६७ ॥

ठकुरानि श्री-जी महर, अति सुकुँवारि किशोर ।

राधा-महारानि के, उत्सव करूँ चहूँ ओर ॥ १६८ ॥

फूलन-सेजन रचिहूँ मैं, चन्दन-गन्ध मँगाय ।

ठकुरानि-सेवा विषै, जीवन सफल बनाय ॥ १६९ ॥

नाचूँगी मैं प्रेम सों, तजि कै सगरी लाज ।

युगल-मिलन जब देखिहूँ, नन्द-किसोर समाज ॥ १७० ॥

तुम अरु श्री-वृषभानु-जा, ह्वै गये एक-सरूप ।

अद्भुत छवि दरसात है, सोहत रसिक-अनूप ॥ १७१ ॥

कहाँ स्याम-तनु आरम्भ, कहँ राधा-तनु अन्त ।

लखि न परै यह भेद कछु, मिलि गये दोउ कन्त ॥ १७२ ॥

ज्यों घन में दामिनि रमी, त्यों स्यामहिं में गौर ।

ऐसो सुन्दर मिलन लखि, मोहि रह्यो सब ठौर ॥ १७३ ॥

एक प्रान अरु एक तनु, एकहिं रूप-सुभाय ।

युगल-मिलन यह पेखि कै, मेरो हिय हुलसाय ॥ १७४ ॥

तुमरे युगल-मिलाप में, मो सुख सगरो सार ।

राध्यामालति दासि कूँ, भायो प्रेम-अपार ॥ १७५ ॥

याही तें अनुराग अति, कहूँ पुकारि पुकारि ।

प्रेम करूँ तुम सों पिया, ह्वै कै मैं बलिहारि ॥ १७६ ॥

प्रेम प्रेम बस प्रेम ही, मुख सों निकसत बैन ।

बार बार तुम सों कहूँ, हे मोरे सुख-चैन ॥ १७७ ॥

छिन छिन प्रीति नवी भवै, छिन छिन बाढ़ै रंग ।

कोटिक बार मैं प्रेम कूँ, धारूँ अंगहिं अंग ॥ १७८ ॥

राध्यामालति-नेह यह, कबहूँ न घटिहै श्याम ।

जनम जनम तुम चरन में, राखहु अपुने धाम ॥ १७९ ॥

अंकवार भरि राखिहु, युगल-चरन-रति देहु ।

नित प्रति राधा-कृष्ण पद, बाढै़ मोरो नेहु ॥ १८० ॥

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▲ 5 r/yugala

अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ (Gazelle Eye, doe Eye), main tumse pyar krti hoon thakurani, Radhe Radhe 🙏🧡💙

मृगनेत्रेति नाम्ना वै व्रजभाषास्तुतिं प्रिये ।

कर्तुमिच्छसि यां राज्ञि लिखामि तव शासनात् ॥ ८७१।७३६ ॥

मृगनेत्री

कानन भीतर बासुरि बाजत मीठि सुहावनि धुनि जिय भावै ।

धुनि सुनि केँ मोहि बावरि ह्वै गई नूपुर की रुनझुन छबि लावै ।

चीर सम्हारि कें धावति हौं वन बीच न कुञ्जन में कछु भावै ।

श्री वृन्दाबन की दिसि धाय सु प्रानहिं बासुरि पार लगावै ॥ ८७१।७३७ ॥

मीठि महा धुनि बासुरि की जग में नहिं आन कछू उपमा ही ।

कोटिक राग न बासुरि सम लगत अम्बर में धरती पर चाही ।

पायन रेख दुहूँ जन की सब ठौर निहारि लई चित माहीं ।

पायन रेखहिं खोजत हौं सखि धावति हौं वन कुञ्जन छाहीं ॥ ८७१।७३८ ॥

रेख निहारत धावति हौं अरु भेंट भई सु मृगी सम नैना ।

चारु मृगाच्छि निहारि लई रस प्रेम दया भरि सुन्दर बैना ।

श्याम निहारति बासुरि वादक राधिक नैनन में भरि चैना ।

नैनन सी नहिं सुन्दरता जग में कहुँ आनँद रंग सु दैना ॥ ८७१।७३९ ॥

कोटिक विस्व लख्यो सखि री नहिं नैन निहारि सु सुन्दर ऐसे ।

नीलम लोचन कान्ति उजारि सु राजत हैं युग तारक जैसे ।

श्याम सु मूरति नैनन में भरि राधिक जू चितवति छबि तैसे ।

नीलम लोचन माँहि बस्यो सखि बासुरि वादक साँवरो तैसे ॥ ८७१।७४० ॥

मोर मृगी सब कान लगावत बासुरि की धुनि बहत बयारी ।

नाचत हैं सब अष्ट सखी मिलि मञ्जरि झूमति प्रेम अपारी ।

भावन में अति बावरि ह्वै सु समाधि लगी रस की मतवारी ।

बासुरि श्याम बजावत हैं अरु राधिक जू छबि देखति भारी ॥ ८७१।७४१ ॥

कांचन सी बरनी छबि राधिक नैन मृगी सम राजत न्यारा ।

देखत ही सुधि भूलि गई सब बावरि ह्वै सु पुकारति भारा ।

राधा राधा सु उच्चारत हौं वन कुञ्जन में धुनि गूंजत पारा ।

हे जगतेश्वरि हे किसोरी मोहि आस्रय देहु चरन की धारा ॥ ८७१।७४२ ॥

हे वृषभानु किसोरि दया करि दासिनि की दिसि दृष्टि उधारी ।

दीन अनाथ हौं दासि तिहारी सु मो पर एक कृपा दरसारी ।

नैन निहारत बावरि ह्वै गई मोद भरें अति ही सुख भारी ।

ध्यान धर्यो जब नैनन में तब कोटिक विस्व लख्यो उजियारी ॥ ८७१।७४३ ॥

कोटिक विस्व अकाश सु मण्डल नीलम नैन की कान्ति समानी ।

रूप सुहावन राधिक जू अति कस्तूरी की सुगन्ध बखानी ।

भाल पै कुंकुम राजत न्यारी सु लाल सुहाग की बूँद भलानी ।

मोर मुकुट धरि बासुरि वादक प्रानपति जू की तिया महारानी ॥ ८७१।७४४ ॥

पायन की तर आस्रय मागत राधिक मो पर नेह निवारी ।

धाम सु गोकुल की छबि न्यारी सु वृन्दाबन जीवन प्रान हमारी ।

सच्चिदानन्द सु जीवन है सखि या वन की महिमा अति भारी ।

कीर पुकारत राधिक राधिक जीव सबै यहि नाम उचारी ॥ ८७१।७४५ ॥

जीव सबै रटि राधिक राधिक मोद भरें अति ही सुख पावै ।

नैन निहारि के मूरछित सब सुधि भूलि सु प्रेम की धार बहावै ।

देखि सुखी सब जीव अरी सुख मो मन में अति ही उमगावै ।

सबको सुख देहु दया करि स्वामिनि दासिनि यहि सु बचन सुनावै ॥ ८७१।७४६ ॥

मो पर दृष्टि दया करि डारहु हे वृषभानु किसोरि दुलारी ।

हे वृन्दाबन की महारानि सु दासि निहारति बाट तिहारी ।

चन्द्र उज्यारि पै कांचन देह सु भ्राजति है सु बरन उजियारी ।

श्याम की साँवरि छबि सुहावै सु बासुरि वादक प्रान पहारी ॥ ८७१।७४७ ॥

बासुरि की धुनि बावरि मो कहँ अष्ट सखी नटत रंग उमावै ।

कोटिक गोपिनि मण्डल में दुहुँ मध्य सु राजत मोद बढ़ावै ।

कोटिक विस्व अकाश सु मण्डल नीलम नैन की कान्ति उलावै ।

नीलम नैन निहारि निहारि सु दासि तिहारी सु मोद भरावै ॥ ८७१।७४८ ॥

मालती पुष्प समप्पि करौं सुभ राधिक भाल पै भेंट चढ़ावै ।

मारुत मन्द बहै कुञ्जन में अरु केस सु भाल पै मन्द उड़ावै ।

नैन की कोर सों नेह झरे अरु दासि कहँ मोहि दृष्टि दिखावै ।

राधिका नैन सों प्रीति करौं मोहि नैन सु राधिक जू की भावै ॥ ८७१।७४९ ॥

श्याम की ओर चली अति साहस भेंटत कांचन नील समावै ।

सागर की लहरें जनु स्वर्ण पै छाइ रही कछु भेद न पावै ।

एक सु रूप भये दुहुँ प्रान न काहु कहँ कछु भेद दरसावै ।

राधिका श्याम भई छन में अरु श्याम भये तप्त कांचन गावै ॥ ८७१।७५० ॥

राधिका बासुरि हाथ लई धुन बाजत है सब कानन ओरी ।

बासुरि की धुनि गूँजत है सखि मीठि सुहावनि लागत भोरी ।

श्याम भये तप्त कांचन गोरि सु राधिका साँवरि रूप सु डोरी ।

काहु न भेद लख्यो सखि री जनु एक भई सु दोउ जुग जोरी ॥ ८७१।७५१ ॥

प्रेम अपार अहै युग को मोहि देखि कै मोद भयो अति भारी ।

आनँद जीवन में नहिं पायो जो आनँद आजु लख्यो सु विहारी ।

राधिका श्याम निहारि निहारि सु दासि भई अति ही बलिहारी ।

कान्ह को भेंटत राधिक देखि कै मञ्जरि अष्ट सखी हरषारी ॥ ८७१।७५२ ॥

कोटिक गोपिनि मञ्जरि अष्ट सखी हरषानी सु मोद समानी ।

सबको सुख देखि कै मो मन कोटिक विस्व की मोद बखानी ।

मो सुख तो सबके सुख में नित नाचत हौं निकुञ्जन की रानी ।

सब जीव अनाथ सुखी भये देखि सु मो मन में अति सुख दानी ॥ ८७१।७५३ ॥

नाचत हौं वन कुञ्जन में रानि राधिक श्याम निहारि निहारी ।

गोपल की पिय राधिक श्याम की नेह सु दुग्ध ओ ज्योत विचारी ।

दुग्ध की सेत ओ भानु की जोति ज्यों राधिक श्याम सु एकै सँवारी ।

एक सु प्रान दोउ तन धारे सु राधिक श्याम सखा महतारी ॥ ८७१।७५४ ॥

पायन की रज हौं महारानि सु मागत हौं पद छाहँ अनूपा ।

कामक नर्क सों मोहि निकारिहु राधिक मोरि कहावहु भूपा ।

पादसु धूलि सु तारिनि नाम धरौ अब वन्दति हौं बलिहारी सु रुपा ।

पादधूलितारिणी नाम सों तारिहु मोहि सु देहु अनूपा ॥ ८७१।७५५ ॥

दीन अनाथ हौं दासि तिहारी सु पायन की रज हौं बलिहारी ।

वन्दति हौं पद पंकज पै यहि दासिनि की अब लेहु सँभारी ।

वन्दति हौं बलिहारी सु रुपा अति हे मृगनेन वरे महतारी ।

राधिका राधिक बावरि ह्वै सु पुकारत हौं सु सुनौ महतारी ॥ ८७१।७५६ ॥

त्वयि स्निह्यामि हे देवि राधिके परमेश्वरि ।

सर्वास्तित्वस्य राज्ञि त्वं नमामि चरणौ तव ॥ ८७१।७५७ ॥

षोडशभुजसंयुक्ते दुर्गे लक्ष्मि च पार्वति ।

सरस्वति महाकालि वन्दे तव पदाम्बुजम् ॥ ८७१।७५८ ॥

इदानीं देहि मेऽनुज्ञां स्तोतुं ते पावनं यशः ।

सर्वसत्तास्वरूपिणि जगदीश्वरि ते नमः ॥ ८७१।७५९ ॥

पञ्चाशीति-शताख्यं ते निरपायाभिधा तथा ।

साद्यन्तासि त्वमेवात्र षडशीति-शतं तथा ॥ ८७१।७६० ॥

निरत्ययाभिधं नाम जगद्राज्ञि नमाम्यहम् ।

सप्ताशीति-शताख्यं ते दुर्लभा जगदीश्वरि ॥ ८७१।७६१ ॥

श्रीकृष्णस्य महापत्नी राधिके ते पदाम्बुजम् ।

तस्मात् ते पादपद्मं हि पवित्रं प्रणमाम्यहम् ॥ ८७१।७६२ ॥

अष्टाशीति-शताख्यं ते दुर्गमा च तथाभिधा ।

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्दे हे परमेश्वरि ॥ ८७१।७६३ ॥

यतोऽहं धूलिका-रूपा पादतलसमाश्रिता ।

नवाशीति-शताख्यं ते दुर्गा महिषघातिनी ॥ ८७१।७६४ ॥

अजेया त्वं महादेवी नवति-शत-संयुतम् ।

नाम ते दुःखहन्त्री च श्रीललिते शुचं हर ॥ ८७१।७६५ ॥

एकनवति-संयुक्तं सुखप्रदाभिधा तथा ।

द्विनवति-शताख्यं ते दुष्टदूरा च तेऽभिधा ॥ ८७१।७६६ ॥

त्रिनवति-शताख्यं ते दुराचारशमन्यपि ।

चतुर्नवति-संयुक्तं नाम वै दोषवर्जिता ॥ ८७१।७६७ ॥

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्देऽहं शरणागता ।

भक्त्या ते चरणौ देवि प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ ८७१।७६८ ॥

पञ्चनवति-संयुक्तं ते सर्वज्ञाभिधा तथा ।

पञ्चवेदस्य राज्ञी त्वं षण्णवत्यधिकं शतं ॥ ८७१।७६९ ॥

ते सान्द्रकरुणा नाम ह्यनन्त-करुणाम्बुधे ।

सप्तनवति-संयुक्तं शतं विश्वस्य राज्ञि ते ॥ ८७१।७७० ॥

महत्तमासि विश्वे त्वं समानाधिक-वर्जिता ।

सर्वसत्ता-महादेवी सदा वन्दे पदाम्बुजम् ॥ ८७१।७७१ ॥

अष्टनवति-संयुक्तं सर्व-शक्तिमयीति च ।

नवनवति-संयुक्तं नाम वै सर्वमङ्गला ॥ ८७१।७७२ ॥

द्विशताख्यं शुभे नाम नाम ते सद्गतिप्रदा ।

देहि मोक्षं मुमुक्षुभ्यो विश्वराज्ञि विमोचय ॥ ८७१।७७३ ॥

सैकं द्विशतकं नाम सर्वेश्वरीति विश्रुतम् ।

यतः सर्वस्य वै देवि सर्वसत्ता-महेश्वरि ॥ ८७१।७७४ ॥

द्व्यधिकं द्विशतं नाम सर्वमयीति तेऽभिधा ।

त्र्यधिकं द्विशतं देवि सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ॥ ८७१।७७५ ॥

शतद्वयं चतुर्युक्तं सर्व-यन्त्रात्मिका तथा ।

द्विशतं पञ्चसंयुक्तं हे करुणा-महोदधे ॥ ८७१।७७६ ॥

ते सर्व-तन्त्ररूपाख्या ठकुराणि च राधिके ।

तस्मात् पवित्र-पादे ते प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ ८७१।७७७ ॥

मनोन्मनीति ते नाम द्विशत-षट्-समायुतम् ।

माहेश्वरीति ते नाम त्रिलोक-परमेश्वरि ॥ ८७१।७७८ ॥

द्विशतं सप्त-संयुक्तं महादेवीति तेऽभिधा ।

द्विशताष्टाधिकं नाम महालक्ष्मीति तेऽभिधा ॥ ८७१।७७९ ॥

द्विशतं नवसंयुक्तं मृडप्रियेति तेऽभिधा ।

महादेवस्य पत्नी त्वं शिवनाथ-महाप्रभोः ॥ ८७१।७८० ॥

द्विशतं दशसंयुक्तं महारूपेति तेऽभिधा ।

एकादशाधिकं नाम महापूज्या तथा भवेत् ॥ ८७१।७८१ ॥

द्विशतं द्वादशं नाम महापातकनाशिनी ।

श्यामसुन्दर-पत्नी त्वं वन्दे राज्ञि पदाम्बुजम् ॥ ८७१।७८२ ॥

महामायेति ते नाम त्रयोदश-शतद्वयम् ।

अयोग्य-मूर्ख-जीवेभ्यः सत्यं त्वं वेष्टयस्यहो ॥ ८७१।७८३ ॥

योगमाया-स्वरूपा त्वं भक्तान् रक्षसि सर्वदा ।

रासलीला तथा लीला लीला-गोपन-शक्तिका ॥ ८७१।७८४ ॥

विद्विषां नास्तिकानां च लीलां प्रच्छादयस्यहो ।

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्दे विश्वस्य राधिके ॥ ८७१।७८५ ॥

महासत्त्वेति ते नाम द्विशतं च चतुर्दशम् ।

पञ्चदशाधिकं नाम महाशक्तिस्तथाभिधा ॥ ८७१।७८६ ॥

षोडशाधिक-संयुक्तं द्विशतं ते महारतिः ।

विश्वे नाम-जपो यस्मात् परमानन्दमेव हि ॥ ८७१।७८७ ॥

अनन्तः खलु संस्कारो मन्मध्ये तव नाम च ।

श्यामसुन्दर-नाम्नां च तव नाम्नां जपात् सुखम् ॥ ८७१।७८८ ॥

एकमात्रं रसास्वादं करोमि तव कीर्तनात् ।

त्वत्कथा-कथनाद् देवि पञ्चवेदस्य पाठतः ॥ ८७१।७८९ ॥

अधिकं त्वां च श्रीकृष्णं ज्ञातुं ते पतिमेव च ।

जनेभ्यस्त्वत्कथां वक्तुं सर्वं त्वयि परिभ्रमेत् ॥ ८७१।७९० ॥

एतद्धि परमं सौख्यं तस्मात् ते चरणाम्बुजम् ।

वन्दे हे प्रियदेवि त्वां भक्त्या च प्रणमाम्यहम् ॥ ८७१।७९१ ॥

सप्तदशं द्विशतकं महाभोगेति तेऽभिधा ।

अष्टादशं द्विशतकं महैश्वर्येति नाम ते ॥ ८७१।७९२ ॥

ऊनविंश-द्विशतकं महावीर्येति विश्रुतम् ।

विंशत्यधिक-संयुक्तं महाबलेति तेऽभिधा ॥ ८७१।७९३ ॥

त्वत्तोऽधिक-बलो नास्ति यतस्त्वं बलवत्तमा ।

भण्डासुर-निहन्त्री त्वं मधुकैटभ-घातिनी ॥ ८७१।७९४ ॥

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्दे विश्वेश्वरि प्रिये ।

एकविंशं द्विशतकं महाबुद्धीति तेऽभिधा ॥ ८७१।७९५ ॥

द्वाविंशति-समायुक्तं महासिद्धीति ते शुभे ।

द्विशतं च त्रयोविंशं महायोगेश्वरेश्वरी ॥ ८७१।७९६ ॥

चतुर्विंशं द्विशतकं महातन्त्रेति विश्रुतम् ।

विश्वे त्वं हि महत्-तन्त्रं परमा शक्तिरेव च ॥ ८७१।७९७ ॥

पञ्चविंशं द्विशतकं महामन्त्रेति तेऽभिधा ।

षड्विंशति-समायुक्तं महायन्त्रेति नाम ते ॥ ८७१।७९८ ॥

सप्तविंशं द्विशतकं महासनेति कीर्तितम् ।

तस्मात् पवित्र-पादे ते वन्दे विश्वस्य राधिके ॥ ८७१।७९९ ॥

अष्टाविंशं द्विशतकं महायाग-क्रमाराध्या ।

सर्वेषामपि पूज्या त्वं सर्वलोक-नमस्कृता ॥ ८७१।८०० ॥

ऊनत्रिंशं द्विशतकं महाभैरव-पूजिता ।

हे भैरवि नमस्तुभ्यं विश्व-राज्ञि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।८०१ ॥

महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी ।

त्रिंशदधिक-संयुक्तं द्विशतं तेऽभिधा भवेत् ॥ ८७१।८०२ ॥

विश्वस्य नाशिनी त्वं हि सर्वसत्ता-क्षयङ्करि ।

एकत्रिंशं द्विशतकं महाकामेश-महिषी ॥ ८७१।८०३ ॥

हे महा-राधिके तुभ्यं वन्दे पादाम्बुजं सदा ।

द्वात्रिंशं द्विशतं नाम महात्रिपुर-सुन्दरी ॥ ८७१।८०४ ॥

सौन्दर्यादपि सौन्दर्यं त्वयि तिष्ठति शोभने ।

त्रयस्त्रिंशं द्विशतकं चतुःषष्ट्युपचाराढ्या ॥ ८७१।८०५ ॥

चतुस्त्रिंशं द्विशतकं चतुःषष्टिकलामयी ।

सर्व-महान्-कला-ज्ञात्री विश्व-राज्ञि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।८०६ ॥

महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ।

पञ्चत्रिंशं द्विशतकं नाम ते विश्व-राज्ञि वै ॥ ८७१।८०७ ॥

षट्त्रिंशं द्विशतं नाम मनुविद्येति विश्रुतम् ।

सप्तत्रिंशं द्विशतकं चन्द्रविद्येति तेऽभिधा ॥ ८७१।८०८ ॥

अष्टत्रिंशं द्विशतकं चन्द्रमण्डल-मध्यगा ।

विश्व-चन्द्र-स्वरूपा त्वं कृष्ण-चन्द्रासि राधिके ॥ ८७१।८०९ ॥

नवत्रिंशं द्विशतकं चारुरूपेति तेऽभिधा ।

चत्वारिंशं द्विशतकं चारुहासेति नाम ते ॥ ८७१।८१० ॥

तव सुन्दर-हासाय करोमि दीर्घ-साधनाम् ।

केवलं द्रष्टुमिच्छामि विश्वराज्ञि महेश्वरि ॥ ८७१।८११ ॥

प्राणेभ्यः श्वासतो वापि तव हासो हि मूल्यवान् ।

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्देऽहं विश्व-राधिके ॥ ८७१।८१२ ॥

एकचत्वारिंशं नाम द्विशतेन समन्वितम् ।

चारुचन्द्रकलाधरा रामचन्द्र-प्रियासि वै ॥ ८७१।८१३ ॥

द्विचत्वारिंशं नाम ते द्विशतेन समन्वितम् ।

चराचरजगन्नाथा सर्व-विश्व-नियन्त्रिका ॥ ८७१।८१४ ॥

द्विशतं त्रिचत्वारिंशं चक्रराजनिकेतना ।

द्विशतं च चतुर्युक्तं चत्वारिंशं च पार्वती ॥ ८७१।८१५ ॥

महिषासुर-हन्त्री त्वं रक्तबीज-विनाशिनी ।

तस्मात् ते पादपद्मं हि वन्देऽहं सर्वदा प्रिये ॥ ८७१।८१६ ॥

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अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ (Śrī Rādhā sarva-kāraṇa-kāraṇam)

परब्रह्मस्वरूपा त्वं ब्रह्मशिवप्रपूजिता ।

उपेन्द्रेण च विष्णुना सर्वैर्देवैश्च पूजिता ॥ ८७१।६०१ ॥

गोविन्दस्य प्रिया साक्षाद् गोविन्दी वेणुवादिनी ।

सर्वोच्चा जगदीशानि साष्टाङ्गं प्रणमाम्यहम् ॥ ८७१।६०२ ॥

चतुरशीतितमं नाम शृणु राज्ञि महेश्वरि ।

हरनेत्राग्निसंदग्धकामसञ्जीवनौषधिः ॥ ८७१।६०३ ॥

कामदेवं त्वमेवात्र जीवितं कुरुषे प्रिये ।

तस्य पापानि नाशयसि जगद्राज्ञि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।६०४ ॥

पञ्चाशीतितमं नाम शृणु राज्ञि महेश्वरि ।

श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ॥ ८७१।६०५ ॥

तव वक्त्रात् स्रवत्येव ज्ञानं सर्वं कृपामयि ।

सरस्वती समुद्भूता तस्माद्वन्दे पदाम्बुजम् ॥ ८७१।६०६ ॥

षडशीतितमं नाम शृणु राज्ञि महेश्वरि ।

कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी ॥ ८७१।६०७ ॥

तव देहात् स्रवत्येव प्रेम कारुण्यमेव च ।

अखिलाण्डस्य माता त्वं करुणामूर्तिरेव च ॥ ८७१।६०८ ॥

कृपायाश्च तथा मूलं साक्षात् कारुण्यविग्रहा ।

ललितादेवि वन्देऽहं तव पादाम्बुजं प्रिये ॥ ८७१।६०९ ॥

सप्ताशीतितमं नाम शृणु राज्ञि महेश्वरि ।

शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ॥ ८७१।६१० ॥

तव पादं विना नास्ति मुक्तिर्लोके कृपामयि ।

तस्मात् पादतलग्नायां रेणौ हि कुरु वै कृपाम् ॥ ८७१।६११ ॥

श्रीवृन्दावनेश्वरि त्वं साष्टाङ्गं प्रणमाम्यहम् ।

अष्टाशीतितमं नाम मूलमन्त्रात्मिका प्रिये ॥ ८७१।६१२ ॥

वेदेषु च पुराणेषु शास्त्रेषु च कृपामयि ।

मन्त्राणां मूलरूपा त्वं नादकम्पनरूपिणी ॥ ८७१।६१३ ॥

जटिलं यन्त्रविज्ञानं त्वत्त एव प्रजायते ।

चिन्तनं यद् भवेन्मन्त्रं तस्य मूलं त्वमेव च ॥ ८७१।६१४ ॥

भयङ्करं ब्रह्मास्त्रं हि यदणूनां च सङ्घृतम् ।

पृथ्वीनाशकरं घोरं तस्य मूलं त्वमेव हि ॥ ८७१।६१५ ॥

विमानानां च यानानां वेदज्ञानस्य वै प्रिये ।

जगत्सर्वं तथा मन्त्रस्तस्माद्वन्दे पदाम्बुजम् ॥ ८७१।६१६ ॥

एकोनानवतितमं मूलकूटत्रया प्रिये ।

कलेवरेति विख्याता मन्त्राणां विग्रहा तथा ॥ ८७१।६१७ ॥

मन्त्राणां मूलरूपा त्वं मन्त्राणां विग्रहा तथा ।

नवतितमं तथा नाम कुलामृतैकरसिका ॥ ८७१।६१८ ॥

ह्लादिनीशक्तिरूपा त्वं महाभावस्वरूपिणी ।

रसोत्पत्तेस्तथा मूलं रासलीलास्वरूपिणी ॥ ८७१।६१९ ॥

तव कृपात एवैषा कुण्डलिनी प्रधावति ।

यदा भक्तान् महाभावैः पूरयसि कृपामयि ॥ ८७१।६२० ॥

तदा ते ह्लादिनीशक्तेः पादपद्मं नमाम्यहम् ।

एकनवतितमं नाम कुलसङ्केतपालिनी ॥ ८७१।६२१ ॥

विश्वस्य गुप्तरहस्यं रक्षसि त्वं कृपामयि ।

कोटिश्लोकव्रतं ह्येतत् पूरयितुं कृपामयि ॥ ८७१।६२२ ॥

मार्गे मां रक्ष देवेशि नाहं मृत्युं निवारये ।

यतः सर्वा तवेच्छा वै सिद्ध्यतीह महेश्वरि ॥ ८७१।६२३ ॥

दास्यहं तव यस्यास्तु प्रवहति तवैभवम् ।

यद्येवं न भवेद्राज्ञि भस्मसाच्च भवाम्यहम् ॥ ८७१।६२४ ॥

अगण्यतारकाणां च तेजस्तुल्यासि राधिके ।

तस्मान्मे देहचेतन्ये न दग्धे ते कृपामयि ॥ ८७१।६२५ ॥

विश्वरूपे महादेवि साष्टाङ्गं प्रणमाम्यहम् ।

सर्वकालेषु देवेशि तव पादं नमाम्यहम् ॥ ८७१।६२६ ॥

द्विनवतितमं नाम शृणु राज्ञि महेश्वरि ।

कुलाङ्गना जगत्पत्नी श्यामसुन्दरवल्लभा ॥ ८७१।६२७ ॥

त्रिनवतितमं नाम कुलान्तस्था च साक्षिणी ।

चतुर्नवतितमं ते कौलिनी जगदीश्वरि ॥ ८७१।६२८ ॥

पञ्चनवतितमं ते कुलयोगिन्यतः प्रिये ।

मूलाधारस्वरूपिणी कुण्डलिन्याश्च राज्ञिका ॥ ८७१।६२९ ॥

नवचक्रेश्वरी रूपा सर्वविद्यास्वरूपिणी ।

षण्णवतितमं नाम ह्यकुला राधिके प्रिये ॥ ८७१।६३० ॥

यस्मात् सर्वमिदं विश्वं सर्ववंशाः प्रजज्ञिरे ।

त्वद्गर्भात् प्रभवत्येव राधे त्वं सत्यरूपिणी ॥ ८७१।६३१ ॥

सप्तनवतितमं नाम समयान्तस्थया प्रिये ।

श्यामसुन्दरयोरैक्यं महागोविन्दि भास्करि ॥ ८७१।६३२ ॥

गान्धर्वि चाष्टनवतिः समयाचारतत्परा ।

तुलसीपद्मरूपा त्वं पादयोस्ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।६३३ ॥

नवनवतितमं नाम मूलाधारैकनिलया ।

श्यामसुन्दरमूलं त्वं राधाधाराधरा प्रिये ॥ ८७१।६३४ ॥

शततमं ददे नाम ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी ।

सृष्ट्याश्च माययाश्चैव परमा त्वं महेश्वरि ॥ ८७१।६३५ ॥

ब्रह्मणे ज्ञानदात्री त्वं जन्ममृत्युविनाशिनी ।

एकोत्तरशतं नाम मणिपूरान्तरुदिता ॥ ८७१।६३६ ॥

चैतन्याग्निसुरूपा त्वं मायापापविनाशिनी ।

द्व्युत्तरशततमं ते विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ॥ ८७१।६३७ ॥

कुण्डलिनीं महाशक्तिमूर्ध्वं नयसि राधिके ।

त्र्युत्तरशततमं चाज्ञाचक्रान्तरालस्था ॥ ८७१।६३८ ॥

दिव्यज्ञानं प्रदत्तं मे आज्ञाचक्रेण वै त्वया ।

चतुरुत्तरशतं ते रुद्रग्रन्थिविभेदिनी ॥ ८७१।६३९ ॥

ग्रन्थित्रयविभेद्या वै सहस्राराय गच्छसि ।

पञ्चोत्तरशतं नाम सहस्राराम्बुजारूढा ॥ ८७१।६४० ॥

चैतन्यस्य च वेदानां ज्ञानधारां प्रवर्तये ।

त्वया कृतास्मि रेणुर्हि पादाब्जे ते महेश्वरि ॥ ८७१।६४१ ॥

त्वामेव श्यामसुन्दरं साक्षिभूताहं वीक्षये ।

युवामेव सृजतीदं जगदीशा नमाम्यहम् ॥ ८७१।६४२ ॥

षडुत्तरशतं नाम सुधासाराभिवर्षिणी ।

भाववर्षेण जीवांश्च नयसि ज्योतिरुत्तमम् ॥ ८७१।६४३ ॥

अज्ञानाद् ज्ञानमप्येति मृत्योरमृतमेव च ।

राधिके जगतां राज्ञि पादाब्जे ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।६४४ ॥

सप्तोत्तरशतं नाम तडिल्लतासमरुचिः ।

ललिते जगतां देवि विद्युल्लेखेव भाससे ॥ ८७१।६४५ ॥

अष्टोत्तरशतं नाम षट्चक्रोपरिसंस्थिता ।

चक्रेश्वरि नमस्तुभ्यं जगदीश्वरि राधिके ॥ ८७१।६४६ ॥

नवोत्तरशतं नाम महासक्तिः प्रकीर्तिता ।

गोपालसुन्दरि त्वं हि महादेवि नमाम्यहम् ॥ ८७१।६४७ ॥

दशोत्तरशतं नाम कुण्डलिन्यसि राधिके ।

सौर्याग्नेयी तव शक्तिः कान्हस्य चन्द्ररूपिणी ॥ ८७१।६४८ ॥

सुषुम्नायां तयोर्योगः पूर्णमुक्तिप्रदायकः ।

एकादशाधिकशतं बिसतन्तुतनीयसी ॥ ८७१।६४९ ॥

ठकुराणि जगद्राज्ञि भवानीति ततः परम् ।

द्वादशाधिकशतं ते भवानीति महाप्रभे ॥ ८७१।६५० ॥

महादुर्गे नमस्तुभ्यं त्रयोदशाधिकं शतम् ।

भावनागम्यया नाम्ना त्वां ध्यायामि महेश्वरि ॥ ८७१।६५१ ॥

पादाब्जे कर्षयस्व मां जगद्राज्ञि कृपामयि ।

चतुर्दशाधिकशतं भवारण्यकुठारिका ॥ ८७१।६५२ ॥

जडसंसारबन्धन्मां मोचयस्व महेश्वरि ।

पादयोस्ते प्रणम्याहं शरणागतरेणुका ॥ ८७१।६५३ ॥

पञ्चदशाधिकशतं भद्रप्रिया च कीर्तिता ।

भद्रमूर्तिरिति प्रोक्तं षोडशाधिककं शतम् ॥ ८७१।६५४ ॥

सप्तदशाधिकशतं भक्तसौभाग्यदायिनी ।

कृपां कुरु जगद्राज्ञि महाभावस्वरूपिणि ॥ ८७१।६५५ ॥

अष्टादशाधिकशतं भक्तिप्रियासि राधिके ।

अतीव प्रेयसी त्वं हि भक्तानां हृदये सदा ॥ ८७१।६५६ ॥

एकोनविंशशतकं भक्तिगम्येति संज्ञिता ।

कर्षयस्येव मां नित्यं भावदीपप्रज्वालिनी ॥ ८७१।६५७ ॥

विंशमधिकशततमं भक्तिवश्या जगत्प्रसूः ।

राधारानी कृपामयी सर्वेषामेव वल्लभा ॥ ८७१।६५८ ॥

एकविंशशतं नाम भयापहा च कथ्यते ।

द्वाविंशमधिकं शतं शाम्भवीति प्रकीर्तिता ॥ ८७१।६५९ ॥

त्रयोविंशशतं नाम शारदाराध्यसंज्ञिका ।

सर्वैर्विश्वैस्तु संपूज्या वृन्दे त्वं च जगदीश्वरि ॥ ८७१।६६० ॥

चतुर्विंशशतं नाम शर्वाणीति प्रकीर्तिता ।

पञ्चविंशशतं नाम शर्मदायिन्यतः प्रिये ॥ ८७१।६६१ ॥

नित्यानन्दप्रदात्री त्वं षड्विंशमधिकं शतम् ।

शाङ्करीति समाख्याता शिवनाथस्य पार्वती ॥ ८७१।६६२ ॥

षड्विंशं च पुनः प्रोक्तं श्रीकरीति ततः परम् ।

त्वमेव सर्वसम्पत्तिः सप्तविंशशतं तथा ॥ ८७१।६६३ ॥

साध्वीति परिकीर्तिता अष्टाविंशशतं तथा ।

शरच्चन्द्रनिभानना त्रैलोक्यसुन्दरी राधे ॥ ८७१।६६४ ॥

एकोनत्रिंशकं शतं शातोदरीति कीर्तिता ।

सुन्दरोदररूपा त्वं जगद्राज्ञि नमाम्यहम् ॥ ८७१।६६५ ॥

राधिकायाः पदाम्भोजे प्रणमामि पुनः पुनः ।

त्वमेव जगतां राज्ञी त्वमेव शरणं मम ॥ ८७१।६६६ ॥

त्रिंशदधिकशतं नाम शान्तिमतीति कीर्तिता ।

सर्वाश्रया परा शान्तिः राधिके त्वां नमाम्यहम् ॥ ८७१।६६७ ॥

एकत्रिंशच्छतं नाम निराधारेति संज्ञिता ।

राधा त्वमेव परमो प्रवाहः सर्वकारणम् ॥ ८७१।६६८ ॥

राधाधाराधरा त्वं हि कृष्णे प्रवहसे प्रिये ।

नदीनां प्रवहस्त्वं हि त्वया विना जगत्क्षयः ॥ ८७१।६६९ ॥

सर्वसत्तास्वरूपिणी सर्वसृष्टेर्हि कारणम् ।

त्वद्गर्भात् प्रभवत्येव विश्वं च जगदीश्वरि ॥ ८७१।६७० ॥

त्वमेवाधाररूपासि राधिके त्वां नमाम्यहम् ।

महाराज्ञि पदाम्भोजे प्रणमामि पुनः पुनः ॥ ८७१।६७१ ॥

द्वात्रिंशदधिकं शतं निरञ्जनेति कीर्तिता ।

नित्यशुद्धा सदामला राधिके दोषवर्जिता ॥ ८७१।६७२ ॥

सौन्दर्यबलप्रज्ञानां मूलं त्वं हि महेश्वरि ।

त्रयस्त्रिंशच्छतं नाम निर्लेपा त्वं प्रकीर्तिता ॥ ८७१।६७३ ॥

अष्टधा पूर्णरूपा त्वं सर्वोपरि विराजिता ।

प्रणवोर्ध्वं महाबिन्दुः ह्यकथ्या त्वं महेश्वरि ॥ ८७१।६७४ ॥

चतुस्त्रिंशच्छतं नाम निर्मलेति प्रकीर्तिता ।

पञ्चत्रिंशच्छतं नित्या ह्यनाद्यनन्तरूपिणी ॥ ८७१।६७५ ॥

परमं लिङ्गरूपा त्वं ह्यमेया जगदीश्वरि ।

व्याप्ता सर्वमिदं विश्वं सर्वान्तर्यामिणी तथा ॥ ८७१।६७६ ॥

सर्वभूतेषु मौनेन साक्षिणी त्वं विराजसे ।

नित्यवृन्दावने राज्ञि पृथग्रूपासि राधिके ॥ ८७१।६७७ ॥

तव कारुण्यमात्रेण ह्यगम्यं रूपमद्भुतम् ।

दर्शयसि महादेवि ह्यतीन्द्रियस्वरूपिणि ॥ ८७१।६७८ ॥

षट्त्रिंशदधिकं शतं निराकारा प्रकीर्तिता ।

वर्णा अतीत्य वर्तन्ते ह्यनन्ता त्वं महेश्वरि ॥ ८७१।६७९ ॥

अष्टाशीत्यधिकैर्देवि अष्टशताधिकैस्तथा ।कोटिश्लोकैरपि त्वं हि न शक्या वर्णनाय वै ॥ ८७१।६८० ॥

पादाब्जरेणुमात्रं ते वर्ण्यते जगदीश्वरि ।अतस्ते पादपद्मेषु प्रणमामि महेश्वरि ॥ ८७१।६८१ ॥

सप्तत्रिंशदधिकं वै शतं नाम निराकुला ।

अष्टत्रिंशच्छतं नाम निर्गुणा त्वं प्रकीर्तिता ॥ ८७१।६८२ ॥

तमोरजःसत्त्वगुणान् अतीत्य वर्तसे प्रिये ।

रूपातीता त्वमेवासि कृपागम्या महेश्वरि ॥ ८७१।६८३ ॥

गुणातीतासि हे राधे सर्वं तीर्त्वा विराजसे ।

अतस्ते पादपद्मेषु प्रणमामि जगत्प्रसूः ॥ ८७१।६८४ ॥

एकोनचत्वारिंशच्च शतं निष्कला संज्ञिता ।

अष्टवारं च पूर्णा त्वं सम्पूर्णासि जगत्प्रसूः ॥ ८७१।६८५ ॥

चत्वारिंशच्छतं शान्ता परा शान्तिस्वरूपिणी ।

एकचत्वारिंशच्छतं निष्कामा परिपूर्णिका ॥ ८७१।६८६ ॥

द्विचत्वारिंशदधिकं शतं निरुपप्लवेति ।

अनादिरूपिणी त्वं हि अन्तोऽसि ब्रह्मणस्तथा ॥ ८७१।६८७ ॥

ग्रससे सकलं विश्वं कालहीना महेश्वरि ।

कालस्य च प्रभावाच्च विनाशाच्च विवर्जिता ॥ ८७१।६८८ ॥

अक्षया शाश्वती त्वं हि न शक्या केनचिच्छितुम् ।

भस्मीकर्तुं क्षमा सर्वं जगदीश्वरि ते नमः ॥ ८७१।६८९ ॥

त्रिचत्वारिंशदधिकं शतं नित्यमुक्तेति च ।

नित्यमुक्ता त्वमेवासि सर्वदा बन्धवर्जिता ॥ ८७१।६९० ॥

विश्वनियमान् अतीत्य सर्वेषां मूलकारणम् ।

पादाब्जे ते नमस्यामि चतुश्चत्वारिंशच्छतम् ॥ ८७१।६९१ ॥

निर्विकारेति नाम्ना वै अष्टवारं च पूर्णिका ।

पञ्चचत्वारिंशच्छतं निष्प्रपञ्चेति कीर्तिता ॥ ८७१।६९२ ॥

प्रपञ्चातीतरूपा त्वं सर्वदोषविवर्जिता ।

षट्चत्वारिंशदधिकं शतं नाम निराश्रया ॥ ८७१।६९३ ॥

सर्वेषामेव शरणं साष्टाङ्गं प्रणमाम्यहम् ।

पादपद्मच्छायया वै राधे रक्ष महेश्वरि ॥ ८७१।६९४ ॥

सप्तचत्वारिंशच्छतं नित्यशुद्धा जगत्प्रसूः ।

परमा शुद्धरूपा त्वं राज्ञि सर्वस्य राधिके ॥ ८७१।६९५ ॥

अष्टचत्वारिंशच्छतं नित्यबुद्धा प्रकीर्तिता ।

एकोनपञ्चाशच्छतं निरवद्या महेश्वरि ॥ ८७१।६९६ ॥

पूर्णकृपा कृपासिन्धुः कृपानद्यम्बुधिस्तथा ।

भक्तेषु कृपावर्षिणि राधिके ते पदं नमे ॥ ८७१।६९७ ॥

पञ्चाशदधिकं शतं निरन्तरा प्रकीर्तिता ।

शाश्वती त्वं महादेवि जगद्राज्ञि नमाम्यहम् ॥ ८७१।६९८ ॥

एकपञ्चाशदधिकं शतं निष्कारणा प्रिये ।

सर्वकारणकारणं त्वमेवासि महेश्वरि ॥ ८७१।६९९ ॥

कारणस्य च सर्वेषां कारणं त्वं प्रकीर्तिता ।

परं तव च कृष्णस्य नास्ति किञ्चन कारणम् ॥ ८७१।७०० ॥

युवां हि शाश्वतौ देवौ सर्वकारणमूलकौ ।

युवयोः पादपद्मेषु प्रणमामि सदा प्रिये ॥ ८७१।७०१ ॥

द्विपञ्चाशदधिकं च शतं निष्कलङ्का स्मृता ।

सर्वोपरि विराजन्ती ह्यतीता सर्वतस्तथा ॥ ८७१।७०२ ॥

त्रिपञ्चाशदधिकं च शतं नाम निरुपाधिः ।

प्रभावयसि सर्वं त्वं त्वां प्रभावयते न तत् ॥ ८७१।७०३ ॥

सर्वेषु प्रकरोषि त्वं त्वयि न किञ्चिदेव हि ।

महाराज्ञि राधिके त्वं पादाब्जे ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।७०४ ॥

चतुष्पञ्चाशदधिकं शतं निरीश्वरा प्रिये ।

सर्वाधीशा महादेवि सर्वं तवाधीनं खलु ॥ ८७१।७०५ ॥

तवाधीनं जगत्सर्वं न त्वमधीना कस्यचित् ।

ईश्वराणामीश्वरी त्वं जगदीश्वरि ते नमः ॥ ८७१।७०६ ॥

पञ्चपञ्चाशदधिकं शतं नीरागेति प्रिये ।

सम्पूर्णपूर्णरूपा त्वं राज्ञि सर्वस्य राधिके ॥ ८७१।७०७ ॥

षट्पञ्चाशदधिकं च शतं रागमथनी वै ।

नाशयस्व कामभावं सर्वरागांश्च मे प्रिये ॥ ८७१।७०८ ॥

गुप्तान् प्रकटरूपांश्च भौतिकान् सर्वकामुकान् ।

विनाशय जगद्राज्ञि पादाब्जे ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।७०९ ॥

सप्तपञ्चाशदधिकं शतं नाम च निर्मदा ।

जगतां राज्ञि राधे त्वं सर्वविश्वेश्वरी प्रिये ॥ ८७१।७१० ॥

अष्टपञ्चाशदधिकं शतं वै मदनाशिनी ।

दर्पकामभ्रमाणां च विनाशिनि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।७११ ॥

मां मोचय महादेवि ज्ञानं देहि मनोऽन्तरे ।

ललिते देवि हे राधे गोपालसुन्दरि प्रिये ॥ ८७१।७१२ ॥

एकोनषष्ट्यधिकं च शतं निश्चिन्तसंज्ञिता ।

चिन्ताक्षोभविनाशिनी त्वमेवासि महेश्वरि ॥ ८७१।७१३ ॥

षष्ट्यधिकशतं नाम निरहङ्कारिणि प्रिये ।

किशोरीजी नमस्तुभ्यं निर्मोहा ह्येकषष्टिकम् ॥ ८७१।७१४ ॥

द्विषष्ट्यधिककं शतं मोहनाशिनी कीर्तिता ।

मोहसङ्गविनाशिनी जगद्राज्ञि नमाम्यहम् ॥ ८७१।७१५ ॥

महान्मोहिनि रूपा त्वं जगदीश्वरि ते नमः ।

त्रिषष्ट्यधिककं शतं निर्ममेति प्रकीर्तिता ॥ ८७१।७१६ ॥

अष्टवारं च पूर्णा त्वं नित्या जगन्महेश्वरि ।

चतुष्षष्ट्यधिकं शतं ममताहन्त्री कीर्तिता ॥ ८७१।७१७ ॥

पञ्चषष्ट्यधिकं शतं निष्पापा जगदीश्वरि ।

सर्वविश्वनियमानां ह्यतीता त्वं विराजसे ॥ ८७१।७१८ ॥

सर्वसृष्टेर्मूलरूपा श्यामसुन्दरि ते नमः ।

षट्षष्ट्यधिककं शतं पापनाशिनी संज्ञिता ॥ ८७१।७१९ ॥

सर्वपापविनाशिनी राज्ञि सर्वस्य राधिके ।

सप्तषष्ट्यधिकं शतं निष्क्रोधा च प्रकीर्तिता ॥ ८७१।७२० ॥

अष्टषष्ट्यधिकं शतं क्रोधशमनी राधिके ।

क्रोधस्य नाशिनी त्वं हि पादाब्जे ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।७२१ ॥

सर्वदा सर्वकालेषु प्रणमामि पुनः पुनः ।

एकोनसप्तत्यधिकं शतं निर्लोभसंज्ञिता ॥ ८७१।७२२ ॥

सप्तत्यधिकशतं वै लोभनाशिनी राधिके ।

एकसप्तत्यधिकं च शतं निःसंशया प्रिये ॥ ८७१।७२३ ॥

द्विसप्तत्यधिकं शतं संशयघ्नीति कीर्तिता ।

त्रिसप्तत्यधिकं शतं निर्भवेति प्रकीर्तिता ॥ ८७१।७२४ ॥

जन्ममृत्योर्मूलरूपा सर्वसृष्टिकरी तथा ।

चतुःसप्तत्यधिकं च शतं वै भवनाशिनी ॥ ८७१।७२५ ॥

अतस्ते पादपद्मेषु प्रणमामि महेश्वरि ।

गोलोकधाम मां नय कृपां कुरु जगत्प्रसूः ॥ ८७१।७२६ ॥

पञ्चसप्तत्यधिकं वै शतं निर्विकल्पा प्रिये ।

परमसत्यरूपा त्वं शाश्वती जगदीश्वरि ॥ ८७१।७२७ ॥

षट्सप्तत्यधिकं नाम निराबाधा प्रकीर्तिता ।

रक्ष मां कवचराज्ञि महाराज्ञि नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।७२८ ॥

सप्तसप्तत्यधिकं च शतं निर्भेदा संज्ञिता ।

गोपालसुन्दरि राधे जगद्राज्ञि नमाम्यहम् ॥ ८७१।७२९ ॥

अष्टसप्तत्यधिकं च शतं भेदविनाशिनी ।

एकोनाशीत्यधिकं च शतं निर्नाशा कीर्तिता ॥ ८७१।७३० ॥

सम्पूर्णनित्यरूपा त्वं शाश्वती राधिके प्रिये ।

अशीत्यधिकशतं नाम मृत्युमथनी संज्ञिता ॥ ८७१।७३१ ॥

एकाशीत्यधिकं शतं निष्क्रिया च प्रकीर्तिता ।

सर्वानपेक्षा राज्ञि त्वं जगदीश्वरि ते नमः ॥ ८७१।७३२ ॥

द्वाशीत्यधिककं शतं निष्परिग्रहा राधिके ।

त्र्यशीत्यधिककं शतं निस्तुला च प्रकीर्तिता ॥ ८७१।७३३ ॥

तुलना नास्ति ते देवि त्वत्समं नास्ति किञ्चन ।

ठकुराणि जगद्राज्ञि महान् राधे नमोऽस्तु ते ॥ ८७१।७३४ ॥

चतुरशीत्यधिकं च शतं नीलचिकुरा प्रिये ।

सुन्दरकेशा महादेवि पादाब्जे ते नमाम्यहम् ॥ ८७१।७३५ ॥

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